कुन्नूर निर्वाचन क्षेत्र (संख्या 110), नीलगिरि जिले के पूर्वी हिस्से में स्थित है. यह तमिलनाडु के सबसे अलग और खास पहाड़ी क्षेत्रों में से एक माना जाता है. यह इलाका अंग्रेजों के समय की बसावट, चाय बागान आधारित अर्थव्यवस्था और एक मजबूत नागरिक संस्कृति के लिए जाना जाता है. ऊटी और मेत्तूपलयम के बीच स्थित कुन्नूर, जिले का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक, शैक्षणिक और आवासीय केंद्र है, साथ ही यह पहाड़ों से मैदानों तक जाने का मुख्य रास्ता भी है.
यह क्षेत्र अपने चाय बागानों, रक्षा प्रतिष्ठानों और सुहावने मौसम के लिए प्रसिद्ध है. यहां पर्यटन के लिए लोग भी आते हैं, लेकिन सिर्फ पर्यटकों पर निर्भर नहीं है, यहां स्थायी रूप से रहने वाली आबादी भी बड़ी है. इसलिए यहां रोजमर्रा की समस्याएं जैसे मकान, सड़कें, स्वास्थ्य सेवाएं और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितना कि सीजन में आने वाले पर्यटकों का दबाव.
राजनीतिक और सामाजिक रूप से, कुन्नूर के मतदाता समझदार और मुद्दों पर ध्यान देने वाले माने जाते हैं. यहां सरकारी कर्मचारी, बागान मजदूर, व्यापारी, छोटे व्यवसायी, रक्षा परिवार और लंबे समय से बसे पहाड़ी समुदाय मिलकर समाज का आधार बनाते हैं. यहां वोटिंग ज्यादातर स्थानीय समस्याओं पर आधारित होती है.
भौगोलिक रूप से यह इलाका ढलानों, जंगलों और घनी बसी पहाड़ी बस्तियों से बना है. ऊटी को जोड़ने वाला मेट्टुपालयम-कुन्नूर-ऊटी घाट रोड यहां की मुख्य सड़क है, जिससे रोज लोग, पर्यटक और सामान का आवागमन होता है.नीलगिरि पर्वतीय रेल भी यहां एक महत्वपूर्ण धरोहर और परिवहन का साधन है. लेकिन यहां अक्सर भूस्खलन, मिट्टी का कटाव और बारिश में सड़कों को नुकसान जैसी समस्याएं आती रहती हैं. पहाड़ी इलाका होने और जंगल के नियमों के कारण विकास के लिए जगह भी सीमित है.
इस क्षेत्र के मुख्य इलाके में कुन्नूर टाउन मार्केट, वेलिंगटन कैंटोनमेंट, अरुवनकाडु के रक्षा क्षेत्र, केट्टी वैली की बस्तियां, लवडेल का शैक्षणिक क्षेत्र, घाट रोड और नीलगिरी माउंटेन रेलवे के स्टेशन शामिल है.
मुख्य समस्याओं में भूस्खलन और ढलानों की अस्थिरता, बारिश में खराब ड्रेनेज और सड़कें, शहर में ट्रैफिक जाम, सस्ते घरों की कमी, कचरा और प्लास्टिक प्रदूषण, पर्यटन के समय पानी की कमी, युवाओं के लिए रोजगार के सीमित अवसर और अस्पतालों में क्षमता की कमी शामिल हैं.
मतदाताओं का रुझान भी साफ दिखता है. लोग अच्छी सड़कें और ड्रेनेज चाहते हैं, बागान मजदूर बेहतर आवास और नौकरी की सुरक्षा चाहते हैं, युवा पढ़ाई से जुड़े रोजगार के मौके ढूंढते हैं, महिलाएं पानी, सफाई और सुरक्षा को प्राथमिकता देती हैं, जबकि बुजुर्ग बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग करते हैं. जमीनी स्तर पर यह भी देखा गया है कि अल्पसंख्यक वोटरों में कोई बड़ा बदलाव नहीं है और वे अब भी DMK के साथ जुड़े हुए हैं, हालांकि सरकार से उनकी अपेक्षाएं पूरी तरह पूरी नहीं हो पा रही हैं.
राजनीतिक रूप से यह सीट बदलती रहती है. DMK ने 2011 और 2021 में जीत हासिल की, जबकि AIADMK ने 2016 और उससे पहले के चुनाव जीते. DMK ने यहां ज्यादा बार जीत दर्ज की है, लेकिन जब AIADMK का उम्मीदवार लोगों से अच्छा जुड़ता है, तो उसे भी समर्थन मिल जाता है.
Vinoth, D.
ADMK
Lavanya, M.
NTK
Rajakumar, H.b.
MNM
Kalaiselvan, S.
AMMKMNKZ
Nota
NOTA
Jayaprakash, D
IND
Arumugam, R.
AMPK
Prabhu Inbadass, S.
AITC
Basha, A.
IND
Chandran, K.
IND
कमल हासन, जिन्हें लोग ‘उलगनायगन’ कहते हैं, ने अपने अभियान के जरिए साफ कर दिया कि यह चुनाव सिर्फ तमिलनाडु का नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य का सवाल है. उन्होंने परिसीमन के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए मुख्यमंत्री स्टालिन के रुख का समर्थन किया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु में लोकसभा में महिला आरक्षण बिल का संशोधन पारित न होने पर निराशा जाहिर करते दिखे. उन्होंने कांग्रेस और डीएमके को बिल न पारित होने का जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि ये लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और बीजेपी और एनडीए महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखेंगे.
Assembly Election Updates: असम, केरल और पुडुचेरी में चुनाव के बाद अब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हैं. पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे. जबकि तमिलनाडु की सभी 234 विधानसभा सीटों पर 23 अप्रैल को वोटिंग होगी. बंगाल में चुनावी पारा चढ़ने के बीच ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) को झटका लगा है. बंगाल के अल्पसंख्यक बहुल मुर्शिदाबाद जिले की जलांगी विधानसभा सीट से TMC विधायक अब्दुर रज्जाक ने गुरुवार को पार्टी छोड़ने का ऐलान किया है.
डीएमके ने काले झंडे लहराकर और परिसीमन विधेयक की प्रतियां जलाकर विरोध प्रदर्शन किया.16 अप्रैल को डीएमके की बैठकों में ‘काला रंग’ छाया रहा.
स्टालिन की डीएमके ने इस मुद्दे को 'नॉर्थ बनाम साउथ' के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है. पार्टी का कहना है कि परिसीमन पर केंद्र सरकार का फैसला क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को कमजोर कर सकता है.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र सरकार के परिसीमन बिल के खिलाफ कड़ा विरोध जताया है. उन्होंने नामक्कल में चुनाव प्रचार के दौरान बिल की प्रति जलाई और काला झंडा दिखाया. स्टालिन ने इसे तमिलों के खिलाफ फासीवादी कदम बताया और पूरे द्रविड़ क्षेत्र में आंदोलन फैलाने की चेतावनी दी. डीएमके नेताओं ने कहा कि ये बिल दक्षिण भारत के राजनीतिक अधिकारों को कमजोर करेगा और उत्तर भारत के वर्चस्व को बढ़ाएगा.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने वोटिंग से हफ्ता भर पहले परिसीमन का मुद्दा लपक लिया है. डीएमके की कैंपेन स्ट्रैटेजी बदल कर परिसीमन पर फोकस हो गई है, और काले झंडे के साथ विरोध प्रदर्शन हो रहा है. AIADMK को बचाव की मुद्रा में आना पड़ा है, जबकि टीवीके नेता विजय परिसीमन का जोरदार विरोध कर रहे हैं.
चेन्नई के टी नगर में जब विजय का रोड शो निकला, तो सड़कों का नजारा देखने लायक था. समर्थकों की भारी भीड़ और जबरदस्त उत्साह के बीच पूरा माहौल किसी फिल्मी सीन जैसा लग रहा था. विजय ने टी नगर में घूम-घूमकर प्रचार किया. इस सीट से उनके सबसे करीबी साथी आनंद चुनाव लड़ रहे हैं, जहां मुकाबला काफी कड़ा माना जा रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2029 के आम चुनाव से महिला आरक्षण कानून लागू करना चाहते हैं, और उसके लिए संसद के विशेष सत्र में संशोधन विधेयक लाए जा रहे हैं. एक विधेयक परिसीमन को लेकर है, जिसका विपक्षी दल खासकर दक्षिण भारत के नेता कड़ा विरोध कर रहे हैं - क्या बीजेपी ने कोई जोखिम भरा कदम बढ़ाया है?
तमिलनाडु के चुनावी रण में एडप्पादी पलानीस्वामी के लिए 2026 की यह जंग उनके राजनीतिक अस्तित्व की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाली है. ईपीएस अपनी 'स्ट्रॉन्गमैन' छवि और एनडीए के साथ के भरोसे जयललिता की विरासत को अपने नाम करने की कोशिश कर रहे हैं.