सक्सेस स्टोरी
हर इंसान अपने जीवन में सफलता पाना चाहता है. मनुष्य का यह सपना होता है कि वह जीवन में एक सफल व्यक्ति की तरह अपना जीवन व्यतीत करे. इंसान अपने जीवन में किसी न किसी के पद चिन्हों पर चल कर उसी की तरह सफल होना चहता है (Success).
बहुत से लोगों के लिए सफलता पाना आसान होता है लेकिन दुनिया में कई ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने सफलता पाने के लिए कड़ी मेहनत की हैं. कई लोग तो अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लेते हैं कि उन्हें सफल हर कीमत पर होना है (Dream for Success).
लेकिन वास्तविक जीवन में सफल होना या सफलता पाना इतना आसान नहीं होता है. दुनिया में कई ऐसे व्यक्तियों की कहानी हमें पढ़ने या सुनने को मिलती हैं जिन्होंने सफलता हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत की. उनके संघर्ष की कहानी काफी लोगों को प्रेरणा देती है. संघर्षरत लोग उनके जीवन के बारे में जानकर या पढ़कर खुद को अपने जीवन का आइकन बनाते हैं और उनके नक्शे-कदम पर चलकर सफलता हासिल करते हैं (Success Story).
देश और दुनिया में कई सफल व्यक्तियों के Success Story प्रकाशित होते है जिसे पढ़ कर उनकी Success Story मे से कुछ सीख कर अपने जीवनशैली में परिवर्तन लाकर अपना मुकाम हासिल कर सकते हैं.
सोचिए आपने कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली हो और आपकी नौकरी की शुरुआत 13 लाख रुपये के सालाना के पैकेज से हो. ज्यादातर छात्र इसकी अहमियत अच्छे से जानते होंगे लेकिन कई बार जब आपके दिमाग में कुछ और मजबूत करने का प्लान हो तो आपके लिए इन चीजों को छोड़ना आसान हो जाता है. इतने बड़े पैकेज को छोड़कर आदित्य अरेपल्ली ने AI से जुड़ी पढ़ाई करने का फैसला किया, जिसके लिए उन्होंने अमेरिका जाकर मास्टर्स किया. पढ़ाई के साथ कोडिंग और प्रोजेक्ट्स पर काम किया. अब उनकी सैलरी इतनी बढ़ गई है कि इसे लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा तेज हो गई है.
पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं... यह कहावत आपने कभी न कभी अपने घर पर सुना ही होगा. लेकिन SDM राहुल सिन्हा का मानना है कि यह कहावत बिल्कुल गलत है. करीब 12 साल लगातार संघर्ष करने के बाद उन्होंने न केवल सरकारी नौकरी पाई बल्कि BPSC जैसा बड़ा एग्जाम पास कर लिया है.
जो स्टार्टअप कंपनी सोलर पैनल साफ करने वाले रोबोट बना रही थी वह कोविड की वजह से किसी अलग रास्ते पर ही निकल पड़ी. महामारी ने सब कुछ बदल दिया. महज 90 दिनों के भीतर, आईआईटी कानपुर के दो स्नातकों ने आईसीयू-ग्रेड वेंटिलेटर बनाया, जो आगे चलकर पूरे भारत के अस्पतालों की जरूरतों को पूरा करने में सहायक साबित हुआ.
18 साल की उम्र में जहां युवा आगे की पढ़ाई का सपना देखते हैं, वहां नाथन थॉमस ने कुछ ऐसा कर दिया है जो हर किसी को हैरान कर रहा है. उन्होंने केवल 18 साल 346 दिन की उम्र में दुनिया के सबसे कम उम्र के प्रोफेसर बन गए हैं. उनकी इस उपलब्धि से 306 साल पुराना रिकॉर्ड टूट गया है. केवल 10 साल की उम्र में उन्होंने कॉलेज में एडमिशन लिया और अब वह अपने ही उम्र के छात्रों को पढ़ा रहे .
बीटेक की पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने वाले एक व्यक्ति ने इस धारणा को चुनौती दी है कि अच्छी सैलरी वाली नौकरी पाने का एकमात्र रास्ता आईआईटी की डिग्री है. सोशल मीडिया एक्स पोस्ट में उन्होंने बताया कि इंजीनियरिंग छोड़ना उनके जीवन के सबसे अच्छे फैसलों में से एक क्यों साबित हुआ.
आप लगातार नौकरी के लिए अप्लाई कर रहे हैं और ये आंकड़ा 850 पर पहुंच जाए लेकिन फिर भी आपको नौकरी न मिले तो कैसा लगेगा? ऐसा ही कुछ हुआ दीर्घ कटारिया के साथ. वह न केवल 850 बार रिजेक्ट हुए हैं बल्कि 13 बार इंटरव्यू में फाइनल राउंड तक पहुंचकर फेल भी हुए हैं. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी है माइक्रोसॉफ्ट में शानदार पैकेज के साथ जॉब हासिल की.
कहते हैं कि जब हौसले बुलंद हो, तो आपको कुछ भी पीछे नहीं खींच सकता है. ऐसा ही कुछ हुआ है हैदराबाद के सौमिथ चिंतला के साथ. उन्होंने किसी IIT या NIT से पढ़ाई नहीं की. अमेरिका के 27 विश्वविद्यालयों ने उन्हें एडमिशन देने से मना कर दिया. इतना ही उन्हें वीजा से जुड़े कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. लेकिन आज के वह प्रभावशाली नामों में से एक हैं.
कभी जिस माइक्रोसॉफ्ट में नौकरी पाने का सपना था, वहीं तक पहुंचने का सफर प्राचिती पारकर के लिए आसान नहीं था. माइक्रोसॉफ्ट इंडिया से रिजेक्शन मिलने के बाद उन्होंने हार नहीं मानी और अमेरिका जाकर अपनी पढ़ाई kr. मेहनत और लगन के दम पर आखिरकार उन्हें माइक्रोसॉफ्ट यूएस में सॉफ्टवेयर इंजीनियर II के तौर पर काम करने का मौका मिला. हाल ही में उन्होंने अपने माता-पिता को वहां का माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस दिखाया है जहां पर पहुंचना उनके लिए कभी सपना हुआ करता था.
Mankind Pharma के फाउंडर रमेश जुनेजा का मंगलवार को जन्मदिन है. उनकी ये कंपनी आज देश की सबसे बड़ी फार्मा कंपनियों में एक है और इसका मार्केट वैल्यूएशन 1 लाख करोड़ रुपये के पार निकल चुका है.
बूंदी जिले के छोटे गांव पाली के कुंदन मीणा ने लॉकडाउन के दौरान खेती संभालते हुए NEET परीक्षा में 602 अंक प्राप्त कर देशभर में अपनी कैटेगरी में 65वीं रैंक हासिल की. किसान परिवार से आने वाले कुंदन ने आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद पढ़ाई को प्राथमिकता दी और कोटा में कड़ी मेहनत से मेडिकल प्रवेश परीक्षा में सफलता पाई. आइए जानते हैं सोने से तपकर कुंदन बनने की ये कहानी...
आर्यन का मानना है कि हर टेस्ट इंसान को उसकी कमजोरी दिखाता है और हर गलती सफलता के थोड़ा और करीब ले जाती है. हालांकि यह सफर बिल्कुल आसान नहीं था. कई बार टेस्ट में उम्मीद से कम अंक आए. कई बार आत्मविश्वास डगमगाया. कई बार ऐसा लगा कि शायद सपना अधूरा रह जाएगा. लेकिन हर बार उसके माता-पिता, बड़े भाई और शिक्षकों ने उसे संभाला.
सूरज सुमन की कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि सपनों की ऊंचाई आर्थिक हालात नहीं, बल्कि इंसान का हौसला तय करता है. जिन हाथों में कभी पुताई का ब्रश था, उन्हीं हाथों में अब स्टेथेस्कोप होगा. यह सफलता सिर्फ एक छात्र की नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो अभावों के बावजूद अपने सपनों को जिंदा रखे हुए हैं.
NEET यूजी 2026 में ऑल इंडिया रैंक 20 हासिल करने वाली हैदराबाद की वैष्णवी दास आज लाखों छात्रों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं. उन्होंने 720 में से 700 नंबर हासिल किए हैं. उन्होंने अपनी सफलता के बारे में बात करते हुए बताया कि जीवन में कुछ भी हासिल करने के लिए कोई शॉर्टकट नहीं है. इतनी ही नहीं नीट में सफल होने के लिए उन्होंने 11वीं में ही सोशल मीडिया से दूरी बना ली थी. इसके बाद उन्होंने लगातार मॉक टेस्ट दिए. उनकी इसी प्लानिंग ने उन्हें टॉप 20 में शामिल करने में सफल किया.
क्या चार साल की इंजीनियरिंग डिग्री आपके जीवन के अगले 40 साल तय कर सकती है? IIT (BHU) के एक पूर्व छात्र के वायरल बयान ने सोशल मीडिया को सोचने पर मजबूर कर दिया है. एक ओर करियर बदलने, IIT की डिग्री हासिल करने, शैक्षणिक दबाव और पेशेवरों की ओर से अपनी सच्ची रुचियों को आगे बढ़ाने के बढ़ते चलन पर चर्चा फिर से शुरू हो गई है.
कहते हैं कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती. 63 वर्ष की आयु में मैट्रिक कर सरपंच बनने का सपना. हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले की 63 वर्षीय सुशीला देवी ने इस कहावत को सच साबित कर दिखाया है. पांचवीं के बाद पढ़ाई छूट गई थी, लेकिन 58 साल बाद उन्होंने फिर से किताबें उठाईं और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) की 10वीं की परीक्षा में 79.6 प्रतिशत अंक हासिल कर प्रथम श्रेणी में सफलता हासिल की. उनका कहना है कि अपनी शिक्षा जारी रखने और सरपंच पद के लिए चुनाव लड़ने के करीब आने का मौका मिला.
'हालात की आंच पे, जिम्मेदारी के बर्तन में जब उम्र का दूध खौलता है, तब उसमें समझदारी की बहुत मोटी मलाई पड़ती है.' इन लाइनों को लिखने वाले ने जिंदगी के तजुर्बों को सिर्फ किताबों में पढ़ा नहीं, बल्कि जिया होगा. जब एक बेहद साधारण और गरीब परिवार का बच्चा अपने हालातों से जूझता है, तो उसके अंदर परिपक्वता समय से पहले आ जाती है.
इस साल टॉप-10 की लिस्ट में जगह बनाने वाले छात्रों की कहानियां बेहद दिलचस्प और प्रेरणा देने वाली हैं. किसी के पिता देश की सीमा पर रक्षा कर रहे हैं, तो कोई अपने गांव का पहला डॉक्टर बनने जा रहा है. आइए जानते हैं इन चमकते सितारों से कि आखिर उनकी सफलता का मूलमंत्र क्या रहा और उन्होंने किस रणनीति के साथ इस मुश्किल परीक्षा को क्रैक किया.
उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा में अंजलि केवल 10 सेकंड से सफल होने से चूक गई थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. हरदोई की रहने वाली किसान की बेटी अंजलि ने मुश्किल हालात और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच मेहनत जारी रखी. अपनी लगन और मेहनत के दम पर उन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस सब-इंस्पेक्टर (SI) की परीक्षा पास कर ली और अपनी असफलता को सफलता की प्रेरणादायक कहानी में बदल दिया.
कहते हैं कि अगर जुनून हो तो आप कोई भी काम कर सकते हैं. ऐसा ही कुछ कर दिखाया है आईआईटी मद्रास की एक छात्रा ने. डेटा साइंस की पढ़ाई करने वाली हसिथा नारायणभट्टा ने पढ़ाई के साथ-साथ ब्यूटी पेजेंट में भी अपनी पहचान बनाई है. उन्होंने मिस यूनिवर्स तेलंगाना 2026 का खिताब जीत लिया है. हसिथा का मानना है कि अगर जुनून और मेहनत हो, तो किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल की जा सकती है.
परिवार चलाने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती है. यह केवल कहने की बात नहीं है बल्कि सोशल मीडिया पर कई ऐसे मामले सामने आते रहे हैं. ऐसा ही एक मामला डॉक्टर ई तिरुमलई राजा का सामने आया है. वह तमिलनाडु के रहने वाले हैं. इंग्लिश लिटरेचर में PhD करने के बाद उन्हें केवल 30 हजार रुपये की कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी करनी पड़ रही है. इसके अलावा वह कई अन्य पोस्टग्रेजुएट और प्रोफेशनल डिग्री ले चुके हैं. पर अपना परिवार चलाने के लिए वह टैक्सी भी चलाते हैं.
किरन ने अपने जीवन में ट्यूशन पढ़ाने से लेकर स्कूल की लाइब्रेरी और कंपनियों में 12-12 घंटे की नौकरियां कीं. लेकिन आज वह किसी दफ्तर में नहीं, बल्कि ऑनलाइन डिजिटल ऐप्स के जरिए घरों में झाड़ू-पोछा, डस्टिंग और कुकिंग जैसे 'गिग वर्क' करके अपनी पुरानी सैलरी से दोगुना से भी ज्यादा कमा रही हैं. समय के साथ आए इस डिजिटल बदलाव ने कैसे एक महिला के बड़े संघर्ष को सफलता में बदला, आइए जानते हैं.