आंवला पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में स्थित एक ऐतिहासिक तहसील स्तरीय कस्बा और रोहिला शासकों की पूर्व राजधानी रहा है. यह 1813 से आंवला तहसील का मुख्यालय है और लंबे समय से इसे अलग जिला बनाने का प्रस्ताव भी चर्चा में रहा है. प्रस्तावित जिले में आंवला, बिसौली और दातागंज तहसील को शामिल करने की परिकल्पना की गई है. कभी रोहिला शासन के दौरान मस्जिदों, मकबरों और अन्य स्मारकों से समृद्ध एक महत्वपूर्ण दरबारी नगर रहा आंवला बाद में आसपास के कृषि प्रधान क्षेत्र के लिए एक शांत प्रशासनिक और बाजार केंद्र के रूप में विकसित हुआ. आज यह नगर पालिका परिषद के साथ एक साधारण तहसील मुख्यालय के रूप में दक्षिण-पश्चिमी बरेली जिले के ग्रामीण क्षेत्र को सेवाएं प्रदान करता है.
1951 के परिसीमन आदेश के तहत स्थापित आंवला एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है और आंवला लोकसभा सीट के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. इसमें पूरी आंवला नगर पालिका परिषद, सिरौली नगर पंचायत तथा आंवला, अलीगंज और सिरौली कानूनगो सर्किल के बड़ी संख्या में गांव शामिल हैं, जिससे इसका चरित्र मुख्य रूप से ग्रामीण है.
1952 में पहली बार चुनाव होने के बाद से आंवला ने उत्तर प्रदेश में हुए सभी 18 विधानसभा चुनावों में मतदान किया है. शुरुआती दशकों में कांग्रेस यहां सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ताकत रही और 1952 से 1980 के बीच हुए पहले आठ चुनावों में पांच बार सीट जीती. हालांकि, हाल के वर्षों में यह भाजपा का मजबूत गढ़ बन गया है. हालांकि इसकी जीत का सिलसिला बीच-बीच में दूसरी पार्टियों ने भी तोड़ा है. कुल मिलाकर भाजपा ने यह सीट 10 बार जीती है, जिसमें उसके पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की दो जीत भी शामिल हैं, जबकि कांग्रेस ने पांच बार जीत दर्ज की है. जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने एक-एक बार यह सीट जीती है.
आंवला में भाजपा का दबदबा 1985 में शुरू हुआ और इसके बाद से उसने 10 विधानसभा चुनावों में से आठ में जीत हासिल की है. उसकी जीत का सिलसिला 1993 में समाजवादी पार्टी और 2007 में बसपा ने कुछ समय के लिए रोका था.
2012 में भाजपा ने धर्मपाल सिंह को उम्मीदवार बनाकर बसपा से यह सीट वापस हासिल की. सिंह इससे पहले दो बार आंवला का प्रतिनिधित्व कर चुके थे. उन्होंने कड़े मुकाबले में समाजवादी पार्टी के महिपाल सिंह यादव को 4,408 वोटों से हराया. 2017 में भाजपा की जीत का अंतर और कम हो गया, जब धर्मपाल सिंह ने समाजवादी पार्टी के प्रतिद्वंद्वी सिद्धराज सिंह को केवल 3,546 वोटों से हराकर सीट बरकरार रखी. दो करीबी मुकाबलों के बाद 2022 में भाजपा को कुछ राहत मिली, जब धर्मपाल सिंह को 88,956 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के राधा कृष्ण शर्मा को 70,532 वोट मिले. इस तरह भाजपा ने 18,424 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की. सिंह वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं और चार बार आंवला का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.
विधानसभा चुनावों के करीबी मुकाबलों की तुलना में लोकसभा चुनावों में आंवला विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन अपेक्षाकृत आसान रहा है. समीक्षा अवधि के दौरान हुए सभी चार लोकसभा चुनावों में भाजपा ने अपने प्रतिद्वंद्वियों पर बढ़त बनाई. 2009 में भाजपा ने समाजवादी पार्टी पर 7,069 वोटों की बढ़त बनाई, 2014 में 24,922 वोटों की बढ़त हासिल की और 2019 में बसपा पर 22,537 वोटों की बढ़त दर्ज की, जब बसपा समाजवादी पार्टी की सहयोगी के रूप में चुनाव लड़ रही थी. 2024 में भाजपा को एक बड़ा झटका महसूस हुआ, जब उसकी बढ़त काफी कम हो गई. भाजपा उम्मीदवार धर्मेंद्र कश्यप को 86,570 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नीरज मौर्य को 78,082 वोट मिले. इस तरह भाजपा को 8,488 वोटों की बढ़त मिली.
आंवला के मतदाताओं की संख्या वर्षों के दौरान लगातार बढ़ी है. पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 248,283 से बढ़कर 2017 में 298,075, 2019 में 306,818, 2022 में 318,407 और 2024 में 322,227 हो गई. मतदान प्रतिशत काफी अच्छा रहा है, हालांकि इसमें धीरे-धीरे गिरावट आई है. 2012 में मतदान 66.30 प्रतिशत था, जो 2017 में घटकर 60.97 प्रतिशत रह गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह 60.19 प्रतिशत रहा, 2022 के विधानसभा चुनाव में मामूली सुधार के साथ 61.26 प्रतिशत हुआ और 2024 के लोकसभा चुनाव में 58.65 प्रतिशत दर्ज किया गया.
यह हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जिसमें मुस्लिम मतदाताओं की भी अच्छी संख्या है. मुस्लिम मतदाता कुल मतदाताओं का 23.50 प्रतिशत हैं, जबकि अनुसूचित जाति के मतदाताओं की हिस्सेदारी 15.70 प्रतिशत है. अन्य समुदायों में लोधी राजपूत एक प्रमुख समूह हैं, जबकि यादव, मौर्य और कुर्मी भी अच्छी संख्या में मौजूद हैं. ब्राह्मण और ठाकुर समेत सवर्ण समुदायों की भी उल्लेखनीय मौजूदगी है. यह विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है, जहां 82.33 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में और 17.67 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है.
आंवला 18वीं शताब्दी की शुरुआत में महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभरा, जब रोहिला नेता अली मोहम्मद खान ने लगभग 1730 में इस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया और इसे उभरते हुए रोहिला राज्य की राजधानी बनाया. आंवला एक चौथाई सदी से अधिक समय तक रोहिला दरबार का केंद्र रहा और कई महत्वपूर्ण रोहिला सरदारों को यहां दफनाया गया. रोहिलों द्वारा राजधानी को बरेली स्थानांतरित करने के बाद आंवला ने धीरे-धीरे अपना राजनीतिक महत्व खो दिया और इसके कई स्मारक खंडहर में बदल गए. ब्रिटिश शासन के दौरान 1813 में इसे तहसील का मुख्यालय बनाया गया और इसके बाद यह फिर से एक प्रशासनिक और बाजार केंद्र के रूप में विकसित हुआ, जहां व्यापार और अनाज का कारोबार काफी सक्रिय था. ऐतिहासिक विवरणों में इस नगर में कई पुरानी मस्जिदों, कब्रिस्तानों और रोहिला किले तथा दरबार के अवशेषों का भी उल्लेख मिलता है.
यह कस्बा और इसके आसपास का ग्रामीण क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है. गेहूं, धान, गन्ना, आलू, सरसों और अन्य फसलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं. आंवला के बाजार आसपास के गांवों से आने वाली कृषि उपज के संग्रह और व्यापार केंद्र के रूप में काम करते हैं. आंवला में इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव का बड़ा उर्वरक संयंत्र भी औद्योगिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. पेट्रोलियम भंडारण और वितरण सुविधाएं भी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाती हैं.
आंवला सड़क और रेल मार्ग से बरेली तथा रोहिलखंड के अन्य हिस्सों से जुड़ा हुआ है. कस्बे का अपना रेलवे स्टेशन बरेली-मुरादाबाद रेल कॉरिडोर पर स्थित है, जो बरेली, मुरादाबाद और अन्य क्षेत्रों से रेल संपर्क प्रदान करता है. बरेली शहर सड़क मार्ग से लगभग 40 किलोमीटर दूर है, जबकि बदायूं करीब 65 किलोमीटर और शाहजहांपुर लगभग 110 किलोमीटर दूर है. लखनऊ की दूरी लगभग 300 किलोमीटर है, जबकि नई दिल्ली सड़क मार्ग से करीब 250 किलोमीटर दूर है. यह कस्बा उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के भी अपेक्षाकृत करीब है. हल्द्वानी लगभग 140 किलोमीटर और नैनीताल सड़क मार्ग से करीब 180 किलोमीटर दूर है, जिससे आंवला बरेली जिले के उन कस्बों में शामिल है जहां से तराई और कुमाऊं की पहाड़ियों तक पहुंच अपेक्षाकृत आसान है.
विधानसभा चुनावों में लगातार तीन जीत और लोकसभा चुनावों में लगातार चार बढ़त, यानी कुल सात चुनावों का अजेय सिलसिला, किसी भी पार्टी के लिए निराशाजनक हो सकता है. हालांकि, तथ्य यह है कि भाजपा के दबदबे के बीच उसके विरोधियों, खासकर समाजवादी पार्टी ने कई बार उसे करीबी मुकाबले में खींच लिया है. इससे समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्ष के लिए भाजपा को हराने की रणनीति बनाने की गुंजाइश बनी रहती है. 2012 और 2017 में भाजपा की अपेक्षाकृत कम अंतर वाली जीत इस बात की याद दिलाती है कि उसका दबदबा हमेशा आसान विधानसभा जीत में नहीं बदला है.
आंवला को अलग जिला बनाने का प्रस्ताव भी 2027 में एक दिलचस्प राजनीतिक मुद्दा बन सकता है. यह मांग मौजूदा विधायक धर्मपाल सिंह से जुड़ी रही है, जो उत्तर प्रदेश सरकार में वरिष्ठ मंत्री हैं. जिले का दर्जा मिलने की संभावना भाजपा को मतदाताओं के सामने विकास और प्रशासन से जुड़ा एक मुद्दा पेश करने का अवसर दे सकती है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जो विधानसभा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा हैं. हालांकि, यह भाजपा के मजबूत संगठन और धर्मपाल सिंह की व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ से मिलने वाले लाभ को और कितना बढ़ा पाएगा, यह देखना बाकी है.
भाजपा 2027 के चुनाव में स्पष्ट रूप से पसंदीदा पार्टी के तौर पर उतरेगी, लेकिन वह आंवला को हल्के में लेने की स्थिति में नहीं होगी. समाजवादी पार्टी को 2022 से पहले हुए दो करीबी विधानसभा मुकाबलों और इस तथ्य से उत्साह मिलेगा कि लोकसभा चुनाव में भाजपा की बढ़त बरकरार रहने के बावजूद 2019 से 2024 के बीच आधे से अधिक कम हो गई. इसलिए काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि विपक्ष मुस्लिम मतदाताओं के अपने बड़े आधार और यादव, मौर्य, कुर्मी तथा अन्य समुदायों के कुछ वर्गों के समर्थन को एक व्यापक चुनावी गठजोड़ में बदल पाता है या नहीं. भाजपा की जीत की संभावना मजबूत है, लेकिन आंवला सत्तारूढ़ पार्टी को लगातार चौथी विधानसभा जीत देने से पहले उसे कड़ी चुनौती दे सकता है.
(अजय झा)
Pt. Radha Krishan Sharma
SP
Laxman Prasad
BSP
Jeeraj Singh
IND
Omveer
INC
Devendra Maithil
IND
Ram Singh Maurya
AAAP
Nota
NOTA
Makkhan
BMUP
Shivadas Verma
VSIP
Mueenuddin
ASPKR
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