इटावा यमुना नदी के किनारे स्थित जिला स्तरीय शहर है और उत्तर प्रदेश के इटावा जिले का मुख्यालय है. इस शहर की गहरी ऐतिहासिक जड़ें हैं, जो कांस्य युग तक जाती हैं और इस क्षेत्र को पांचालों तथा महाभारत और रामायण के संदर्भों से जोड़ती हैं. बाद में इटावा निचले दोआब क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभरा और क्षेत्र के राजनीतिक तथा प्रशासनिक इतिहास से लगातार जुड़ा रहा है.
स्वतंत्र भारत में हुए पहले चुनावों के साथ 1952 में विधानसभा क्षेत्र के रूप में स्थापित इटावा एक सामान्य, अनारक्षित सीट है और इटावा लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद इसमें सिटी और पार कानूनगो सर्किल, पचार कानूनगो सर्किल की पांच ग्राम पंचायतें खुरिसर, बहादुरपुर लुहिया, भदवा सबरन, बसरेहर और किल्ली सुल्तानपुर, साथ ही इटावा नगर पालिका बोर्ड और एकदिल टाउन एरिया शामिल हैं. इस विधानसभा क्षेत्र का स्वरूप मिश्रित और अर्ध-शहरी है, जहां शहरी आबादी ग्रामीण आबादी से थोड़ी अधिक है.
इटावा में स्थापना के बाद से 19 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिसमें 2009 में हुआ उपचुनाव भी शामिल है. यह उपचुनाव उस समय हुआ था जब मौजूदा समाजवादी पार्टी विधायक महेंद्र सिंह राजपूत बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए थे, जो उस समय उत्तर प्रदेश में सत्ता में थी. इटावा ने किसी भी पार्टी को लंबे समय तक लगातार सत्ता में रहने का अवसर नहीं दिया है और यह एक प्रतिस्पर्धी सीट बनी रही है. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बीजेपी में से प्रत्येक ने अधिकतम दो लगातार चुनाव जीते हैं. कांग्रेस ने यह सीट छह बार जीती है और उसकी आखिरी जीत 1985 में हुई थी, जबकि बीजेपी ने भी तकनीकी रूप से छह बार जीत दर्ज की है, अगर उसकी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की दो जीत को उसकी चार जीत में शामिल किया जाए. समाजवादी पार्टी ने चार बार, जबकि जनता पार्टी, जनता दल और बहुजन समाज पार्टी ने एक-एक बार यह सीट जीती है.
2012 में समाजवादी पार्टी ने वह सीट फिर हासिल कर ली, जिसे 2009 के उपचुनाव में उसके मौजूदा विधायक के बहुजन समाज पार्टी में जाने के बाद उसने खो दिया था. समाजवादी पार्टी ने इससे पहले 2002 और 2007 में भी यह सीट जीती थी. यह पहला अवसर नहीं था जब पार्टी को यहां दल बदल का सामना करना पड़ा. 1993 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतने वाले जयवीर सिंह भदौरिया बीजेपी में चले गए और 1996 में बीजेपी के टिकट पर इटावा सीट जीती.
2012 में समाजवादी पार्टी के रघुराज सिंह शाक्य ने मौजूदा बहुजन समाज पार्टी विधायक महेंद्र सिंह राजपूत को 6,264 वोटों से हराया. बीजेपी, जो इस चुनाव में काफी अंतर से तीसरे स्थान पर रही थी, 2017 में अपनी उम्मीदवार सरिता भदौरिया के साथ आगे बढ़कर सीट जीतने में सफल रही. उन्होंने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार कुलदीप गुप्ता को 17,342 वोटों से हराया. बीजेपी ने 2022 में भी सीट बरकरार रखी, हालांकि उसकी जीत का अंतर काफी कम हो गया. सरिता भदौरिया को 98,150 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सर्वेश कुमार शाक्य को 94,166 वोट मिले. इस तरह उन्होंने 3,984 वोटों से जीत दर्ज की.
लोकसभा चुनावों के दौरान भी विधानसभा क्षेत्र में इटावा की प्रतिस्पर्धी प्रकृति दिखाई देती है. 2009 में बहुजन समाज पार्टी ने समाजवादी पार्टी पर केवल 932 वोटों की बढ़त बनाई थी. बीजेपी उस चुनाव में काफी पीछे तीसरे स्थान पर रही थी, लेकिन 2014 में उसने समाजवादी पार्टी पर 26,894 वोटों की बढ़त बनाई. 2019 में उसकी बढ़त बढ़कर 32,079 वोट हो गई. 2024 में समाजवादी पार्टी ने आखिरकार बढ़त हासिल की, जब लोकसभा उम्मीदवार जितेंद्र कुमार दोहरे को इटावा विधानसभा क्षेत्र में 110,332 वोट मिले, जबकि बीजेपी उम्मीदवार राम शंकर कठेरिया को 107,239 वोट मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी ने 3,093 वोटों की मामूली बढ़त हासिल की.
इटावा में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या वर्षों के दौरान लगातार बढ़ी, लेकिन 2026 में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद इसमें अधिक तेज कमी देखी गई. यह संख्या 2012 में 339,750 से बढ़कर 2017 में 381,680 हो गई और 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 390,099 थी. 2022 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 407,650 हो गया और 2024 में और बढ़कर 418,416 हो गया. एसआईआर के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 336,979 मतदाता थे, जो 2024 के आंकड़े से 81,437 कम हैं. यह 19.45 प्रतिशत की कमी है.
मतदाता मतदान कुछ उतार चढ़ाव के साथ मध्यम स्तर पर रहा है. 2012 में यह 58.97 प्रतिशत और 2017 में 57.90 प्रतिशत था. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह थोड़ा घटकर 57.56 प्रतिशत रहा और 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 60.68 प्रतिशत हो गया, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह काफी घटकर 55.43 प्रतिशत रह गया.
इटावा एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी भी काफी संख्या में है. 2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिम आबादी 13.40 प्रतिशत है, जबकि अनुसूचित जाति की आबादी 19.62 प्रतिशत है. सामाजिक संरचना के अनुमानों के अनुसार यहां ब्राह्मण आबादी करीब 14 प्रतिशत है, जिसके बाद यादव करीब 12 प्रतिशत हैं और शाक्य, कुशवाहा तथा काछी समुदाय मिलकर लगभग 11 प्रतिशत हैं. जाटव और अन्य दलित समुदाय भी एक महत्वपूर्ण वर्ग हैं, जबकि पाल, गड़ेरिया और बघेल, राजपूत, वैश्य, बनिया, कायस्थ, कोरी और शंखवार समुदायों की भी यहां मौजूदगी है.
उत्तर प्रदेश के इस हिस्से के लिए इस विधानसभा क्षेत्र में शहरी और ग्रामीण आबादी का असामान्य संतुलन है, जहां 51.42 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में और 48.58 प्रतिशत गांवों में रहती है. अपेक्षाकृत अधिक शहरी आबादी मुख्य रूप से इटावा शहर के शामिल होने के कारण है, जबकि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित स्वरूप बना हुआ है.
इटावा का इतिहास आधुनिक शहर के अस्तित्व में आने से काफी पहले का है. प्राचीन काल में यह क्षेत्र व्यापक पांचाल देश का हिस्सा था और बाद में कई शासक वंशों के अधीन रहा. मध्यकाल तक इटावा निचले दोआब क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका था और विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों के बीच इसका नियंत्रण बदलता रहा. 15वीं शताब्दी की शुरुआत के आसपास राजा सुमेर सिंह यहां के प्रमुख स्थानीय शासकों में से एक थे और उनके किले के अवशेष आज भी शहर से जुड़े हुए हैं. मुगल विजय के बाद यह क्षेत्र साम्राज्यिक व्यवस्था का हिस्सा बन गया, जबकि बाद में इसका नियंत्रण मराठों और अवध के शासकों के हाथों से होते हुए 1801 में अंग्रेजों के पास चला गया.
1857 के विद्रोह के दौरान इटावा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. एलन ऑक्टेवियन ह्यूम उस समय जिले के कलेक्टर थे और बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में शामिल हुए. जिले में विद्रोहियों और ब्रिटिश सेनाओं के बीच संघर्ष हुआ और इटावा में ग्रेट हेज ऑफ इंडिया के अवशेष भी मौजूद हैं, जो औपनिवेशिक नमक कर की विस्तृत सीमा व्यवस्था थी. बाद में यह शहर क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सड़क और रेलवे केंद्र के रूप में विकसित हुआ.
विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीण हिस्सों में कृषि आज भी महत्वपूर्ण है, जहां गेहूं, धान, आलू और अन्य फसलें स्थानीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार हैं. इटावा शहर जिले का प्रमुख व्यापारिक और प्रशासनिक केंद्र है, जहां व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और सरकारी सेवाएं कृषि के अलावा रोजगार उपलब्ध कराती हैं. आगरा-लखनऊ कॉरिडोर पर स्थित होने से भी विधानसभा क्षेत्र को लाभ मिलता है. आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे इटावा जिले से होकर गुजरता है और इसने आगरा, कन्नौज, कानपुर और लखनऊ के साथ सड़क संपर्क को मजबूत किया है.
इटावा में दिल्ली-लखनऊ रेलवे लाइन पर एक रेलवे स्टेशन है और यह आगरा, कानपुर और लखनऊ सहित प्रमुख शहरों से सीधे रेल मार्ग से जुड़ा है. सड़क मार्ग से इटावा भिंड से करीब 36 किलोमीटर, मैनपुरी से 56 किलोमीटर, आगरा से 125 किलोमीटर, कानपुर से 153 किलोमीटर, लखनऊ से करीब 240 किलोमीटर और नई दिल्ली से लगभग 314 किलोमीटर दूर है. ग्वालियर लगभग 120 किलोमीटर दूर है.
इटावा में पिछले सात प्रमुख चुनावों के रिकॉर्ड में बीजेपी को बढ़त दिखाई देती है, क्योंकि उसने लगातार दो विधानसभा चुनाव जीते हैं और दो लोकसभा चुनावों में बढ़त बनाई है, जबकि समाजवादी पार्टी ने एक विधानसभा चुनाव जीता और एक लोकसभा चुनाव में बढ़त बनाई तथा 2009 में बहुजन समाज पार्टी ने एक लोकसभा चुनाव में बढ़त हासिल की थी. लेकिन पिछले दो चुनावों में जीत के अंतर से पता चलता है कि यह कोई स्थापित बढ़त नहीं है. 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने समाजवादी पार्टी पर केवल 1.62 प्रतिशत अंक की बढ़त बनाई, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी ने बीजेपी पर 1.30 प्रतिशत अंक की बढ़त हासिल की. एसआईआर के बाद मतदाताओं की संख्या में भी लगभग एक-पांचवें की कमी हुई है, हालांकि अभी यह कहने का कोई विश्वसनीय आधार नहीं है कि इस कमी से किस पार्टी या सामाजिक समूह पर अधिक प्रभाव पड़ा है. इटावा एक करीबी मुकाबले वाली सीट बनी हुई है, जहां दोनों प्रमुख दावेदारों में से कोई भी स्थायी बढ़त का दावा नहीं कर सकता, जिससे 2027 में फिर एक कड़े मुकाबले की संभावना बनती है.
(अजय झा)
Sarvesh Kumar Shakya
SP
Kuldeep Gupta Alias Santu
BSP
Satya Prakash Rajput
JANADIP
Mohd Rashid
INC
Nota
NOTA
Bobby Urf Mukesh Singh
JDL
Shiv Pratap Singh
AAAP
Manoj Kumar Gupta
IND
Partibha Shakya
IND
Shyam Singh
SDU
Sharad Bhadauriya
IND
10 सितंबर को मायावती ने आकाश आनंद को पार्टी से पूरी तरह अलग करने का ऐलान किया था. उससे पहले 3 सितंबर को उन्हें राष्ट्रीय संयोजक के पद से हटा दिया गया था. मायावती ने उस समय आरोप लगाया था कि आकाश आनंद ने पार्टी के हितों की जगह अपने परिवार और व्यक्तिगत हितों को प्राथमिकता दी.
उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अपने सभी मौजूदा राज्यसभा सांसदों का पत्ता काट दिया है. 8 नए चेहरों पर दांव लगाया है. पार्टी ने क्षेत्रीय और जातीय संतुलन साधते हुए 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सोशल इंजीनियरिंग की मजबूत जमीन तैयार कर दी है.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज अयोध्या के महत्वपूर्ण दौरे पर जा रहे हैं. अपने इस आध्यात्मिक और धार्मिक दौरे के दौरान सीएम योगी उदासीन संगम ऋषि आश्रम में संतों और पूजनीय साधुओं से मुलाकात करेंगे. वह संतों से संवाद कर उनका आशीर्वाद लेंगे. इसके साथ ही वे विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों में भी शिरकत करेंगे. दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां काफी तेज हो गई हैं.
यूपी में 2027 के चुनाव से पहले सपा-कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर खींचतान तेज हो गई है, कांग्रेस जहां ज्यादा सीटों पर दावेदारी जता रही है, वहीं अखिलेश यादव ने साफ संदेश दे दिया है, बात सीटों की नहीं, जीत की है। यानी अखिलेश का फोकस सीटों की संख्या से ज्यादा उस फॉर्मूले पर है, जिससे गठबंधन बीजेपी को मात दे सके। अब सवाल ये है कि सीटों की इस सियासी रस्साकशी में कांग्रेस और सपा के बीच आखिर समझौता कैसे होगा?
उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे का सस्पेंस लगातार बढ़ता जा रहा है. हाल ही में यूपी कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने एक बड़ा बयान देकर इस चर्चा को और हवा दे दी है. राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि वे केवल 150 सीटें नहीं, बल्कि 200 सीटों की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि गठबंधन के तहत चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा सीटें मिलनी जरूरी हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि सीट शेयरिंग का यह मामला अक्टूबर के महीने में ही सुलझा लिया जाना चाहिए ताकि दोनों पार्टियां अपने उम्मीदवारों को चुनाव की तैयारी के लिए पर्याप्त समय दे सकें.
उत्तर प्रदेश के राज्यसभा चुनाव के जरिए 2027 की बिसात बिछाते हुए बीजेपी ने अपने सभी मौजूदा राज्यसभा सांसदों की जगह पर कैडर से जुड़े नए चेहरों पर दांव लगाया है. पार्टी ने क्षेत्रीय और जातीय संतुलन साधने के साथ-साथ सपा के 'पीडीए' और ब्राह्मण कार्ड को चित करने का मजबूत मास्टरस्ट्रोक खेला है.
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' में सीट बंटवारे पर रार बढ़ती जा रही है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है. हाल ही में कांग्रेस नेता राजेंद्र पाल गौतम ने दोनों पार्टियों के बीच बराबर की हिस्सेदारी की मांग करते हुए डेढ़ सौ से दो सौ सीटों की दावेदारी ठोक दी है.
स्वामी प्रसाद मौर्य ने कांग्रेस नेताओं से मुलाकात कर 'इंडिया' गठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताई है. वे अपनी पार्टी के लिए सीटें चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस उन्हें अपनी पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ने का ऑफर दे रही है.
यूपी में आगामी चुनाव से पहले 'इंडिया' गठबंधन के घटकों में रार बढ़ गई है. अखिलेश यादव के रायबरेली दौरे पर भड़के कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने पलटवार कर कन्नौज-इटावा जाने की चेतावनी दी. सपा ने इसे भाजपा के दमन के खिलाफ लड़ाई बताया, तो वहीं भाजपा ने इसे हताश गठबंधन की आपसी ललकार करार दिया है.
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी अपने वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश में जुटी है. इसी बीच काशी में केदारेश्वर मंदिर के भव्य स्वरूप और विशाल शिवलिंग की झांकी निकाली गई, जो श्री काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंची.