उत्तर प्रदेश के बदायू जिले का मुख्यालय और म्युनिसिपल बोर्ड, बदायू शहर, रोहिलखंड इलाके में सोट नदी के किनारे बसा एक प्राचीन शहर है. सदियों से यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुख्य प्रशासनिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्रों में से एक रहा है. आज यह बदायू लोकसभा क्षेत्र के पाँच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. यह एक सामान्य सीट है और यहां की शहरी आबादी आस-पास के ज्यादातर निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा है. यहां मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या के साथ-साथ यादवों की भी बड़ी आबादी है, जिससे यह जिले के राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में से एक बन जाता है.
परिसीमन आयोग के 1956 के आदेश के तहत बनी बदायू विधानसभा सीट पर पहली बार 1957 में चुनाव हुए थे. 2008 की परिसीमन प्रक्रिया के दौरान इसकी सीमाओं में काफी बदलाव किया गया था. अब इस निर्वाचन क्षेत्र में बदायू म्युनिसिपल बोर्ड, कुंवरगांव और वजीरगंज नगर पंचायतों का पूरा इलाका, साथ ही बिनावर, कुंवरगांव और 4-सतसाई कानूनगो सर्कल शामिल हैं, जिससे इसे एक अर्ध-शहरी स्वरूप मिला है.
बदायू में अब तक 17 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. यहां के नतीजों में आम तौर पर कोई स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, जिससे कोई भी राजनीतिक पार्टी यहां अपनी मजबूत पकड़ नहीं बना पाई है, हालांकि बीजेपी ने दो बार लगातार जीत हासिल की है.
बीजेपी ने यह सीट सात बार जीती है (इसमें 1969 में उसकी पूर्ववर्ती पार्टी भारतीय जनसंघ की जीत भी शामिल है), जबकि कांग्रेस चार बार जीती है. समाजवादी पार्टी ने यह सीट दो बार जीती है, वहीं निर्दलीय उम्मीदवार, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने एक-एक बार जीत हासिल की है.
समाजवादी पार्टी के आबिद रज़ा खान ने 2012 में बीजेपी से यह सीट छीन ली थी; उन्होंने मौजूदा विधायक महेश चंद्र गुप्ता को 15,413 वोटों से हराया था. गुप्ता ने 2017 में बीजेपी के लिए यह सीट वापस हासिल की और आबिद रजा खान को 16,467 वोटों से हराया. उन्होंने 2022 में भी यह सीट अपने नाम की, हालांकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार रईस अहमद के मुकाबले जीत का अंतर कम (11,179 वोट) रहा. महेश चंद्र गुप्ता को 1,01,096 वोट मिले, जबकि अहमद को 89,917 वोट मिले.
बदायूं विधानसभा क्षेत्र में लोकसभा चुनावों का पैटर्न भी काफी हद तक ऐसा ही रहा है, जिसमें बीजेपी ने हाल के वर्षों में ही खुद को एक मजबूत ताकत के तौर पर स्थापित किया है. 2009 में, कांग्रेस ने बीएसपी पर 12,005 वोटों की बढ़त बनाई थी, जबकि बीजेपी ने जनता दल (यूनाइटेड) के साथ सीट-शेयरिंग समझौते के कारण संसदीय चुनाव नहीं लड़ा था. 2014 के चुनाव में राजनीतिक समीकरण में एक और बदलाव देखने को मिला, जिसमें समाजवादी पार्टी ने बीजेपी पर 7,804 वोटों की बढ़त बनाई. बीजेपी ने अगले दो संसदीय चुनावों में इस अंतर को पाट दिया. 2019 में उसने समाजवादी पार्टी पर 14,151 वोटों की बढ़त बनाई और 2024 में अपनी बढ़त को थोड़ा और बढ़ाकर 15,566 वोट कर लिया, इस चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार दुर्विजय सिंह शाक्य को 1,02,952 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आदित्य यादव को 87,386 वोट मिले.
पिछले दशक में बदायूं के मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है. रजिस्टर्ड मतदाताओं की संख्या 2012 में 3,13,196 से बढ़कर 2017 में 3,53,550, 2019 में 3,63,823, 2022 में 3,76,111 और 2024 में 3,81,571 हो गई. हालांकि, इसी दौरान वोटिंग में धीरे-धीरे कमी आई है. वोटिंग प्रतिशत 2012 में 61.81 प्रतिशत, 2017 में 60.18 प्रतिशत, 2019 के लोकसभा चुनाव में 56.74 प्रतिशत, 2022 के विधानसभा चुनाव में 58.31 प्रतिशत और 2024 के संसदीय चुनाव में 55.33 प्रतिशत रहा.
बदायूं विधानसभा क्षेत्र ग्रामीण और शहरी दोनों तरह की विशेषताओं वाला है. यहां मतदाताओं में मुसलमानों की हिस्सेदारी 29.80 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी 16.08 प्रतिशत है. यादव एक और बड़ा और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली समुदाय हैं, जबकि ब्राह्मण, वैश्य, लोधी, मौर्य, शाक्य और कई अन्य OBC समूहों की भी अच्छी-खासी मौजूदगी है. इस निर्वाचन क्षेत्र की 61.09 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में और 38.91 प्रतिशत शहरी केंद्रों में रहती है. इस सामाजिक बनावट के कारण मुस्लिम और यादव वोट खास तौर पर अहम हो जाते हैं, हालांकि अनुसूचित जातियों, ऊंची जातियों और गैर-यादव OBC का समर्थन अक्सर यह तय करता है कि आखिर में कौन जीतेगा.
बदायूं का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना है. स्थानीय परंपरा इस शहर को बुध या बुद्ध नाम के एक राजकुमार से जोड़ती है, जबकि 11वीं-12वीं सदी के एक शिलालेख में इसे 'वोदामायुत' कहा गया है और इसमें राठौर राजाओं के शासन का जिक्र है. 1196 में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा कब्जा किए जाने के बाद इस शहर को अहमियत मिली और जल्द ही यह दिल्ली सल्तनत की एक महत्वपूर्ण सीमावर्ती चौकी बन गया. 1210 और 1214 के बीच सुल्तान इल्तुतमिश के शासनकाल में यह कुछ समय के लिए सल्तनत की राजधानी भी रहा; उन्हीं के शासनकाल में शानदार जामा मस्जिद का निर्माण हुआ था. बदायूं को मशहूर सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की जन्मस्थली के तौर पर भी सम्मान दिया जाता है. हालांकि 17वीं सदी में प्रांतीय मुख्यालय बरेली स्थानांतरित होने के बाद इसका प्रशासनिक महत्व कम हो गया था, लेकिन अंग्रेजों ने 1838 में इसे जिला मुख्यालय बनाकर इसकी अहमियत फिर से बहाल कर दी. यह दर्जा इसे आज भी हासिल है.
इस निर्वाचन क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में खेती-बाड़ी मुख्य काम है. गेहूं, धान, गन्ना और आलू के अलावा, किसान मेंथा की खेती भी करते हैं, जो कमर्शियल रूप से एक जरूरी नकदी फसल है और जिससे मेंथॉल तेल निकाला जाता है. डेयरी फार्मिंग से भी अतिरिक्त आमदनी होती है. बदायूं शहर जिले का कमर्शियल हब है, जहां अनाज की थोक मंडियां, खुदरा व्यापार, शिक्षण संस्थान, स्वास्थ्य सुविधाएं और सरकारी दफ्तर बड़ी संख्या में रोजगार पैदा करते हैं. छोटे पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग, ट्रांसपोर्ट सेवाएं, कोल्ड स्टोरेज और खेती पर आधारित कारोबार भी स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं.
यह निर्वाचन क्षेत्र उत्तर प्रदेश के बाकी हिस्सों से सड़क और रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. बदायूं एक नेशनल हाईवे और स्टेट हाईवे के बड़े नेटवर्क से जुड़ा है, जो इसे बरेली, मुरादाबाद, संभल, शाहजहांपुर, कासगंज और अलीगढ़ से जोड़ते हैं. जिले से गंगा एक्सप्रेसवे भी गुजरता है, जिससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, नेशनल कैपिटल रीजन और राज्य के मध्य भागों से कनेक्टिविटी काफी बेहतर हुई है. बरेली-कासगंज लाइन पर स्थित बदायूं रेलवे स्टेशन इस क्षेत्र के कई महत्वपूर्ण कस्बों और शहरों के लिए नियमित रेल कनेक्टिविटी प्रदान करता है. बदायूं, बरेली से लगभग 50 किमी, मुरादाबाद से लगभग 70 किमी, संभल से लगभग 80 किमी, शाहजहांपुर से लगभग 95 किमी, कासगंज से लगभग 110 किमी, अलीगढ़ से लगभग 130 किमी, नई दिल्ली से लगभग 230 किमी और लखनऊ से लगभग 245 किमी दूर स्थित है.
शिक्षण संस्थान, स्वास्थ्य सेवा, शहरी बुनियादी ढांचा, जल निकासी, ट्रैफिक मैनेजमेंट, पीने के पानी की आपूर्ति, रोजगार के अवसर और बेहतर नागरिक सुविधाएं स्थानीय राजनीतिक चर्चा का मुख्य विषय बनी हुई हैं, जबकि किसान अक्सर सिंचाई, फसल की कीमतों और ग्रामीण सड़कों से जुड़े मुद्दे उठाते रहते हैं.
पिछले दो विधानसभा चुनावों में जीत और पिछले दो संसदीय चुनावों में इस निर्वाचन क्षेत्र में बढ़त हासिल करने के बाद, बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव में मजबूत स्थिति में है. इसके बावजूद, बदायूं को अभी भी पार्टी के लिए सुरक्षित सीट नहीं कहा जा सकता है. जीत का अंतर सम्मानजनक रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है जिसे पार न किया जा सके. बीएसपी की लगातार गिरावट ने विपक्ष के चुनावी गणित को उलझा दिया है, क्योंकि हाल के वर्षों में उसके पारंपरिक अनुसूचित जाति समर्थक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी की ओर झुका हुआ दिखाई देता है. इसलिए, समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती सिर्फ अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने तक ही सीमित नहीं है. उसे अनुसूचित जातियों, गैर-यादव OBC और ऊंची जातियों के कुछ वर्गों के बीच अपनी पैठ बढ़ानी होगी और साथ ही BJP के बढ़ते सामाजिक गठबंधन को कमजोर करने की कोशिश भी करनी होगी. इसी वजह से बदायूं एक ऐसी सीट है जहां BJP 2027 के मुकाबले में बढ़त के साथ शुरुआत तो करती है, लेकिन यह बढ़त इतनी बड़ी नहीं है कि विपक्ष की तरफ से मिलने वाली कड़ी चुनौती को पूरी तरह से नकारा जा सके.
(अजय झा)
Rais Ahmad
SP
Rajesh Kumar Singh
BSP
Rajni Singh
INC
Nota
NOTA
Usman Gaddi
VIP
Hem Singh
IND
Nandram
BSRD
ऊंचाहार में शिव महापुराण कथा का आयोजन है. रविवार को CM योगी आदित्यनाथ भी इसमें शामिल हुए. इस कार्यक्रम का आयोजन कैबिनेट मंत्री मनोज कुमार पांडेय करवा रहे हैं. यह 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. इससे बीजेपी धार्मिक-सांस्कृतिक माध्यमों से जनसंपर्क को मजबूत करने पर जोर दे रही है.
बसपा चीफ मायावती ने बसपा में पीढ़ीगत बदलाव के संकेत दे दिए हैं. उन्होंने संगठन में युवाओं को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए हैं. साथ ही, मायावती ने ये भी साफ किया है कि उनके भाई आनंद कुमार के बेटों को BSP में राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी.
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BSP के पूर्व नेता अशोक सिद्धार्थ के राजनीति से संन्यास लेने के बाद भी मायावती का गुस्सा शांत नहीं हो रहा. उन्होंने आकाश आनंद की सिसायी दूर्दशा के लिए भी अशोक सिद्धार्थ को ही जिम्मेदार ठहराया है.
प्रयागराज में बाढ़ के पानी में प्रेरणा स्थल के डूबने को लेकर सियासत तेज हो गई है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बीजेपी पर तंज कसते हुए कहा कि नाम बदलने वालों के लिए सुनहरा मौका है, अरबों की लागत से बने प्रेरणा स्थल का नाम प्रेरणा जल-स्थल कर दें. उन्होंने बीजेपी नेताओं से अपने महापुरुषों के प्रति ईमानदार रहने की अपील की.
उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनावों में मिले झटके के बाद भाजपा 'हाइपर-लोकल' मोड में आ गई है और 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए 'रिकवरी प्लान' पर काम कर रही है. इसके तहत पार्टी ने उन 18,900 बूथों की पहचान की है जहां उसका जनाधार खिसका है, ताकि ग्रामीण इलाकों और सामाजिक समीकरणों को सुधारकर वापसी की जा सके.
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ को निशाने पर लेते हुए सपा और कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने विपक्षी दलों द्वारा नीले रंग और अंबेडकरवादी सोच के दिखावे पर सवाल उठाते हुए बसपा से निकाले गए नेताओं को पनाह देने और राजनीतिक षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया.
यूपी चुनाव से पहले मूंछों को लेकर बीजेपी और सपा आमने-सामने हैं. अखिलेश यादव के मूंछों पर ताव दिलाने के बाद बीजेपी ने अतीक और मुख्तार की तस्वीर के जरिए पलटवार किया. सपा ने अधिकारियों के व्यवहार और हाईकोर्ट की टिप्पणियों का हवाला देते हुए बीजेपी पर निशाना साधा.
यूपी में राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव की तैयारी जोर शोर से शुरू कर दी हैं. इसी सिलसिले में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीट बंटवारे पर बातचीत शुरू हो चुकी है. दोनों ओर से सीटों के ऑफर और डिमांड को लेकर शुरुआती आंकड़े सामने आए हैं. सूत्रों के हवाले से बड़ी खबर है कि समाजवादी पार्टी यूपी में कांग्रेस को 85-88 सीटें ही देना चाहती है जबकि कांग्रेस ने कम से कम 105 से 115 सीटों की डिमांड रखी है.
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