पूजा के समय मां शैलपुत्री की कथा का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इसका पाठ करने से साधक को पूजा का पूरा फल मिलता है और जीवन में सुख-समृद्धि व खुशियों का संचार होता है. आइए जानते हैं मां शैलपुत्री की पावन कथा.
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन करवाया था. इस यज्ञ में उन्होंने देवी-देवताओं को बुलाया, लेकिन अपने दामाद भगवान शिव को नहीं बुलाया, क्योंकि राजा दक्ष का महादेव से मतभेद रहता था, जिसकी वजह से वह भगवान शिव से गुस्सा रहते थे. यज्ञ में मां पार्वती जाना चाहती थीं, लेकिन महादेव ने जाने से इंकार किया. उन्होंने भगवान शिव की बात को नहीं माना और पिता के घर यज्ञ में शामिल होने के लिए चली गईं.
महादेव के अपमान के कारण मां पार्वती ने यज्ञ में कूदकर आहुति दे दी. भगवान शिव को जैसे ही इसके बारे में पता चला वो दुखी हो गए. दुख और गुस्से की ज्वाला में जलते हुए शिव ने उस यज्ञ को ध्वस्त कर दिया. इसी सती ने फिर हिमालय के यहां जन्म लिया और वहां जन्म लेने की वजह से इनका नाम शैलपुत्री पड़ा.
शैलपुत्री जी की आरती
शैलपुत्री मां बैल असवार। करें देवता जय जयकार।।
शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।।
पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।।
सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।।
उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।।
घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।।
जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।।
मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।।
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