थावनूर विधानसभा क्षेत्र केरल के मलप्पुरम जिले में स्थित है. लोकसभा चुनावों के लिए यह पोन्नानी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है और केरल विधानसभा की 140 सीटों में से एक है. थावनूर सीट का गठन 2008 में परिसीमन (Delimitation) के बाद हुआ था. बनने के बाद से ही यह सीट केरल की राजनीति में काफी अहम रही है, क्योंकि यहां चुनाव अक्सर बहुत कड़े और मुकाबले
वाले होते हैं. यह एक सामान्य (अनारक्षित) सीट है.
प्रशासनिक और भौगोलिक स्थिति की बात करें तो थावनूर विधानसभा क्षेत्र में पोन्नानी तालुक के अंतर्गत आने वाली एडप्पल, थवनूर और वट्टमकुलम पंचायतें, और तरुर तालुक के अंतर्गत आने वाली पुराथुर, मंगलम और त्रिप्रंगोड पंचायतें शामिल हैं. यह क्षेत्र मलप्पुरम जिले के ग्रामीण और अर्ध-शहरी हिस्सों से मिलकर बना है, जहां अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के समुदाय रहते हैं. 2021 के केरल विधानसभा चुनाव में थवनूर में 2,01,183 पंजीकृत मतदाता थे, जो पिछले चुनावों की तुलना में अधिक थे. यह बढ़ती आबादी और लोगों की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी को दर्शाता है. मलप्पुरम जिले की अन्य सीटों की तरह थावनूर में भी मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यक है, इसके बाद हिंदू और ईसाई आबादी आती है.
प्रतिनिधित्व और राजनीतिक इतिहास में थावनूर की पहचान मुख्य रूप से डॉ. के. टी. जलील से जुड़ी रही है. परिसीमन के बाद पहली बार हुए चुनावों से लेकर अब तक उन्होंने इस सीट पर अपना दबदबा बनाए रखा है. वे भले ही निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ते रहे हों, लेकिन उन्हें लगातार वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) का समर्थन मिलता रहा है. थावनूर की नई सीट बनने के बाद 2011 में पहली जीत के. टी. जलील (निर्दलीय, LDF समर्थित) ने दर्ज की. इसके बाद 2016 में वे फिर से बड़े वोट शेयर के साथ जीत गए. 2021 में भी उन्होंने एक बेहद कड़े मुकाबले में जीत हासिल की. जलील की लगातार जीत यह दिखाती है कि क्षेत्र में LDF का संगठनात्मक नेटवर्क मजबूत है और साथ ही जलील की व्यक्तिगत पकड़ भी काफी मजबूत रही है.
2021 के केरल विधानसभा चुनाव के नतीजों में डॉ. के. टी. जलील (निर्दलीय, LDF समर्थित) को 70,358 वोट मिले, जो कुल वैध मतों का लगभग 46.46% था. वहीं UDF की ओर से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार फिरोज कुन्नुमपरंबिल को 67,794 वोट मिले, जो लगभग 44.77% था. तीसरे स्थान पर रमेश कोट्टायिपुरम (BDJS, NDA) रहे, जिन्हें 9,914 वोट मिले. बाकी वोट कुछ निर्दलीय और छोटी पार्टियों में बंट गए. जलील ने यह चुनाव केवल 2,564 वोटों के अंतर से जीता, जिससे साफ होता है कि इस बार मुकाबला बेहद कड़ा था. जीत तो जलील की हुई, लेकिन इतना कम अंतर इस बात का संकेत था कि क्षेत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है.
मतदाता व्यवहार और रुझान देखें तो थावनूर एक ऐसा क्षेत्र है जहां यह साफ दिखता है कि अगर किसी उम्मीदवार की जमीनी पकड़ मजबूत हो, तो वह बड़ी पार्टियों का औपचारिक सदस्य न होते हुए भी जीत सकता है. डॉ. के. टी. जलील का लगातार निर्दलीय रहकर जीतना इसी बात का उदाहरण है. थावनूर में UDF, खासकर कांग्रेस, हमेशा से मुख्य चुनौती देने वाली ताकत रही है, और कई बार उसने जीत का अंतर कम किया है तथा अच्छा वोट प्रतिशत हासिल किया है. इसके अलावा BDJS जैसी पार्टियां भी चुनाव मैदान में उतरती रही हैं, जो बताता है कि सीट पर मुकाबला बहुकोणीय भी रहता है, हालांकि इन पार्टियों का वोट शेयर अभी भी मुख्य गठबंधनों से कम रहता है. कुल मिलाकर, थावनूर में पिछले रुझान LDF समर्थित उम्मीदवारों के पक्ष में रहे हैं, लेकिन यहां मतदाताओं का फैसला स्थानीय मुद्दों, गठबंधन की रणनीति और उम्मीदवार की छवि के आधार पर बदल भी सकता है.
स्थानीय मुद्दों में मुख्य रूप से क्षेत्र के लोगों की मांग इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुंच, और रोजगार व आजीविका के अवसर बढ़ाने से जुड़ी रहती है.
पर्यटन स्थलों की बात करें तो थावनूर में देखने लायक जगहों में थावनूर श्री ब्रह्मावु मंदिर, थावनूर चेरुथिरुन्नवाय्या श्री शिव मंदिर, थावनूर मना, और भरथपुझा नदी के सुंदर दृश्य प्रमुख हैं.
(श्रेया प्रसाद)