उत्तर प्रदेश की राजनीति में जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे जातिगत समीकरणों को साधने की कवायद तेज हो गई है. सूबे की सियासत में अब यादव और कुर्मी के बाद ओबीसी में जिस एक अन्य पिछड़ी जाति की सबसे ज्यादा चर्चा इन दिनों हो रही है, वह 'पाल समाज' है, जिस पर निगाहें सपा से लेकर बीजेपी और बसपा तक की हैं.
यूपी में पाल समाज किसी एक दल के साथ नहीं है, बल्कि अलग-अलग सीट पर वोटिंग पैटर्न अलग-अलग नजर आता है. यूपी में पाल, बघेल और धनगर (गड़रिया) समाज को साधने की कवायद हो रही है. आइए जानते हैं कि यूपी के चुनावी रण में पाल समाज कितना असर रखता है और सत्ता में कितना दखल है.
पाल समाज की आबादी और क्या उपजाति है?
उत्तर प्रदेश में पाल समाज को आमतौर पर पाल, बघेल, धनगर और गड़रिया समुदाय के रूप में भी जाना जाता है. इस समाज के लोग क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग उपनामों और उपजातियों से पहचाने जाते हैं. इस समुदाय को अलग-अलग क्षेत्रों में मुख्य रूप से पारंपरिक व्यवसायों और उपनामों के आधार पर जाना जाता है. इनका पारंपरिक व्यवसाय पशुपालन का रहा है, खासकर गाय, बकरी और भेड़ को पालने का.
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यूपी में पाल-बघेल-धनगर-गड़रिया समाज की कुल आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 3 फीसदी से 4 फीसदी के आसपास मानी जाती है. सूबे में संख्या के लिहाज से यह आबादी करीब 2 करोड़ के आसपास बैठती है. ओबीसी वर्ग के भीतर यह एक बहुत बड़ा और निर्णायक मतदाता समूह है.
यूपी के किन इलाकों में पाल समाज का असर
पाल समाज अतिपिछड़ी जातियों में आता है, जिसे गड़रिया और बघेल जातियों के नाम से जाना जाता है. ब्रज और रुहेलखंड के जिलों में पाल समुदाय काफी अहम माना जाता है. कानपुर देहात, इटावा, प्रयागराज, औरैया, जालौन, ललितपुर, झांसी, महोबा, मीरजापुर, अलीगढ़, हाथरस, आगरा, कन्नौज, फर्रुखाबाद, बदायूं, बरेली और मुरादाबाद जैसे जिलों में इस समाज के मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है.
पाल वोटर अवध के फतेहपुर, रायबरेली और प्रतापगढ़ तमाम जिलों में 15 से 25 हजार की संख्या में रहते हैं, लेकिन विधानसभा सीटों पर उनकी संख्या 5 से 10 हजार है. इसके बावजूद यह काफी अहम वोटबैंक माने जाते हैं.
पाल समाज का राजनीतिक प्रभाव कितना
पाल समाज का प्रभाव उत्तर प्रदेश के दर्जनों जिलों में फैला हुआ है. यह समुदाय सूबे की करीब 35 से 40 विधानसभा सीटों पर सीधा निर्णायक असर रखता है, वह भले ही खुद जीत न सके, पर हार-जीत तय करने की ताकत रखता है.
यूपी में पाल समाज के छह विधायक हैं. सपा के टिकट पर 2022 में दो विधायक चुने गए थे, जिसमें समर पाल सिंह अमरोहा के नौगांवा सादात से जीते थे और पूजा पाल कौशांबी जिले की चायल सीट से विधायक बनी थीं. पूजा पाल ने बाद में सियासी पाला बदलकर बीजेपी खेमे का दामन थाम लिया है.
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बीजेपी से 2022 में अजीत सिंह पाल कानपुर देहात की सिकंदरा सीट से चुने गए और छर्रा सीट से रावेंद्र पाल सिंह जीते थे. प्रेमपाल धनगर फिरोजाबाद की टूंडला सीट से बीजेपी विधायक हैं. ऐसे ही उपचुनाव में आरएलडी के टिकट पर मिथिलेश पाल विधायक चुनी गईं. इसके अलावा स्थानीय निकाय चुनावों और जिला पंचायतों में पाल समाज का मजबूत दखल है.
अजीत पाल यूपी की योगी सरकार में स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री हैं, जबकि मोदी सरकार में एस.पी. सिंह बघेल केंद्रीय मंत्री हैं, जो आगरा से लोकसभा सांसद चुने गए थे. यूपी के पाल समुदाय से वह इकलौते लोकसभा सांसद हैं और अब बीजेपी ने प्रकाश पाल को राज्यसभा सांसद बनाया है, जो पार्टी के ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष रहे हैं.
यूपी में पाल समुदाय का वोटिंग पैटर्न समझें
उत्तर प्रदेश में पाल समुदाय कभी किसी एक दल के साथ नहीं रहा. शुरुआती दौर में यह कांग्रेस का परंपरागत वोटर रहा, लेकिन बसपा के उदय के बाद हाथी पर सवार हो गया. बसपा का गठन 1984 में कांशीराम ने किया था और 1995 में भागवत पाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था, और उसके बाद 1997 में दयाराम पाल ने पार्टी की कमान संभाली थी. अब 24 साल के बाद विश्वनाथ पाल को पार्टी की कमान मिली है और उनके कंधों पर ओबीसी समुदाय को जोड़ने का जिम्मा भी मायावती ने डाल दिया है.
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प्रयागराज से विधायक रहे राजू पाल को राजनीति में मायावती ने एंट्री कराई और आगे बढ़ाया. राजू पाल की हत्या के बाद पूजा पाल को आगे बढ़ाया गया. वह बसपा से विधायक बनीं, लेकिन बाद में सपा में शामिल हो गईं. यह समाज लंबे समय तक बसपा का कोर वोटबैंक माना जाता था, लेकिन बाद में बीजेपी के साथ जुड़ गया.
मायावती ने बसपा की कमान विश्वनाथ पाल को सौंपकर फिर से पाल जातियों का विश्वास जीतने का दांव चला है, तो सपा ने भी श्यामलाल पाल को आगे कर दिया है. 2022 में सपा को भी पाल समाज का वोट मिला है. पाल वोट के खिसकते आधार को देखते हुए बीजेपी भी अलर्ट हो गई है.
2027 के चुनाव में पाल समुदाय पर नजर
उत्तर प्रदेश के चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि जो भी दल अति पिछड़ी जातियों के बीच गहरी पैठ बनाने में कामयाब होता है, पलड़ा उसी का भारी रहता है. पाल समाज चूंकि आर्थिक और सामाजिक रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है, इसलिए हर पार्टी इस 'साइलेंट और मजबूत' वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए गोलबंदियां कर रही है.
पाल वोटों को साधे रखने के लिए बसपा से लेकर सपा तक ने अपने प्रदेश अध्यक्ष की कमान पाल समुदाय के नेताओं को सौंप रखी है. बसपा ने विश्वनाथ पाल को दूसरी बार प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, तो सपा ने श्यामलाल पाल को अपना प्रदेश अध्यक्ष 2024 के चुनाव में बनाया था. इसके अलावा बीजेपी ने पूजा पाल को प्रदेश संगठन में शामिल किया है, और प्रकाश पाल को राज्यसभा भेजकर सियासी संदेश दिया है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समाज से आने वाले नेताओं ने अपनी मजबूत पैठ बनाई है. समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों (जैसे बीजेपी और सपा) ने इस समाज के चेहरों को प्रदेश स्तर की बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारियां सौंपी हैं ताकि इस बहुमूल्य वोट बैंक को साधा जा सके. देखना यह होगा कि आगामी विधानसभा चुनाव में पाल-बघेल और धनगर समाज किसके सिर पर सत्ता का ताज सजाता है.