इरोड पूर्व विधानसभा क्षेत्र (संख्या 98) एक पूरी तरह शहरी सीट है, जहां चुनाव जीतने का आधार विचारधारा नहीं बल्कि मतदान प्रतिशत बढ़ाना, कल्याणकारी योजनाओं का भरोसा और रोजाना जमीनी मौजूदगी होता है. यहां मतदाता इस बात को ज्यादा महत्व देते हैं कि कौन सत्ता तक पहुंच दिला सकता है और किसके रहते सरकारी लाभ लगातार मिलते रहेंगे. इसलिए यहां जीत का फार्मूला अक्सर “टर्नआउट मैनेजमेंट -वेलफेयर पर भरोसा” माना जाता है.
इरोड का ऐतिहासिक महत्व भी बहुत बड़ा है क्योंकि यह समाज सुधारक ई. वी. रामासामी (पेरियार) का जन्मस्थान है. उनकी 100 साल पुरानी पुश्तैनी हवेली, जिसे आज थंथई पेरियार मेमोरियल हाउस के रूप में संरक्षित किया गया है, पेरियार स्ट्रीट पर स्थित है. यह अब एक संग्रहालय है, जहां उनके जीवन से जुड़ी तस्वीरें, निजी वस्तुएं और ऐतिहासिक दस्तावेज प्रदर्शित हैं. तमिलनाडु के सामाजिक सुधार आंदोलन में रुचि रखने वाले लोग यहां बड़ी संख्या में आते हैं.
तमिलनाडु का इरोड पूर्व विधानसभा क्षेत्र हाल के वर्षों में लगातार उपचुनावों के कारण चर्चा में रहा है. पहले उपचुनाव की नौबत कांग्रेस विधायक ई. थिरुमहान एवराआ (ईवीकेएस थिरुमगन) के निधन के बाद आई. 2023 में हुए उपचुनाव में उनके पिता और वरिष्ठ कांग्रेस नेता ई. वी. के. एस. एलंगोवन इस सीट से चुने गए. लेकिन उनके निधन के बाद सीट फिर खाली हो गई और दोबारा उपचुनाव कराना पड़ा. इस पुनः चुनाव में चंद्रकुमार ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की ओर से जीत हासिल की.
राजनीतिक और सामाजिक चरित्र की बात करें तो इस क्षेत्र में कुछ मतदाता समूह बेहद प्रभावशाली हैं. मुस्लिम समुदाय यहां निर्णायक भूमिका निभाता है और मतदान केंद्रों पर उनका अनुशासित मतदान पैटर्न देखा जाता है. ईसाई मतदाता भी संगठित हैं और उनका टर्नआउट अच्छा रहता है. इसके अलावा शहरी व्यापारी और वस्त्र कारोबारी, शहरी अनुसूचित जाति बस्तियां, ऑटो चालक, सेवा क्षेत्र के कर्मचारी और दिहाड़ी मजदूर, तथा महिला कल्याण योजनाओं की लाभार्थी महिलाएं भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करती हैं. यहां का चुनावी समीकरण अक्सर अल्पसंख्यक मतदाता का उच्च मतदान और कल्याण योजनाओं पर भरोसा के चलते जीत के रूप में देखा जाता है.
भौगोलिक दृष्टि से यह एक पूरी तरह शहरी और सघन क्षेत्र है. मतदान केंद्रों की संख्या अधिक है और दूरी कम होने के कारण बूथ-स्तर की रणनीति बेहद अहम हो जाती है. यहां पुराना शहर, बाजार की गलियां और आवासीय कॉलोनियां शामिल हैं. इस क्षेत्र पर कृषि का कोई प्रभाव नहीं है. बड़े-बड़े जनसभाओं से ज्यादा वार्ड स्तर पर सक्रिय मौजूदगी और सीधा संपर्क महत्वपूर्ण होता है.
महत्वपूर्ण स्थानों और चुनावी हॉटस्पॉट में पेरियार म्यूजियम, पुराने शहर और बाजार क्षेत्र (जहां व्यापारियों और अल्पसंख्यकों की आबादी अधिक है), मुस्लिम बहुल आवासीय इलाके, ईसाई संस्थागत क्षेत्र, शहरी अनुसूचित जाति बस्तियां, झुग्गी पुनर्विकास और किराये के आवास क्लस्टर, तथा मिश्रित मध्यमवर्गीय वार्ड शामिल हैं. हर इलाके की अपनी अलग प्राथमिकताएं हैं, लेकिन कल्याणकारी योजनाएँ सभी वर्गों को जोड़ने वाला साझा मुद्दा हैं.
मुख्य मुद्दों में महिलाओं के लिए ₹1000 योजना और पेंशन जैसी कल्याणकारी योजनाओं की निरंतरता, बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत, छोटे व्यापारियों पर कर्ज और GST का दबाव, नाली-सड़क-पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं, सरकारी अस्पतालों तक आसान पहुंच, स्कूलों में दाखिला और फीस का मुद्दा, तथा आवास और किराये का बढ़ता दबाव शामिल हैं.
मतदाता मूड साफ है. यहां का विधायक हर सप्ताह क्षेत्र में दिखना चाहिए. लोगों को अधिकारियों तक आसान पहुंच मिलनी चाहिए और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ी शिकायतों का तुरंत समाधान होना चाहिए. त्योहारों और सामुदायिक कार्यक्रमों में उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है. वार्ड-स्तर पर नियमित शिकायत निवारण बैठकें जरूरी हैं. यदि विधायक की उपस्थिति कम हो जाए तो तुरंत एंटी-इनकंबेंसी बनती है. यहां “तटस्थ मतदाता” जैसा कोई वर्ग नहीं माना जाता, हर वोट किसी न किसी तरफ स्पष्ट रूप से जाता है.
Yuvaraja,m.
ADMK
Gomathi,s.
NTK
Rajakumar,a.m.r
MNM
Nota
NOTA
Muthukumaran,s.a.
AMMKMNKZ
Arumuga Ac Kannan
APoI
Govindaraj,s.
BSP
Meenakshi,v.
IND
Shajahan,i.
IND
Yuvaraj,m.
IND
Shanmugavel,s.
MGRMKKT
Raja,p.
MTMK
Antony Peter,l.
IND
Minnal Murugesh,r.
IND
कमल हासन, जिन्हें लोग ‘उलगनायगन’ कहते हैं, ने अपने अभियान के जरिए साफ कर दिया कि यह चुनाव सिर्फ तमिलनाडु का नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य का सवाल है. उन्होंने परिसीमन के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए मुख्यमंत्री स्टालिन के रुख का समर्थन किया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु में लोकसभा में महिला आरक्षण बिल का संशोधन पारित न होने पर निराशा जाहिर करते दिखे. उन्होंने कांग्रेस और डीएमके को बिल न पारित होने का जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि ये लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और बीजेपी और एनडीए महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखेंगे.
Assembly Election Updates: असम, केरल और पुडुचेरी में चुनाव के बाद अब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हैं. पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे. जबकि तमिलनाडु की सभी 234 विधानसभा सीटों पर 23 अप्रैल को वोटिंग होगी. बंगाल में चुनावी पारा चढ़ने के बीच ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) को झटका लगा है. बंगाल के अल्पसंख्यक बहुल मुर्शिदाबाद जिले की जलांगी विधानसभा सीट से TMC विधायक अब्दुर रज्जाक ने गुरुवार को पार्टी छोड़ने का ऐलान किया है.
डीएमके ने काले झंडे लहराकर और परिसीमन विधेयक की प्रतियां जलाकर विरोध प्रदर्शन किया.16 अप्रैल को डीएमके की बैठकों में ‘काला रंग’ छाया रहा.
स्टालिन की डीएमके ने इस मुद्दे को 'नॉर्थ बनाम साउथ' के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है. पार्टी का कहना है कि परिसीमन पर केंद्र सरकार का फैसला क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को कमजोर कर सकता है.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र सरकार के परिसीमन बिल के खिलाफ कड़ा विरोध जताया है. उन्होंने नामक्कल में चुनाव प्रचार के दौरान बिल की प्रति जलाई और काला झंडा दिखाया. स्टालिन ने इसे तमिलों के खिलाफ फासीवादी कदम बताया और पूरे द्रविड़ क्षेत्र में आंदोलन फैलाने की चेतावनी दी. डीएमके नेताओं ने कहा कि ये बिल दक्षिण भारत के राजनीतिक अधिकारों को कमजोर करेगा और उत्तर भारत के वर्चस्व को बढ़ाएगा.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने वोटिंग से हफ्ता भर पहले परिसीमन का मुद्दा लपक लिया है. डीएमके की कैंपेन स्ट्रैटेजी बदल कर परिसीमन पर फोकस हो गई है, और काले झंडे के साथ विरोध प्रदर्शन हो रहा है. AIADMK को बचाव की मुद्रा में आना पड़ा है, जबकि टीवीके नेता विजय परिसीमन का जोरदार विरोध कर रहे हैं.
चेन्नई के टी नगर में जब विजय का रोड शो निकला, तो सड़कों का नजारा देखने लायक था. समर्थकों की भारी भीड़ और जबरदस्त उत्साह के बीच पूरा माहौल किसी फिल्मी सीन जैसा लग रहा था. विजय ने टी नगर में घूम-घूमकर प्रचार किया. इस सीट से उनके सबसे करीबी साथी आनंद चुनाव लड़ रहे हैं, जहां मुकाबला काफी कड़ा माना जा रहा है.
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तमिलनाडु के चुनावी रण में एडप्पादी पलानीस्वामी के लिए 2026 की यह जंग उनके राजनीतिक अस्तित्व की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाली है. ईपीएस अपनी 'स्ट्रॉन्गमैन' छवि और एनडीए के साथ के भरोसे जयललिता की विरासत को अपने नाम करने की कोशिश कर रहे हैं.