उत्तर प्रदेश के शामली जिले का कस्बा कैराना राज्य के पश्चिमी हिस्से में है और हरियाणा व उत्तराखंड की सीमाओं के पास स्थित है. यह कस्बा एक लंबे ऐतिहासिक और राजनीतिक इतिहास वाला है, लेकिन आज यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जानी-पहचानी चुनौतियों को दिखाता है, जैसे कि असमान विकास, खेती पर दबाव और बढ़ती अर्ध-शहरी आबादी की जरूरतें.
कैराना एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है और कैराना लोकसभा सीट के पांच हिस्सों में से एक है. यह क्षेत्र 1955 में बना था, और इसका मौजूदा स्वरूप 2008 के परिसीमन आदेश के तहत तय किया गया था. अपने मौजूदा स्वरूप में, इसमें कैराना तहसील और ऊन, झिंझाना व आस-पास के कई स्थानीय इलाके शामिल हैं, जिससे यह एक मजबूत ग्रामीण आधार और कुछ शहरी इलाकों वाली सीट बन गई है.
कैराना में इसके बनने के बाद से 18 विधानसभा चुनाव हुए हैं, जिनमें 2014 में हुआ उपचुनाव भी शामिल है, और यहां की राजनीति में कड़ी टक्कर देखने को मिलती रही है. इस क्षेत्र में राजनीतिक पसंद बार-बार बदलती रही है. मतदाता मौजूदा माहौल, स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवार की मजबूती के आधार पर एक पार्टी से दूसरी पार्टी की ओर बदलते रहे हैं. कांग्रेस पार्टी और बीजेपी, दोनों ने कैराना सीट चार-चार बार जीती है. समाजवादी पार्टी तीन बार जीती है, जनता दल और निर्दलीय उम्मीदवार दो-दो बार जीते हैं, जबकि भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी और जनता पार्टी (सेक्युलर) ने एक-एक बार यह सीट जीती है. व्यक्तियों की बात करें तो, हुकुम सिंह ने कैराना सीट सात बार जीती- चार बार बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर, दो बार कांग्रेस पार्टी के लिए और एक बार जनता पार्टी (सेक्युलर) के बैनर तले.
2012 में, बीजेपी के हुकुम सिंह ने यह सीट जीती; यह पार्टी के लिए उनकी लगातार चौथी जीत थी. उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के अनवर हसन को 19,543 वोटों से हराया. 2014 में कैराना सीट से उनके लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद समाजवादी पार्टी के लिए जीत की हैट्रिक लगाने का मौका बना, और तीनों बार नाहिद हसन उनके उम्मीदवार थे. हसन ने 2014 के उपचुनाव में बीजेपी के अनिल चौहान को 1,099 वोटों के मामूली अंतर से हराया. 2017 में BJP की मृगांका सिंह को हराने के बाद उनकी जीत का अंतर बढ़कर 21,162 वोट हो गया. 2022 में नाहिद हसन ने अपनी सीट बरकरार रखी और BJP की अपनी प्रतिद्वंद्वी मृगांका सिंह को फिर से 25,887 वोटों से हराया.
लोकसभा चुनावों के दौरान कैराना विधानसभा क्षेत्र में भी राजनीतिक वफादारी बदलने का ऐसा ही पैटर्न देखने को मिलता है. यह निर्वाचन क्षेत्र बड़ी संसदीय सीट में बदलते राजनीतिक रुझानों के साथ चलता रहा है. 2009 में, BSP ने BJP पर 15,424 वोटों की बढ़त बनाई थी. BJP ने बढ़त हासिल की और 2014 में समाजवादी पार्टी से 26,629 वोट और 2019 में 15,481 वोट आगे रही. आखिरकार, 2024 में समाजवादी पार्टी ने BJP पर 30,649 वोटों की बढ़त बनाकर बाजी पलट दी. समाजवादी पार्टी की इकरा चौधरी को 116,265 वोट मिले और BJP के प्रदीप कुमार चौधरी को 85,616 वोट मिले. क्षेत्र-वार वोटिंग पैटर्न से पता चलता है कि कैराना राजनीतिक रूप से कभी भी लंबे समय तक स्थिर नहीं रहा है.
पिछले कुछ वर्षों में कैराना में मतदाताओं की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है. 2012 के विधानसभा चुनावों में इसकी मतदाता सूची में 269,228 पंजीकृत मतदाता थे, जो 2017 में बढ़कर 300,659 हो गए. 2019 तक यह संख्या बढ़कर 312,576 हो गई. 2022 में यह संख्या और बढ़कर 322,423 और 2024 में 326,982 हो गई.
ग्रामीण और अर्ध-शहरी मिश्रित सीट होने के बावजूद कैराना में मतदान का प्रतिशत अच्छा रहा है. 2012 में यह 66.03 प्रतिशत था. 2017 में मतदान प्रतिशत 69.56 प्रतिशत था, जबकि 2019 के संसदीय चुनाव में यह 66.51 प्रतिशत था. 2022 में यह बढ़कर 75.04 प्रतिशत हो गया और 2024 के लोकसभा चुनावों में यह 63.80 प्रतिशत रहा.
2011 की जनगणना के अनुमानों के अनुसार, कैराना हिंदू-बहुसंख्यक सीट है, जहां मुस्लिम आबादी भी काफी है. कुल मतदाताओं में अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी लगभग 7.70 प्रतिशत है, जबकि अनुसूचित जनजातियों की संख्या न के बराबर है. यह निर्वाचन क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है. यहां लगभग 72.85 प्रतिशत मतदाता ग्रामीण इलाकों में और 27.15 प्रतिशत शहरी इलाकों में रहते हैं. इस सामाजिक बनावट के कारण चुनावी राजनीति में जाति और समुदाय के समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
कैराना का इतिहास कई परतों वाला है. यह पश्चिमी गंगा के मैदानी इलाकों में बसा एक पुराना शहर है और सदियों से उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश की व्यापक सांस्कृतिक और राजनीतिक दुनिया का हिस्सा रहा है. स्थानीय मान्यताओं और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार इसका संबंध महाभारत काल से है, जबकि बाद के समय में इसका विकास मध्यकालीन और औपनिवेशिक शासन के दौरान हुआ. समय के साथ, यह क्षेत्र के एक महत्वपूर्ण बाजार और प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ. हालांकि, आजादी के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई अन्य कस्बों की तरह, कैराना भी अपनी रणनीतिक स्थिति और दिल्ली से निकटता का लाभ उठाकर अपनी अर्थव्यवस्था को बदलने वाला व्यापक विकास नहीं कर पाया.
भौगोलिक दृष्टि से, कैराना हरियाणा सीमा के पास पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानी इलाकों में स्थित है. यहां की जमीन ज्यादातर समतल है और यहां सिंचाई-आधारित खेती होती है. गन्ना, गेहूं और अन्य मौसमी फसलें यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. छोटे-मोटे व्यापार, ट्रांसपोर्ट और अर्ध-शहरी सेवाओं से भी लोगों की आजीविका चलती है. यह इलाका सड़क मार्ग से शामली, मुजफ्फरनगर, पानीपत और आस-पास के दूसरे केंद्रों से जुड़ा है, जिससे इसे अपने आकार के मुकाबले ज्यादा बड़ा क्षेत्रीय संपर्क मिलता है.
कैराना में बुनियादी सुविधाओं में जिला और राज्य की सड़कों से कनेक्टिविटी शामिल है, जबकि रेल सुविधा शामली और आस-पास के रेल नेटवर्क से मिलती है. इस निर्वाचन क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं तो हैं, लेकिन यहां के लोग बेहतर सड़कों, जल निकासी, पीने के पानी की सप्लाई और रोजगार के मौकों की मांग करते रहते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर इलाकों की तरह, यहां भी पलायन और आस-पास के शहरी केंद्रों पर निर्भरता एक बड़ी सच्चाई है.
कैराना कई अहम कस्बों और शहरों से जुड़ा है. जिला मुख्यालय शामली यहां से लगभग 12 किमी दूर है, जबकि मुजफ्फरनगर लगभग 35 किमी दूर है. पानीपत लगभग 42 किमी, सहारनपुर लगभग 70 किमी और देवबंद लगभग 62 किमी दूर है. नौकरी, व्यापार और पलायन के लिए दिल्ली एक बड़ा केंद्र है जो यहां से लगभग 90 से 100 किमी दूर है, जबकि हरिद्वार लगभग 115 किमी और रुड़की लगभग 95 किमी दूर है.
कैराना में बीजेपी एक मजबूत दावेदार रही है, हालांकि 2018 में हुकुम सिंह की मौत के बाद उसकी पकड़ थोड़ी कमजोर हुई है. समाजवादी पार्टी ने अच्छी बढ़त बनाई है, बीएसपी का भी कुछ इलाकों में असर है, और कांग्रेस की भी इस क्षेत्र की व्यापक राजनीतिक सोच में कुछ हद तक मौजूदगी बनी हुई है. 2027 में कैराना में कड़ा और दिलचस्प मुकाबला होने की उम्मीद है, जिस पर स्थानीय उम्मीदवार की मजबूती, जातिगत समीकरण, ग्रामीण मुद्दे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का व्यापक राजनीतिक माहौल असर डालेंगे.
(अजय झा)
Mriganka Singh
BJP
Rajendera
BSP
Akhlak
INC
Nota
NOTA
Sethpal
IND
Harun Ali
IND
Israr
IND
Devi Singh
ASPKR
Vijay Kumar
IND
Sangeeta
AAAP
उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में सपा प्रमुख अखिलेश यादव को उनके ही मजबूत गढ़ आजमगढ़ में विपक्ष ने घेराबंदी में जुट गए हैं. बसपा प्रमुख मायावती सीधे सपा पर अटैक करने का दांव चल रही हैं तो ओम प्रकाश राजभर बीजेपी की नैया पर सवार होकर अपने सियासी आधार के जरिए मात देना चाहते हैं.
उत्तर प्रदेश के सियासी तपिश के बीच सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से मुलाकात की. इस दौरान दोनों के बीच राम मंदिर में चंदा चोरी, गोरक्षा और सनातन धर्म के मुद्दे पर बातचीत हुई, जिसे लेकर अखिलेश यादव अब बीजेपी को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए सियासी तानाबाना बुना जाने लगा है. सपा ने अपने पीडीए सियासी समीकरण में ब्राह्मणों को जोड़ने की कवायद शुरू की है, जिसके लिए अखिलेश यादव ने अयोध्या के पूर्व विधायक पवन पांडेय और बलिया के सांसद सनातन पांडेय को फ्रंटफुट पर उतार रखा है.
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के बीच सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण लागू करने और परिसीमन बिल के जरिए उच्च सदन में सीटें बढ़ाने की मांग की है. उन्होंने यह बात महिल संगठनों से मुलाकात के बाद कही है. ऐसे में सवाल उठता है कि तीन महीने के बाद अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर क्यों यू-टर्न लिया?
सुल्तानपुर की जनसभा में सीएम योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए दावा किया कि उनकी सरकार ने भू-माफियाओं से 64 हजार एकड़ जमीन खाली कराई. उन्होंने कहा कि कार्रवाई के डर से कई माफिया खुद सरेंडर करने पहुंच गए.
BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी दो दिवसीय लखनऊ दौरे के दौरान हनुमान सेतु मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद एक प्रसिद्ध चाय स्टॉल पर पहुंचे, जहां उन्होंने लोगों से चर्चा की. उन्होंने दावा किया कि उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव में बीजेपी फिर से सत्ता में वापसी करेगी.
उत्तर प्रदेश की सियासत में लंबे समय तक सपा एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण के सहारे चुनाव लड़ती रही है, लेकिन अब इस नैरेटिव को पूरी तरह से बदलकर बीजेपी ने यूपी में पीएम मोदी और सीएम योगी की जोड़ी के साथ अपने समीकरण बना लिए हैं. इस तरह बीजेपी के एम-वाई समीकरण का बीजेपी कैसे मुकाबला कर पाएगी?
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने लखनऊ प्रवास के दौरान पार्टी के बड़े नेताओं की एकजुटता का संदेश दिया. उन्होंने नेताओं को यह संदेश दे दिया कि पार्टी की लाइन पर ही चलना होगा.
लखनऊ में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की अध्यक्षता में आयोजित एनडीए सहयोगियों की अहम बैठक में शामिल होने जा रहे सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने सीट बंटवारे के सवाल पर उन्होंने अपनी ही शैली में तंज कसते हुए कहा कि राजनीति में लोग जब तोप का लाइसेंस मांगते हैं तो उन्हें कट्टे का लाइसेंस थमा दिया जाता है.
BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी लखनऊ यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश के पूर्व बीजेपी प्रदेश अध्यक्षों और एनडीए गठबंधन के घटक दलों के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक की. इस दौरान उन्होंने साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर रणनीतिक चर्चा की.