होसुर विधानसभा क्षेत्र( संख्या 55) तमिलनाडु का सबसे रणनीतिक सीमा-औद्योगिक विधानसभा क्षेत्र माना जाता है, क्योंकि यह बेंगलुरु की अर्थव्यवस्था का दक्षिणी विस्तार बन चुका है. यह एक उच्च जनसंख्या घनत्व, तेजी से बढ़ता, माइग्रेशन (प्रवासन) वाला, और उच्च आकांक्षाओं वाला शहरी-औद्योगिक सीट है, जहां वोटिंग का आधार पारंपरिक “वेलफेयर राजनीति” कम और नौकरी, इंफ्रास्ट्रक्चर, शहरी प्रशासन और जीवन की गुणवत्ता ज्यादा होती है. राजनीतिक और सामाजिक चरित्र की बात करें तो होसूर का व्यवहार एक सामान्य तमिलनाडु कस्बे की तरह नहीं, बल्कि एक मेट्रो जैसी सीट की तरह है.
यहां के मतदाताओं में मैन्युफैक्चरिंग और EV (इलेक्ट्रिक व्हीकल) सेक्टर के औद्योगिक मजदूर, बेंगलुरु आने-जाने वाले IT और व्हाइट-कॉलर प्रोफेशनल्स, बड़ी संख्या में माइग्रेंट वर्कफोर्स, मिडिल-क्लास अपार्टमेंट में रहने वाले परिवार, और शहर के किनारों पर मौजूद मूल कृषि समुदाय व OBC समूह शामिल हैं. यहां प्रभावशाली भूमिका निभाने वालों में इंडस्ट्रियल एसोसिएशन, अपार्टमेंट वेलफेयर ग्रुप, ट्रेड यूनियन, और शहरी सिविल सोसाइटी आते हैं. वोटिंग पैटर्न शहरी, मुद्दा-आधारित और काफी अस्थिर (volatile) रहता है, तथा यहां जाति आधारित मजबूत एकजुटता अपेक्षाकृत कमजोर दिखती है.
भौगोलिक स्थिति और कनेक्टिविटी के हिसाब से होसूर NH-44 पर स्थित है और इसके पास मजबूत सड़क, रेल और बस नेटवर्क है, साथ ही SIPCOT के औद्योगिक चरणों से इसका सीधा जुड़ाव है और बेंगलुरु एयरपोर्ट भी पास है. लेकिन इसके बावजूद सीमा क्षेत्र की भारी ट्रैफिक भीड़, पानी का तनाव, ड्रेनेज की कमियां और अनियोजित शहरी फैलाव (urban sprawl) यहां की बड़ी समस्याएं हैं. होसूर के प्रमुख इलाकों में शहर का मुख्य कोर एरिया, SIPCOT औद्योगिक बेल्ट, वर्कर हाउसिंग कॉलोनियाँ, IT/व्हाइट-कॉलर रेजिडेंशियल लेआउट, और वे परि-शहरी गांव शामिल हैं जो धीरे-धीरे शहर की सीमा में शामिल हो गए हैं. इन सभी इलाकों की राजनीतिक अपेक्षाएं अलग-अलग रहती हैं. “हॉटस्पॉट्स” यानी पहचान वाले स्थानों में प्रसिद्ध मंदिर (श्री चंद्रचूड़ेश्वर, मुरुगन, प्रत्यंगिरा), बांध (केलावरापल्ली, पंचापल्ली), प्राकृतिक स्थल जैसे ब्रह्मा हिल्स और मुथनल्लूर झील, तथा ऐतिहासिक जगहों में राजाजी मेमोरियल शामिल हैं.
मुख्य मुद्दों में मतदाताओं की चिंता ट्रैफिक और रोज के कम्यूट टाइम, पीने के पानी की सप्लाई, ड्रेनेज व जलभराव/बाढ़, ठोस कचरा प्रबंधन, किफायती आवास, और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता को लेकर रहती है. होसूर एक शहरी-औद्योगिक, माइग्रेशन-भारी सीट है जहां जीत-हार के अंतर अक्सर बहुत कम होते हैं, मतदाता का मूड तेजी से बदल सकता है और यह सीट उम्मीदवार की काबिलियत को लेकर बेहद संवेदनशील है. होसूर एयरपोर्ट में देरी भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा है, जिसमें DMK का आरोप है कि केंद्र सरकार जानबूझकर इस प्रोजेक्ट को रोक रही है.
मतदाता मूड की बात करें तो औद्योगिक मजदूर, प्रोफेशनल्स, महिलाएं, युवा और माइग्रेंट मतदाता आमतौर पर विचारधारा से ज्यादा व्यावहारिक, काम करने वाले और समस्या सुलझाने वाले उम्मीदवारों को पसंद करते हैं. होसूर जीतने के लिए शहरी स्तर पर माइक्रो-टार्गेटिंग जरूरी होती है, जिसमें ट्रैफिक डीकंजेशन, टिकाऊ पानी की व्यवस्था, बाढ़/जलभराव नियंत्रण, अस्पताल विस्तार, किफायती आवास, स्किल डेवलपमेंट और टेक्नोलॉजी-आधारित शिकायत निवारण (grievance redressal) जैसे मुद्दों पर स्पष्ट और भरोसेमंद काम का रोडमैप सबसे निर्णायक साबित होता है.
Jyothi S
ADMK
Geetha Lakshmi S
NTK
Masood S
MNM
Nota
NOTA
Maregowdu M
AMMKMNKZ
Ramaswamy G C
IND
Muthu R K
IND
Ezhilan S
VTVTK
Muthamizh Mudhalvan S
IND
Lokesh V
IND
Selvam G
NGPP
Balaraju N
IND
Sundar L
SHS
Shanmugam R
IND
Devappa Y
IND
Geetha V
IND
Jayaseelan G
APTADMK
Kishore Kumar R
IND
कमल हासन, जिन्हें लोग ‘उलगनायगन’ कहते हैं, ने अपने अभियान के जरिए साफ कर दिया कि यह चुनाव सिर्फ तमिलनाडु का नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य का सवाल है. उन्होंने परिसीमन के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए मुख्यमंत्री स्टालिन के रुख का समर्थन किया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु में लोकसभा में महिला आरक्षण बिल का संशोधन पारित न होने पर निराशा जाहिर करते दिखे. उन्होंने कांग्रेस और डीएमके को बिल न पारित होने का जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि ये लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और बीजेपी और एनडीए महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखेंगे.
Assembly Election Updates: असम, केरल और पुडुचेरी में चुनाव के बाद अब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हैं. पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे. जबकि तमिलनाडु की सभी 234 विधानसभा सीटों पर 23 अप्रैल को वोटिंग होगी. बंगाल में चुनावी पारा चढ़ने के बीच ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) को झटका लगा है. बंगाल के अल्पसंख्यक बहुल मुर्शिदाबाद जिले की जलांगी विधानसभा सीट से TMC विधायक अब्दुर रज्जाक ने गुरुवार को पार्टी छोड़ने का ऐलान किया है.
डीएमके ने काले झंडे लहराकर और परिसीमन विधेयक की प्रतियां जलाकर विरोध प्रदर्शन किया.16 अप्रैल को डीएमके की बैठकों में ‘काला रंग’ छाया रहा.
स्टालिन की डीएमके ने इस मुद्दे को 'नॉर्थ बनाम साउथ' के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है. पार्टी का कहना है कि परिसीमन पर केंद्र सरकार का फैसला क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को कमजोर कर सकता है.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र सरकार के परिसीमन बिल के खिलाफ कड़ा विरोध जताया है. उन्होंने नामक्कल में चुनाव प्रचार के दौरान बिल की प्रति जलाई और काला झंडा दिखाया. स्टालिन ने इसे तमिलों के खिलाफ फासीवादी कदम बताया और पूरे द्रविड़ क्षेत्र में आंदोलन फैलाने की चेतावनी दी. डीएमके नेताओं ने कहा कि ये बिल दक्षिण भारत के राजनीतिक अधिकारों को कमजोर करेगा और उत्तर भारत के वर्चस्व को बढ़ाएगा.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने वोटिंग से हफ्ता भर पहले परिसीमन का मुद्दा लपक लिया है. डीएमके की कैंपेन स्ट्रैटेजी बदल कर परिसीमन पर फोकस हो गई है, और काले झंडे के साथ विरोध प्रदर्शन हो रहा है. AIADMK को बचाव की मुद्रा में आना पड़ा है, जबकि टीवीके नेता विजय परिसीमन का जोरदार विरोध कर रहे हैं.
चेन्नई के टी नगर में जब विजय का रोड शो निकला, तो सड़कों का नजारा देखने लायक था. समर्थकों की भारी भीड़ और जबरदस्त उत्साह के बीच पूरा माहौल किसी फिल्मी सीन जैसा लग रहा था. विजय ने टी नगर में घूम-घूमकर प्रचार किया. इस सीट से उनके सबसे करीबी साथी आनंद चुनाव लड़ रहे हैं, जहां मुकाबला काफी कड़ा माना जा रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2029 के आम चुनाव से महिला आरक्षण कानून लागू करना चाहते हैं, और उसके लिए संसद के विशेष सत्र में संशोधन विधेयक लाए जा रहे हैं. एक विधेयक परिसीमन को लेकर है, जिसका विपक्षी दल खासकर दक्षिण भारत के नेता कड़ा विरोध कर रहे हैं - क्या बीजेपी ने कोई जोखिम भरा कदम बढ़ाया है?
तमिलनाडु के चुनावी रण में एडप्पादी पलानीस्वामी के लिए 2026 की यह जंग उनके राजनीतिक अस्तित्व की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाली है. ईपीएस अपनी 'स्ट्रॉन्गमैन' छवि और एनडीए के साथ के भरोसे जयललिता की विरासत को अपने नाम करने की कोशिश कर रहे हैं.