उत्तर प्रदेश की सियासत में स्वामी प्रसाद मौर्य फिर से एक बार राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है. स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर अखिलेश यादव की बयानबाजी और सपा कार्यकर्ताओं की टिप्पणियों को मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी समाज के सम्मान से जोड़ दिया गया है. स्वामी प्रसाद के समर्थकों के द्वारा लखनऊ में पोस्टर लगाए गए हैं, जिसमें समाजवादी पार्टी के बॉयकाट की बात कही गई है.
सूबे की राजनीति में यादव और कुर्मी के बाद मौर्य-कुशवाहा ऐसा पिछड़ा वर्ग भी है, जिसकी राजनीतिक अहमियत लगातार बढ़ती रही है. ओबीसी में आने वाला मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी समाज अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग उपनामों और सामाजिक पहचान के साथ मौजूद है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर रुहेलखंड, मध्य यूपी, अवध और पूर्वांचल तक इनकी मौजूदगी चुनावी समीकरणों को प्रभावित करती है. भाजपा, सपा और बसपा तीनों राजनीतिक दल इस समाज के वोटबैंक पर नजर गढ़ाए हुए हैं. ऐसे में आइए बताते हैं कि यूपी की सियासत में मौर्य-कुशवाहा, शाक्य और सैनी समाज कितना बड़ा वोटबैंक है और सियासी फैक्टर कितना अहम है.
मौर्य-कुशवाहा-शाक्य-सैनी की आबादी कितनी है?
उत्तर प्रदेश में मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी समुदाय को सामाजिक रूप से एक ही उप-जातीय समूह माना जाता है. यह समुदाय अन्य पिछड़ा वर्ग में यादवों और कुर्मी समाज के बाद तीसरा सबसे बड़ा वोटबैंक है. ऐतिहासिक रूप से अपने को भगवान बुद्ध, सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य और महान सम्राट अशोक से जोड़ने वाला यह समाज पिछड़ों में शामिल है.
आर्थिक रूप से कृषि पर निर्भर रहने वाला यह समाज अब धीरे-धीरे व्यवसाय और व्यापार में भी अपनी पहुंच और पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है. मुख्य रूप से यह समाज कृषि के क्षेत्र में जुड़ा है और सब्जी उगाने से लेकर बेचने तक का काम करता है, जो यूपी के अलग-अलग इलाके में अलग-अलग जाति के रूप में जाना जाता है.
उत्तर प्रदेश में 2001 की सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट के आधार पर काछी, कुशवाहा, शाक्य, मौर्य, सैनी और माली समूह की आबादी प्रदेश की कुल जनसंख्या का 6.69 फीसदी है. 2011 की जनगणना के लिहाज से देखें तो उत्तर प्रदेश की लगभग 19.98 करोड़ आबादी है. इस आधार पर 6 से 6.69 प्रतिशत का अनुमान लगाएं, तो इनकी संख्या करीब 1.20 करोड़ से 1.34 करोड़ बैठती है.
कितना बड़ा वोटबैंक और किस इलाके में प्रभाव
उत्तर प्रदेश में यादव और कुर्मियों के बाद ओबीसी में तीसरा सबसे बड़ा जाति समूह मौर्य समाज का है. यूपी में मौर्य-कुशवाहा करीब 15 जिलों में 15 फीसदी के करीब हैं. पश्चिमी यूपी के जिलों में सैनी समाज के रूप में पहचान है तो ब्रज से लेकर कानपुर देहात तक शाक्य समाज के रूप में जाने जाते हैं. बुंदेलखंड और पूर्वांचल में कुशवाहा समाज के नाम से जानी जाती है तो अवध और रुहेलखंड व पूर्वांचल के कुछ जिलों में मौर्य नाम से जानी जाती है.
पूर्वांचल के गोरखपुर, वाराणसी, कुशीनगर, देवरिया, मिर्जापुर, प्रयागराज, अयोध्या में मौर्य बिरादरी निर्णायक भूमिका में है. बुंदेलखंड के बांदा, हमीरपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर और चित्रकूट में कुशवाहा समाज काफी अहम है. एटा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, बदायूं, कन्नौज, कानपुर देहात और आगरा में शाक्य वोटर निर्णायक हैं.
पश्चिम यूपी के मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और मुरादाबाद में सैनी समाज निर्णायक है. वहीं, बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर, रायबरेली, प्रतापगढ़ जिलों में मौर्य बिरादरी की बड़ी तादाद है. पश्चिमी यूपी में सैनी आबादी 15 से 20 फीसदी है.
मौर्य-कुशवाहा-सैनी समाज की सियासी ताकत
उत्तर प्रदेश में 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर मौर्य-सैनी, कुशवाहा और शाक्य समाज चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. करीब दो दर्जन सीटों पर इस समाज के लोग खुद विधायक बनते रहे हैं. पश्चिमी यूपी की नकुड़, सहारनपुर नगर, खतौली, बिजनौर, कैराना विधानसभा सीटों पर काफी प्रभावी है. ब्रज क्षेत्र की भोगांव, किशनी, अलीगंज, कायमगंज, मानीराम, बिधूना सीटों पर अच्छी खासी ताकत रखते हैं.
बुंदेलखंड की बांदा, नरैनी, बबेरू, उरई, ललितपुर, राठ विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका में है. इसके अलावा सिराथू, पडरौना, करछना, फूलपुर, पट्टी, जौनपुर, ऊंचाहर जैसी विधानसभा सीटों पर काफी अहम है. इन विधानसभा सीटों पर मौर्य समाज के 40 हजार से 50 हजार तक मतदाता हैं, जो किसी भी प्रत्याशी की हार-जीत तय करते हैं.
उत्तर प्रदेश की एक दर्जन लोकसभा सीटों पर मौर्य समुदाय का वोट दो लाख से साढ़े तीन लाख है. सलेमपुर, देवरिया, बदायूं, आंवला, एटा, फर्रुखाबाद, मैनपुरी, मिर्जापुर, संभल, इटावा, चंदौली, झांसी और सहारनपुर लोकसभा सीटों पर खुद जीतने या फिर किसी दूसरे समुदाय को जिताने की ताकत रखते हैं. इन्हीं लोकसभा सीटों से मौर्य-शाक्य-सैनी-कुशवाहा समुदाय के लोग प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.
मौर्य-कुशवाहा समाज की सत्ता में भागीदारी
उत्तर प्रदेश में मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, सैनी समाज के 14 विधायक चुनकर 2022 में आए हैं. बीजेपी के टिकट पर 11 विधायक चुनकर आए, जबकि दो विधायक सपा के टिकट पर जीते हैं. 2017 में 15 विधायक मौर्य-कुशवाहा-सैनी समाज के थे और इतने ही विधायक 2012 में भी थे.
2019 के लोकसभा चुनाव में इस मौर्य समाज के दो सांसद चुने गए थे और दोनों ही बीजेपी से जीते हैं. बदायूं से डॉ. संघमित्रा मौर्य और सलेमपुर से रवीन्द्र कुशवाहा, लेकिन 2024 में दोनों ही चुनाव हार गए. मौजूदा समय में इस समाज से तीन सांसद हैं और तीनों ही सपा से जीते हैं. जौनपुर लोकसभा से सपा के बाबू सिंह कुशवाहा, एटा से सपा के देवेश शाक्य और आंवला से नीरज मौर्य सपा से सांसद हैं. इसके अलावा एक राज्यसभा सदस्य बीजेपी से अमरपाल मौर्य हैं.
यूपी में 1996 में मौर्य समाज के सबसे ज्यादा चार सांसद चुने गए थे और इसके अलावा दो-तीन सांसद मौर्य समाज से जीतकर हर लोकसभा चुनाव में आते रहे हैं. आजादी के बाद तीन लोकसभा चुनाव तक इस समाज का कोई भी सांसद नहीं बना था. 1971 के लोकसभा चुनाव के बाद से हर बार मौर्य समाज के लोग चुनाव जीतते और संसद पहुंचते रहे हैं.
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में मौर्य-कुशवाहा-शाक्य और सैनी समाज से दो मंत्री हैं, जिसमें केशव प्रसाद मौर्य डिप्टीसीएम हैं तो जसवंत सिंह सैनी राज्यमंत्री हैं. केशव प्रसाद मौर्य को बीजेपी का ओबीसी चेहरा यूपी में माना जाता है. बीजेपी उन्हें आगे कर सिर्फ मौर्य-कुशवाहा समाज को ही नहीं बल्कि ओबीसी समुदाय को साधने का काम करती है.
मौर्य-शाक्य-सैनी-कुशवाहा का वोटिंग पैटर्न
उत्तर प्रदेश में ओबीसी के तहत आने वाला मौर्य-कुशवाहा-शाक्य-सैनी समाज किसी एक पार्टी का वोट बैंक कभी नहीं रहा. यह समाज चुनाव-दर-चुनाव अपनी सियासी निष्ठा को बदलता रहा है. आजादी के बाद कांग्रेस का परंपरागत वोटर रहा तो लोकदल और जनता दल के भी साथ गया. इसके बाद सपा और बसपा के बीच अलग-अलग क्षेत्रों में बंटता रहा.
उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक बसपा के साथ यह समुदाय जुड़ा रहा है. बसपा के सत्ता से हटते ही मौर्य-कुशवाहा और सैनी समाज ने अपना पैटर्न भी बदल दिया. भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी समुदायों को अपने राजनीतिक गठबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया. केशव प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं को आगे लाना और पिछड़े वर्गों के नेताओं को संगठन में जगह देना इस रणनीति का हिस्सा था.
2016 में स्वामी प्रसाद मौर्य का बसपा छोड़कर भाजपा में आना भी इस सामाजिक समीकरण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया. भाजपा को मौर्य-कुशवाहा और अन्य गैर-यादव पिछड़े समूहों के बीच अपना आधार मजबूत करने में मदद मिली. 2017 में बीजेपी को 90 फीसदी मौर्य समाज का वोट मिला था, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में स्वामी प्रसाद मौर्य के बीजेपी छोड़ने से मौर्य वोट का कुछ हिस्सा सपा को भी मिला है.
लोकसभा चुनाव में समाज के तीन प्रमुख नेता सपा के टिकट पर जीते. यह इस बात का संकेत था कि समुदाय का एक हिस्सा भाजपा से अलग होकर विपक्ष की ओर भी गया. पश्चिमी यूपी में सैनी समाज के कुछ हिस्सों में कम राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर नाराजगी भी सामने आई थी. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि पूरा समाज भाजपा से सपा की ओर चला गया. ज्यादा सटीक बात यह है कि इस समाज के वोट में राजनीतिक विकल्प और क्षेत्रीय विविधता बढ़ी है. स्वामी प्रसाद मौर्य ने सपा से अलग होकर अपनी पार्टी बना ली है.
मौर्य और कुशवाहा समाज के प्रमुख सियासी चेहरे
उत्तर प्रदेश की सियासत में कुशवाहा, मौर्य, शाक्य और सैनी समाज के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नेता हैं. बीजेपी के सबसे बड़े मौर्य चेहरे के तौर पर डिप्टीसीएम केशव प्रसाद मौर्य, राज्यसभा सांसद अमरपाल मौर्य हैं, जो बीजेपी ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. इसके अलावा जसवंत सिंह सैनी बीजेपी के सैनी चेहरा हैं. पश्चिमी यूपी में सैनी समाज से धर्मसिंह सैनी भी कद्दावर नेता हैं, जो फिलहाल किसी भी दल में नहीं हैं.
स्वामी प्रसाद मौर्य यूपी में मौर्य समाज की राजनीति का चर्चित चेहरा माने जाते हैं, जिनका सियासी सफर भाजपा, बसपा और सपा के साथ में जुड़ा रहा है और अब अपनी पार्टी बनाकर सियासत कर रहे हैं. यूपी में मौर्य समाज से सबसे बड़े नेता हैं, लेकिन अपने विवादित बयानों को लेकर सियासी हाशिए पर पहुंच गए हैं.
सपा के चेहरे के तौर पर बाबू सिंह कुशवाहा हैं, जो कुशवाहा समाज के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं. हालांकि, इनकी अपनी एक राजनीतिक पार्टी भी है. इसके अलावा देवेश शाक्य को शाक्य समाज का चेहरा माना जाता है, जो सपा से सांसद हैं. इसके अलावा रुहेलखंड में मौर्य समाज के सपा का प्रमुख राजनीतिक चेहरा नीरज मौर्य हैं.
2027 में कितनी अहम भूमिका होगी?
उत्तर प्रदेश में ओबीसी राजनीति लंबे समय तक यादव केंद्रित रही है. भाजपा ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़कर एक व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाया है. मौर्य-कुशवाहा-शाक्य-सैनी इस गठबंधन के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं. पश्चिमी यूपी, रुहेलखंड, ब्रज और पूर्वांचल में इनकी मौजूदगी कई सीटों पर चुनावी समीकरण बदल सकती है. खासकर उन सीटों पर जहां जीत-हार का अंतर कम होता है.
भाजपा के सामने चुनौती अपने पुराने गैर-यादव ओबीसी सामाजिक गठबंधन को बनाए रखने की होगी तो दूसरी तरफ सपा के सामने 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को विधानसभा चुनाव में दोहराने की चुनौती होगी. स्वामी प्रसाद मौर्य अपनी पार्टी बनाकर मौर्य समाज की राजनीति को सियासी मुकाम देना चाहते हैं, जिसके लिए कांग्रेस के साथ हाथ मिला रखा है. सपा ने जरूर उनसे किनारा कर लिया है.
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के कोर यादव वोटबैंक के मुकाबले भाजपा और बसपा जैसी पार्टियों ने गैर-यादव ओबीसी (मौर्य-कुशवाहा-शाक्य-सैनी और कुर्मी समाज) को लामबंद करके ही सत्ता हासिल की है. बीजेपी केशव प्रसाद मौर्य जैसे चेहरों के दम पर मौर्य-सैनी वोटों को साधे रखने की कोशिश करती है.
वहीं विपक्षी दल सपा और कांग्रेस गठबंधन अपने 'PDA' (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के तहत शाक्य और कुशवाहा समाज के नेताओं को प्रमुखता देकर इस वोटबैंक में सेंध लगाने की रणनीति अपना रहे हैं. ऐसे में असली सवाल यही है कि मौर्य-कुशवाहा-शाक्य-सैनी समाज किस पार्टी का परंपरागत वोटर बनकर रोल अदा करता है.