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मां कात्यायनी व्रत कथा (Maa Katyayani Vrat Katha)

मां कात्यायनी व्रत कथा

पुराणों के अनुसार माता कात्यायनी की पूजा और व्रत कथा का पाठ करने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और योग्य जीवनसाथी मिलने की मान्यता है. नियमित उपासना से वैवाहिक जीवन सुखमय बनता है. यह पूजा शत्रुओं पर विजय दिलाने, रोग-शोक से राहत देने और आत्मविश्वास बढ़ाने में भी सहायक मानी जाती है. नवरात्रि के छठे दिन की जाने वाली इस आराधना से माता भक्तों को ज्ञान, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती हैं.

मां कात्यायनी व्रत कथा
मां कात्यायनी व्रत कथा

नवरात्रि में छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है. इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है. उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं. जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं. इस देवी को नवरात्रि में छठे दिन पूजा जाता है. 

 

कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना की. कठिन तपस्या की. उनकी इच्छा थी कि उन्हें पुत्रि प्राप्त हो. मां भगवती ने उनके घर पुत्रि के रूप में जन्म लिया. इसलिए यह देवी कात्यायनी कहलाईं. इनका गुण शोधकार्य है. इसीलिए इस वैज्ञावनक युग में कात्यायनी का महत्व सर्वाधिक हो जाता है. इनकी कृपा से ही सारे कार्य पूरे जो जाते हैं. ये वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट होकर पूजी गईं. मां कात्यायनी अमोघ फलदाययनी हैं.

 

भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी. यह पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की गई थी. इसीलिए ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं. इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है. ये स्वर्ण के समान चमकीली हैं और भास्वर हैं.

 

इनकी चार भुजाएं हैं. दाईं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में. मां के बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है. इनका वाहन भी सिंह है. इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से फलों की प्राप्ति होती है.

 

मां कात्यायनी की आरती

 

जय कात्यायनी माँ, मैया जय कात्यायनी माँ ।
उपमा रहित भवानी, दूँ किसकी उपमा ॥ मैया जय कात्यायनि….

 

गिरजापति शिव का तप, असुर रम्भ कीन्हाँ ।
वर-फल जन्म रम्भ गृह, महिषासुर लीन्हाँ ॥ मैया जय कात्यायनी…

 

कर शशांक-शेखर तप, महिषासुर भारी ।
शासन कियो सुरन पर, बन अत्याचारी ॥ मैया जय कात्यायनी…

 

त्रिनयन ब्रह्म शचीपति, पहुँचे, अच्युत गृह ।
महिषासुर बध हेतू, सुर कीन्हौं आग्रह ॥ मैया जय कात्यायनी…

 

सुन पुकार देवन मुख, तेज हुआ मुखरित ।
जन्म लियो कात्यायनी, सुर-नर-मुनि के हित ॥ मैया जय कात्यायनी…

 

अश्विन कृष्ण-चौथ पर, प्रकटी भवभामिनि ।
पूजे ऋषि कात्यायन, नाम काऽऽत्यायिनी ॥ मैया जय कात्यायनी…

 

अश्विन शुक्ल-दशी को, महिषासुर मारा ।
नाम पड़ा रणचण्डी, मरणलोक न्यारा ॥ मैया जय कात्यायनी….

 

दूजे कल्प संहारा, रूप भद्रकाली ।
तीजे कल्प में दुर्गा, मारा बलशाली ॥ मैया जय कात्यायनी….

 

दीन्हौं पद पार्षद निज, जगतजननि माया ।
देवी सँग महिषासुर, रूप बहुत भाया ॥ मैया जय कात्यायनी….

 

उमा रमा ब्रह्माणी, सीता श्रीराधा ।
तुम सुर-मुनि मन-मोहनि, हरिये भव-बाधा ॥ मैया जय कात्यायनी…

 

------समाप्त-----

समाप्त

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