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मां महागौरी व्रत कथा

मां महागौरी व्रत कथा

हिंदू मान्यताओं के अनुसार मां महागौरी की पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है. उनकी आराधना से मन शांत रहता है और एकाग्रता भी बढ़ती है.

मां महागौरी व्रत कथा
मां महागौरी व्रत कथा

नवरात्रि में आठवें दिन महागौरी शक्ति की पूजा की जाती है. नाम से प्रकट है कि इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है. इनकी उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है.

 

अष्टवर्षा भवेद् गौरी यानी इनकी आयु आठ साल की मानी गई है. इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद हैं. इसीलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा कहा गया है. 4 भुजाएं हैं और वाहन वृषभ है इसीलिए वृषारूढ़ा भी कहा गया है इनको. इनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा है तथा नीचे वाला हाथ त्रिशूल धारण किया हुआ है. ऊपर वाले बांये हाथ में डमरू धारण कर रखा है और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है.

 

इनकी पूरी मुद्रा बहुत शांत है. पति रूप में शिव को प्राप्त करने के लिए महागौरी ने कठोर तपस्या की थी. इसी वजह से इनका शरीर काला पड़ गया लेकिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धोकर कांतिमय बना दिया. उनका रूप गौर वर्ण का हो गया. इसीलिए ये महागौरी कहलाईं. ये अमोघ फलदायनी हैं और इनकी पूजा से भक्तों के तमाम कष्ट धुल जाते हैं. पूर्वसंचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं. महागौरी का पूजा-अर्चना, उपासना-आराधना कल्याणकारी है. इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियां भी प्राप्त होती हैं.

 

दूसरी कथा के अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है. देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी तवद्य¸त के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा.

 

महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं. देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं “सर्वमंगल मांगले, शिवे सर्वाथ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणी नमोस्तुते।।”

 

महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं. देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया.

 

इस इंतजार में वह काफी कमजोर हो गया. देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आई और मां ने उसे अपना वाहन बना लिया, क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी. इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं.
 

 

मां महागौरी की आरती

 

जय महागौरी जगत की माया। जया उमा भवानी जय महामाया।।
हरिद्वार कनखल के पासा। महागौरी तेरा वहां निवासा।।

 

चंद्रकली और ममता अंबे। जय शक्ति जय जय मां जगदंबे।।
भीमा देवी विमला माता। कौशिकी देवी जग विख्याता।।

 

हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा। महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा।।
सती 'सत' हवन कुंड में था जलाया। उसी धुएं ने रूप काली बनाया।।

 

बना धर्म सिंह जो सवारी में आया। तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया।।
तभी मां ने महागौरी नाम पाया। शरण आनेवाले का संकट मिटाया।।

 

शनिवार को तेरी पूजा जो करता। मां बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता।।
भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो। महागौरी मां तेरी हरदम ही जय हो।।

 

जय महागौरी जगत की माया। जया उमा भवानी जय महामाया।।

 

-------समाप्त-------
 

समाप्त

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