रायबरेली उत्तर प्रदेश का एक महत्वपूर्ण शहर और रायबरेली जिले का मुख्यालय है, जो सई नदी के किनारे स्थित है. राज्य के मध्य भाग में स्थित होने के कारण यह शहर लखनऊ, अयोध्या, कानपुर और प्रयागराज से जुड़ा हुआ है, जिससे क्षेत्रीय परिवहन और व्यापारिक नेटवर्क में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है. सरकारी संस्थानों, शैक्षणिक और चिकित्सा प्रतिष्ठानों तथा कई औद्योगिक इकाइयों ने इसकी आर्थिक भूमिका को बढ़ाया है. रायबरेली का राष्ट्रीय आंदोलन और गांधी परिवार के साथ भी लंबे समय से राजनीतिक और ऐतिहासिक संबंध रहा है.
1967 के चुनाव से पहले गठित रायबरेली एक सामान्य, यानी अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है और रायबरेली लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद इसमें रायबरेली तहसील के राही और नगर कानूनगो सर्किल के साथ अमावा कानूनगो सर्किल के निर्धारित हिस्से और पूरे रायबरेली नगर पालिका क्षेत्र को शामिल किया गया. ग्रामीण क्षेत्रों में जटुवा टप्पे बिजहवन, सिधौना, हरदासपुर, छिवला मऊ, बांदीपुर, समरहदा, घुरा दिह, कोरारस बुजुर्ग, रसेहटा, लोधवा मऊ और दुसौती पटवारी सर्किल के कुछ हिस्से शामिल हैं. यह विधानसभा क्षेत्र सामाजिक और आर्थिक रूप से मिश्रित स्वरूप वाला है, जिसमें जिला मुख्यालय के साथ बड़ा ग्रामीण क्षेत्र भी शामिल है.
रायबरेली विधानसभा क्षेत्र 1962 के चुनाव में दो अलग-अलग एक सदस्यीय सीटों, रायबरेली उत्तर और रायबरेली दक्षिण के रूप में मौजूद था. रायबरेली उत्तर से भारतीय जनसंघ के कृष्ण पाल सिंह और रायबरेली दक्षिण से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रति पाल ने जीत दर्ज की थी. 1967 के चुनाव से पहले दोनों सीटों को मिलाकर वर्तमान रायबरेली विधानसभा क्षेत्र बनाया गया.
1967 में एकल विधायक वाली सीट बनने के बाद रायबरेली में अब तक 15 विधानसभा चुनाव हुए हैं. कांग्रेस ने इनमें से 10 चुनाव जीते हैं, जिसमें 1967 से 1985 के बीच लगातार छह जीत शामिल हैं. जनता दल ने यह सीट दो बार जीती, जबकि एक निर्दलीय उम्मीदवार, पीस पार्टी ऑफ इंडिया और भाजपा ने एक-एक बार इस सीट पर जीत दर्ज की. व्यक्तिगत नेताओं में अखिलेश कुमार सिंह ने 1993 से 2012 के बीच लगातार पांच कार्यकाल जीते. उन्होंने तीन बार कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में और एक-एक बार निर्दलीय तथा पीस पार्टी ऑफ इंडिया के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता.
2012 में अखिलेश कुमार सिंह ने पीस पार्टी ऑफ इंडिया के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता और समाजवादी पार्टी के राम प्रताप यादव को 29,494 मतों से हराया. कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही और भाजपा, जो वर्तमान विधानसभा क्षेत्र में कभी नहीं जीती थी, पांचवें स्थान पर रही. 2007 के चुनाव से पहले अखिलेश सिंह को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया था. 2017 में उनके और कांग्रेस के बीच एक समझ बनी, जिसके तहत अमेरिका से शिक्षा प्राप्त उनकी बेटी अदिति सिंह ने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा. उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के मोहम्मद शाहबाज खान को 89,163 मतों से हराया.
अदिति सिंह के कांग्रेस के साथ वैचारिक मुद्दों को लेकर मतभेद बढ़ने के बाद उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया. उन्होंने 2021 में भाजपा का दामन थामा और पार्टी ने उन्हें 2022 के विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया. उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रतिद्वंद्वी राम प्रताप यादव को 7,175 मतों से हराया. उन्हें 1,02,429 मत मिले, जबकि राम प्रताप यादव को 95,254 मत मिले. कांग्रेस 14,954 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रही. इस जीत के साथ वर्तमान रायबरेली विधानसभा क्षेत्र में भाजपा ने पहली बार जीत दर्ज की, हालांकि उसकी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ 1962 में रायबरेली उत्तर सीट जीत चुकी थी.
1993 से विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस का प्रदर्शन अखिलेश कुमार सिंह और उनके परिवार से काफी हद तक जुड़ा रहा है. जब परिवार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ता था, तब पार्टी जीतती थी और जब परिवार कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ता था, तब पार्टी को हार का सामना करना पड़ता था. लोकसभा स्तर पर हालांकि कांग्रेस की स्थिति मजबूत बनी रही है. 2009 से 2024 के बीच हुए चारों लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने रायबरेली विधानसभा क्षेत्र में बढ़त हासिल की. इसमें गांधी परिवार का रायबरेली लोकसभा सीट से जुड़ा प्रभाव महत्वपूर्ण रहा. 2009 में कांग्रेस ने बहुजन समाज पार्टी पर 90,622 मतों की बढ़त हासिल की. 2014 में भाजपा पर कांग्रेस की बढ़त 95,618 मतों की रही, जबकि 2019 में भाजपा पर बढ़त 61,406 मतों की थी. 2024 में राहुल गांधी को इस विधानसभा क्षेत्र में 1,56,525 मत मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार दिनेश प्रताप सिंह को 53,508 मत मिले. इस तरह कांग्रेस को 1,03,017 मतों की बढ़त मिली.
रायबरेली के साथ गांधी परिवार का संबंध कई दशकों पुराना है. फिरोज गांधी ने 1952 और 1957 में लोकसभा सीट जीती थी. इसके बाद इंदिरा गांधी ने 1967, 1971 और 1980 में चुनाव जीता. सोनिया गांधी ने 2004 से 2019 के बीच लगातार पांच कार्यकाल जीते, जिसमें 2006 का उपचुनाव भी शामिल था. 2024 में राहुल गांधी ने रायबरेली लोकसभा सीट से जीत दर्ज की.
रायबरेली विधानसभा क्षेत्र में एक दशक से अधिक समय तक मतदाताओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई. पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 3,16,564 से बढ़कर 2017 में 3,51,324 और 2019 के लोकसभा चुनाव में 3,61,561 हो गई. 2022 के विधानसभा चुनाव में यह संख्या 3,66,267 थी और 2024 में 3,82,167 हो गई. 10 अप्रैल 2026 को विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 3,24,344 मतदाता थे. यह संख्या 2024 के 3,82,167 मतदाताओं की तुलना में 57,823 कम थी, यानी 15.13 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई.
मतदान प्रतिशत में उतार-चढ़ाव देखा गया है, हालांकि यह आम तौर पर मध्यम स्तर पर रहा है. 2012 में मतदान प्रतिशत 60.12 रहा, जबकि 2017 में यह 59.05 प्रतिशत था. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 53.88 प्रतिशत हो गया. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 62.88 हो गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में यह फिर घटकर 57.54 प्रतिशत रहा.
रायबरेली एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां अनुसूचित जाति की आबादी भी काफी है. अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 23.67 प्रतिशत है, जबकि मुस्लिम आबादी करीब 14.30 प्रतिशत और यादव आबादी लगभग 6.30 प्रतिशत मानी जाती है. सामाजिक संरचना में अनुसूचित जातियों के बीच पासी और जाटव समुदायों की उल्लेखनीय संख्या है. इसके अलावा ब्राह्मण, ठाकुर, कुर्मी, मौर्य, निषाद और अन्य पिछड़ा वर्ग समुदाय भी यहां मौजूद हैं. विधानसभा क्षेत्र के शहरी हिस्से में कायस्थ और वैश्य समुदायों की भी उल्लेखनीय मौजूदगी है. करीब 61.88 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जबकि 38.12 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है.
रायबरेली का इतिहास कई सदियों पुराना है. जिला प्रशासन के अनुसार यह क्षेत्र परंपरागत रूप से भर समुदाय से जुड़ा रहा है और पहले इसे भरौली या बरौली के नाम से जाना जाता था, जो बाद में बरेली नाम से जाना जाने लगा. राय शब्द को अलग-अलग रूप से शहर के पश्चिम में स्थित राही गांव और उस क्षेत्र में प्रभावशाली रहे कायस्थों द्वारा ऐतिहासिक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली उपाधि से जोड़ा जाता है. रायबरेली जिले का गठन अंग्रेजों ने 1858 में किया था.
रायबरेली का स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में भी महत्वपूर्ण स्थान है. 1857 के विद्रोह के दौरान क्षेत्र में राणा बेनी माधव सिंह की गतिविधियां देखी गई थीं. 1920 और 1921 का किसान आंदोलन जिले के राजनीतिक इतिहास का एक अन्य महत्वपूर्ण अध्याय रहा. बाबा राम चंद्र ने किसान सभाओं के गठन में भूमिका निभाई, जबकि जवाहरलाल नेहरू भी आंदोलन के दौरान जिले में पहुंचे थे. 7 जनवरी 1921 को हुआ मुंशीगंज गोलीकांड, जिसमें औपनिवेशिक अधिकारियों ने किसानों पर गोली चलाई थी, जिले के इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल है. रायबरेली ने सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय भागीदारी की थी.
यह विधानसभा क्षेत्र बड़े पैमाने पर समतल और उपजाऊ गंगा के मैदानी क्षेत्र में स्थित है, जहां दक्षिण-पूर्व की ओर हल्की ढलान है. सई यहां से जुड़ी प्रमुख नदी है, जबकि पूरा जिला गंगा और सई नदी की जल निकासी व्यवस्था का हिस्सा है. ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि महत्वपूर्ण है. गेहूं, धान, दलहन और अन्य खाद्यान्न प्रमुख कृषि फसलों में शामिल हैं. सिंचाई व्यवस्था को नहरों के नेटवर्क से सहायता मिलती है. शहर की अर्थव्यवस्था प्रशासन, व्यापार, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, निर्माण और अन्य सेवा क्षेत्रों पर अधिक आधारित है.
रायबरेली में पिछले कई दशकों में औद्योगिक आधार भी विकसित हुआ है. इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज जिले की प्रमुख सरकारी औद्योगिक इकाइयों में से एक है. लालगंज स्थित मॉडर्न कोच फैक्ट्री और ऊंचाहार स्थित एनटीपीसी का ताप विद्युत संयंत्र जिले के दो अन्य प्रमुख औद्योगिक प्रतिष्ठान हैं. हालांकि दोनों रायबरेली विधानसभा क्षेत्र के बाहर स्थित हैं. इनकी मौजूदगी जिले की व्यापक आर्थिक गतिविधियों में योगदान देती है और कृषि के अलावा रोजगार तथा व्यापार के अवसर उपलब्ध कराती है.
रायबरेली की कनेक्टिविटी भी इसकी महत्वपूर्ण विशेषताओं में शामिल है. यह शहर लखनऊ को प्रयागराज से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण मार्गों पर स्थित है और अयोध्या, कानपुर तथा वाराणसी की ओर जाने वाले राजमार्गों से भी जुड़ा हुआ है. रायबरेली जंक्शन लखनऊ, वाराणसी और प्रयागराज रेल नेटवर्क पर स्थित एक महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन है. लखनऊ रायबरेली से करीब 80 किलोमीटर दूर है, जबकि डलमऊ करीब 25 किलोमीटर, लालगंज करीब 30 किलोमीटर, उन्नाव करीब 90 किलोमीटर, कानपुर करीब 115 किलोमीटर, प्रयागराज करीब 130 किलोमीटर और अयोध्या करीब 150 किलोमीटर दूर है. वाराणसी की दूरी करीब 240 किलोमीटर है. लखनऊ का चौधरी चरण सिंह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा रायबरेली से करीब 82 किलोमीटर दूर है.
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले रायबरेली विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति अखिलेश कुमार सिंह परिवार के असामान्य चुनावी रिकॉर्ड के कारण दिलचस्प बनी हुई है. तीन दशकों से अधिक समय से यह परिवार उस पार्टी के बावजूद चुनाव जीतता रहा है, जिसके टिकट पर उसने चुनाव लड़ा. 2022 में अखिलेश कुमार सिंह की बेटी अदिति सिंह ने परिवार की जीत का सिलसिला आगे बढ़ाया. इस बार उन्होंने भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और समाजवादी पार्टी के राम प्रताप यादव को 7,175 मतों से हराया. यह मुकाबला 2017 की तुलना में काफी करीबी रहा, जब उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में 89,163 मतों से जीत दर्ज की थी.
2027 का चुनाव अदिति सिंह की व्यक्तिगत लोकप्रियता के साथ-साथ भाजपा की उस सीट को बनाए रखने की क्षमता की भी परीक्षा होगा, जहां पार्टी की संगठनात्मक मौजूदगी ऐतिहासिक रूप से सीमित रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में गांधी परिवार की भारी जीत कांग्रेस के लिए एक मजबूत पक्ष है, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में केवल 6.50 प्रतिशत वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहना उसकी बड़ी कमजोरी है. दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी 2022 में भाजपा के काफी करीब पहुंच गई थी. ऐसे में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे का मुद्दा महत्वपूर्ण हो सकता है. यदि दोनों दल रायबरेली से चुनाव लड़ने पर कायम रहते हैं, तो विपक्षी वोटों के बंटने से भाजपा को लाभ मिल सकता है. यदि दोनों दलों के बीच समझ बनती है और वोटों का प्रभावी हस्तांतरण होता है, तो 2027 का मुकाबला काफी कड़ा हो सकता है.
(अजय झा)
Ram Pratap Yadav
SP
Dr. Manish Chauhan
INC
Mo. Ashraf
BSP
Nota
NOTA
Radhe Shyam
JANADIP
Mahmood Ahmad
IND
Gaurav Singh
AAAP
Ram Bahadur
IND
Sartaj Ali
IND
Mansingh Patel
AKBHAD
Phoolchandra
CPI(ML)(L)
Suryanath
ASPKR
Kuldeep Yadav
IND
Raghvendra
HINDSMJP
यूपी में मुसलमानों की हिस्सेदारी और भागेदारी को लेकर ओवैसी ने इंडिया गठबंधन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. यूपी में-ओवैसी अपने चुनावी अभियान का बिगुल फूंक चुके हैं. अपनी तकरीरों में ओवैसी यही एलान कर रहे हैं कि मुस्लिम-समाज अब दरी नहीं बिछाएगा, अब कुर्सी पर बैठेगा.
यूपी में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों दल साथ चुनाव लड़ने की बात कह रहे हैं. दोनों गठबंधन करना चाहते हैं लेकिन सीटों को लेकर खींचतान कुछ अलग ही शक्ल ले रही है. गठबंधन को लेकर दोनों पार्टी के नेताओं के हाल के दिनों में कई बयान सामने आए. फिर अखिलेश ने दिल्ली में इंडिया गठबंधन से दूर रहकर एक नई खलबली पैदा कर दी.
यूपी में 2027 के चुनाव से पहले सपा-कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर खींचतान तेज हो गई है, कांग्रेस जहां ज्यादा सीटों पर दावेदारी जता रही है, वहीं अखिलेश यादव ने साफ संदेश दे दिया है, बात सीटों की नहीं, जीत की है। यानी अखिलेश का फोकस सीटों की संख्या से ज्यादा उस फॉर्मूले पर है, जिससे गठबंधन बीजेपी को मात दे सके। अब सवाल ये है कि सीटों की इस सियासी रस्साकशी में कांग्रेस और सपा के बीच आखिर समझौता कैसे होगा?
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच गठबंधन को लेकर रस्साकशी जारी है. दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे पर पेंच फंसता नजर आ रहा है. कांग्रेस ने अब साफ तौर पर बड़ी मांग रख दी है. यूपी में कांग्रेस के प्रभारी की ओर से बयान आया है कि उन्हें चुनाव में सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहिए और वे 150 से कम सीटों पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं. इस मांग के बाद समाजवादी पार्टी के खेमे में हलचल बढ़ गई है.
यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर सबसे बड़ा पेच पांच जिलों में फंस गया है सहारनपुर, रायबरेली, अमेठी, बाराबंकी और सीतापुर की सीटों पर दोनों दल अपनी-अपनी मजबूत दावेदारी कर रहे हैं कांग्रेस 105-115 सीटों की मांग कर रही है, जबकि सपा 85-90 सीटों के फॉर्मूले पर अड़ी बताई जा रही है आखिर गठबंधन में कुर्बानी कौन देगा?
रायबरेली में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की पीडीए रथ यात्रा को लेकर उत्तर प्रदेश की सियासत में गरमागरम बहस छिड़ गई है. इस बहस में भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के प्रवक्ताओं के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली. बीजेपी समर्थकों का कहना है कि अखिलेश यादव की यह रैली केवल दबाव की राजनीति का हिस्सा है और कांग्रेस को ब्लैकमेल करने के लिए की गई है. बीजेपी का आरोप है कि समाजवादी पार्टी ने हमेशा परिवारवाद और अपराधियों को बढ़ावा दिया है, जिसे उत्तर प्रदेश की जनता अब कभी स्वीकार नहीं करेगी.
उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे और राजनीतिक वर्चस्व को लेकर खींचतान जारी है. बीजेपी प्रवक्ता शिवम त्यागी ने विपक्ष के इस बिखराव पर तंज कसते हुए उन्हें 'नाराज फूफा' करार दिया है. उनका कहना है कि विपक्षी दलों में आपसी तालमेल की भारी कमी है, जिसके चलते वे ईवीएम और चुनाव आयोग पर ठीकरा फोड़ते हैं. दूसरी तरफ, कांग्रेस प्रवक्ता गुरदीप सप्पल ने गठबंधन का बचाव किया और दावा किया कि 2024 के नतीजों ने जमीन पर हकीकत बदल दी है. उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल उठाए.
उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से सियासी सरगर्मी तेज हो गई है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ रायबरेली से अपनी 'पीडीए जन पंचायत' रथ यात्रा की शुरुआत कर दी है. अखिलेश यादव के इस कदम ने इंडिया गठबंधन के भीतर एक नई बहस और असहजता को जन्म दे दिया है.
लगता है कि अखिलेश यादव की रथयात्रा कांग्रेस को बिल्कुल रास नही आई. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा है कि अखिलेश की ये यात्रा योगी सरकार के खिलाफ कम हमें ताकत दिखाने की कोशिश ज्यादा थी. अजय राय ने कहा कि अगर अखिलेश अमेठी-रायबरेली आएंगे तो हम भी कन्नौज-इटावा और मैनपुरी जा सकते हैं. अजय राय ने कहा कि लगता है ये यात्रा राहुल गांधी को ताकत दिखाने के लिए निकाली गई है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच तकरार बढ़ती नजर आ रही है. अखिलेश यादव द्वारा रायबरेली में निकाली गई पीडीए रथ यात्रा पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कड़ा एतराज जताया है. अजय राय का कहना है कि अखिलेश यादव की यह यात्रा उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के खिलाफ कम और कांग्रेस को अपनी ताकत दिखाने की कोशिश ज्यादा है.