मां ब्रह्मचारिणी की कथा और उनका तप इतना प्रेरणादायक है कि इसे सुनते ही भक्तों के मन में भी तप और साधना करने की शक्ति जाग उठती है. माता की भक्ति करने से जीवन में संयम, शक्ति, सात्विकता और आत्मविश्वास बढ़ता है.
मां ब्रह्मचारिणी की कथा और उनका तप इतना प्रेरणादायक है कि इसे सुनते ही भक्तों के मन में भी तप और साधना करने की शक्ति जाग उठती है. माता की भक्ति करने से जीवन में संयम, शक्ति, सात्विकता और आत्मविश्वास बढ़ता है.
कथा के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी पर्वतराज हिमालय के घर में जन्मी थीं. इसके बाद उन्होंने नारद जी से उपदेश लेकर भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की. कठोर तपस्या की कारण ही उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा जाता है. कहा जाता है कि देवी ने अपनी तपस्या के पहले हजार वर्षों तक केवल फल फूल खाकर बिताएं, फिर सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया और इसके बाद उन्होंने वर्षा, धूप, की परवाह किए बिना अपना तप जारी रखा.
कई हजार सालों तक उन्होंने सिर्फ टूटे बिल्वपत्र खाए और निरंतर भगवान शिव की पूजा करती रहीं. अंत में उन्होंने बिल्वपत्र खाना भी छोड़ दिया और फिर निर्जल और निराहार रहकर तपस्या करने लगीं. देवी की कठोर तपस्या से उनका शरीर एकदम क्षीण हो गया था. बात में उन्होंने पत्ते खाने भी बंद कर दिए तब देवी का नाम अपर्णा रखा गया.
देवी की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ऋषि, मुनि और सिद्ध गणों ने उन्हें प्रणाम किया और कहा देवी आपको इस कठोर तपस्या का फल अवश्य मिलेगा और महादेव आपको पति के रूप में अवश्य ही प्राप्त होंगे.
ब्रह्मचारिणी जी की आरती
जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।
ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो।
ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सकल संसारा।
जय गायत्री वेद की माता। जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।
कमी कोई रहने न पाए। कोई भी दुख सहने न पाए।
उसकी विरति रहे ठिकाने। जो तेरी महिमा को जाने।
रुद्राक्ष की माला ले कर। जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।
आलस छोड़ करे गुणगाना। मां तुम उसको सुख पहुंचाना।
ब्रह्माचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम।
भक्त तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी
--------समाप्त-------