कवुंदमपलायम विधानसभा क्षेत्र (No. 117) एक घनी आबादी वाला शहरी क्षेत्र है, जहां मतदान प्रतिशत आम तौर पर काफी अधिक रहता है. यहां चुनावों का परिणाम मुख्य रूप से कामगार वर्ग के मूड, प्रवासी पृष्ठभूमि वाले मोहल्लों की भावना, शहरी सेवाओं की गुणवत्ता, और निम्न व निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों पर बढ़ती महंगाई के दबाव से तय होता है. कोंगु क्षेत्र की ग्रामीण सीटों की तुलना में यहां जातीय समीकरणों से ज्यादा नगर निगम की सेवाओं और सरकारी योजनाओं के भरोसेमंद क्रियान्वयन को महत्व दिया जाता है. इस सीट पर जीत-हार का अंतर अक्सर बहुत कम होता है और परिणाम तेजी से बदल सकते हैं, क्योंकि यहां के मतदाता पानी, जल निकासी (ड्रेनेज), रोजगार के अवसर और महंगाई जैसे मुद्दों पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं.
राजनीतिक और सामाजिक रूप से इस क्षेत्र में कई प्रभावशाली मतदाता समूह हैं. इनमें सबसे प्रमुख हैं शहरी कामगार वर्ग और दिहाड़ी मजदूर परिवार, पुरानी टेक्सटाइल मिलों और पावरलूम से जुड़े श्रमिक परिवार, दूसरी पीढ़ी के प्रवासी मूल के मतदाता जो अब यहां स्थायी रूप से बस चुके हैं, अनुसूचित जाति (SC) समुदाय जो संख्या में महत्वपूर्ण और कई बार निर्णायक भूमिका निभाते हैं, तथा शहरी गरीब और झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोग. इन सभी समूहों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां और रोजमर्रा की समस्याएं चुनावी फैसलों को काफी प्रभावित करती हैं.
भौगोलिक और बुनियादी ढांचे के नजरिए से यह क्षेत्र पूरी तरह शहरी है. यहां घनी आबादी वाले रिहायशी वार्ड, पुराने मिल क्षेत्रों और मजदूर कॉलोनियों, झुग्गी-बस्तियों के क्लस्टर और पुनर्विकसित टेनमेंट कॉलोनियां, संकरी व्यावसायिक सड़कें और बाजार बड़ी संख्या में मौजूद हैं. इस क्षेत्र में खुली जमीन बहुत कम है और कृषि क्षेत्र लगभग नहीं के बराबर है. इसलिए यहां चुनावी परिणामों पर सबसे ज्यादा असर मोहल्लों में मिलने वाली बुनियादी सेवाओं पर पड़ता है.
चुनावी दृष्टि से कुछ इलाके विशेष रूप से संवेदनशील माने जाते हैं, जैसे मजदूर कॉलोनियों के इलाके, झुग्गी और टेनमेंट क्लस्टर, अनुसूचित जाति समुदायों की बस्तियां, निम्न-मध्यवर्गीय मिश्रित आबादी वाले वार्ड, और बाजार के आसपास के रिहायशी इलाके. इन इलाकों के लोग पानी की आपूर्ति, नालियों के ओवरफ्लो, कचरा प्रबंधन और बढ़ते किराए जैसी समस्याओं पर बहुत जल्दी प्रतिक्रिया देते हैं, जिससे मतदान का रुझान भी तेजी से बदल सकता है.
यहां के प्रमुख स्थानीय मुद्दों में सबसे ऊपर पीने के पानी की नियमित आपूर्ति, सीवरेज और मानसून के समय जल निकासी की व्यवस्था, घरों और पावरलूम उद्योगों के लिए भरोसेमंद बिजली, महंगाई और घरेलू खर्चों का बढ़ता दबाव, सरकारी अस्पतालों तक आसान पहुंच, और स्कूलों तथा आंगनवाड़ी सेवाओं की गुणवत्ता शामिल हैं. इन मुद्दों का सीधा संबंध लोगों के दैनिक जीवन से है, इसलिए चुनावों में इनका बड़ा प्रभाव दिखाई देता है.
मतदाताओं का मूड भी इस क्षेत्र में काफी स्पष्ट रहता है. यहां के लोग चाहते हैं कि उनका विधायक (MLA) लगातार इलाके में दिखाई दे और आसानी से उपलब्ध रहे. नगर निगम और TNEB (तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड) के साथ मिलकर पानी, बिजली और अन्य शहरी सेवाओं की समस्याओं का तुरंत समाधान किया जाए. लोग सेवा में किसी भी तरह की रुकावट को बर्दाश्त नहीं करते और चाहते हैं कि सरकारी कल्याण योजनाएं बिना देरी और बिना किसी भेदभाव के सभी तक पहुंचें. साथ ही, बारिश, आग या किसी दुर्घटना जैसी आपात स्थितियों में विधायक की जमीनी मौजूदगी भी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है. अगर शहर की बुनियादी समस्याओं की अनदेखी होती है, तो यह सीधे सत्तारूढ़ प्रतिनिधि के खिलाफ नाराजगी (anti-incumbency) में बदल जाती है.
R.krishnan
DMK
Pankaj Jain
MNM
Kalamani.m
NTK
Nota
NOTA
Aruna.m
AMMKMNKZ
Siva.k
TNLK
Pushpanantham.v
IND
Arunkumar.t
IND
Selvaraj.m
NGPP
Gnanaraj.m
IND
Krishnan.m
IND
Suriyakumar.k
IND
कमल हासन, जिन्हें लोग ‘उलगनायगन’ कहते हैं, ने अपने अभियान के जरिए साफ कर दिया कि यह चुनाव सिर्फ तमिलनाडु का नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य का सवाल है. उन्होंने परिसीमन के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए मुख्यमंत्री स्टालिन के रुख का समर्थन किया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु में लोकसभा में महिला आरक्षण बिल का संशोधन पारित न होने पर निराशा जाहिर करते दिखे. उन्होंने कांग्रेस और डीएमके को बिल न पारित होने का जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि ये लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और बीजेपी और एनडीए महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखेंगे.
Assembly Election Updates: असम, केरल और पुडुचेरी में चुनाव के बाद अब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हैं. पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे. जबकि तमिलनाडु की सभी 234 विधानसभा सीटों पर 23 अप्रैल को वोटिंग होगी. बंगाल में चुनावी पारा चढ़ने के बीच ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) को झटका लगा है. बंगाल के अल्पसंख्यक बहुल मुर्शिदाबाद जिले की जलांगी विधानसभा सीट से TMC विधायक अब्दुर रज्जाक ने गुरुवार को पार्टी छोड़ने का ऐलान किया है.
डीएमके ने काले झंडे लहराकर और परिसीमन विधेयक की प्रतियां जलाकर विरोध प्रदर्शन किया.16 अप्रैल को डीएमके की बैठकों में ‘काला रंग’ छाया रहा.
स्टालिन की डीएमके ने इस मुद्दे को 'नॉर्थ बनाम साउथ' के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है. पार्टी का कहना है कि परिसीमन पर केंद्र सरकार का फैसला क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को कमजोर कर सकता है.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र सरकार के परिसीमन बिल के खिलाफ कड़ा विरोध जताया है. उन्होंने नामक्कल में चुनाव प्रचार के दौरान बिल की प्रति जलाई और काला झंडा दिखाया. स्टालिन ने इसे तमिलों के खिलाफ फासीवादी कदम बताया और पूरे द्रविड़ क्षेत्र में आंदोलन फैलाने की चेतावनी दी. डीएमके नेताओं ने कहा कि ये बिल दक्षिण भारत के राजनीतिक अधिकारों को कमजोर करेगा और उत्तर भारत के वर्चस्व को बढ़ाएगा.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने वोटिंग से हफ्ता भर पहले परिसीमन का मुद्दा लपक लिया है. डीएमके की कैंपेन स्ट्रैटेजी बदल कर परिसीमन पर फोकस हो गई है, और काले झंडे के साथ विरोध प्रदर्शन हो रहा है. AIADMK को बचाव की मुद्रा में आना पड़ा है, जबकि टीवीके नेता विजय परिसीमन का जोरदार विरोध कर रहे हैं.
चेन्नई के टी नगर में जब विजय का रोड शो निकला, तो सड़कों का नजारा देखने लायक था. समर्थकों की भारी भीड़ और जबरदस्त उत्साह के बीच पूरा माहौल किसी फिल्मी सीन जैसा लग रहा था. विजय ने टी नगर में घूम-घूमकर प्रचार किया. इस सीट से उनके सबसे करीबी साथी आनंद चुनाव लड़ रहे हैं, जहां मुकाबला काफी कड़ा माना जा रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2029 के आम चुनाव से महिला आरक्षण कानून लागू करना चाहते हैं, और उसके लिए संसद के विशेष सत्र में संशोधन विधेयक लाए जा रहे हैं. एक विधेयक परिसीमन को लेकर है, जिसका विपक्षी दल खासकर दक्षिण भारत के नेता कड़ा विरोध कर रहे हैं - क्या बीजेपी ने कोई जोखिम भरा कदम बढ़ाया है?
तमिलनाडु के चुनावी रण में एडप्पादी पलानीस्वामी के लिए 2026 की यह जंग उनके राजनीतिक अस्तित्व की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाली है. ईपीएस अपनी 'स्ट्रॉन्गमैन' छवि और एनडीए के साथ के भरोसे जयललिता की विरासत को अपने नाम करने की कोशिश कर रहे हैं.