तरुर विधानसभा क्षेत्र केरल के पलक्कड़ जिले में स्थित है. यह अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित विधानसभा सीट है और केरल विधानसभा की 140 सीटों में से 57वीं सीट मानी जाती है. यह सीट 2008 में परिसीमन (Delimitation) के बाद बनाई गई थी. लोकसभा चुनावों के लिए यह क्षेत्र अलाथूर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है.
बात करें तो तारूर मुख्य रूप से कृषि प्रधान इलाका है, हालांकि कुछ हिस्सों में अर्ध-शहरी (semi-urban) विकास भी देखने को मिलता है. इस विधानसभा क्षेत्र में अलाथूर तालुक के अंतर्गत आने वाली कई पंचायतें शामिल हैं- कन्नम्ब्रा, कवास्सेरी, कोट्टायी, कुथनूर, पेरिंगोट्टुकुरिस्सी, पुदुकोड, तरुर और वडक्कनचेरी पंचायतें.
मतदाता भागीदारी और मतदाता संख्या के अनुसार, 2021 के केरल विधानसभा चुनाव में तरुर सीट पर कुल 1,70,733 पंजीकृत मतदाता थे. इनमें 84,056 पुरुष और 86,677 महिलाएं थीं, जैसा कि चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों में दर्ज है. कुल 1,30,407 वैध वोट पड़े और इस सीट पर लगभग 77.12% का मजबूत मतदान हुआ.
विधानसभा सदस्य और राजनीतिक इतिहास की बात करें तो, तरुर सीट अपने गठन के बाद से अधिकतर समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) के पास रही है. इससे यह साफ संकेत मिलता है कि पलक्कड़ के इस इलाके में वामपंथी गठबंधन LDF की पकड़ लगातार मजबूत रही है. परिसीमन के बाद इस सीट के पहले विधायक ए. के. बालन (CPI(M)) बने थे. वे 2016 में फिर से चुने गए और केरल सरकार में मंत्री भी रहे.
2021 के विधानसभा चुनाव परिणाम में, पी. पी. सुमोद (CPI(M), LDF) ने जीत दर्ज की. उन्हें 67,744 वोट मिले, जो कुल वोटों का लगभग 51.58% था. उन्होंने के. ए. शीबा (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, UDF) को हराया, जिन्हें 43,213 वोट मिले. बाकी वोट स्वतंत्र और अन्य उम्मीदवारों में बंट गए. इस चुनाव में पी. पी. सुमोद ने 24,531 वोटों के अंतर से जीत हासिल की, जो कुल वैध वोटों का लगभग 18.76% के बराबर था.
मतदाता व्यवहार और चुनावी रुझान देखें तो, तरुर सीट बनने के बाद से यहां का चुनावी माहौल लगातार LDF के पक्ष में रहा है, खासकर CPI(M) के लिए. पहले ए. के. बालन और उसके बाद पी. पी. सुमोद की जीत यह दिखाती है कि यहां अनुसूचित जाति और अन्य समुदायों में वामपंथी राजनीति की मजबूत नींव बनी हुई है. कांग्रेस के नेतृत्व वाला UDF हमेशा मुख्य प्रतिद्वंद्वी रहा है और उसे अच्छा वोट प्रतिशत भी मिलता रहा है, लेकिन वह LDF की बढ़त को पार नहीं कर पाया. वहीं BJP और कुछ छोटे दल तथा निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनाव लड़ते रहे हैं और कभी-कभी उन्हें ठीक-ठाक वोट भी मिल जाते हैं, लेकिन अब तक उन्हें कोई खास चुनावी सफलता नहीं मिली है.
सामाजिक-आर्थिक स्थिति के संदर्भ में, यहां के लोगों की आय का बड़ा हिस्सा खेती से आता है. धान (पैडी), नारियल और केला की खेती मुख्य रूप से की जाती है. यहां काम करने वालों में एक बड़ा वर्ग छोटे और सीमांत किसानों का है. तरुर कस्बे और वडक्कनचेरी जैसी अर्ध-शहरी पंचायतों में व्यापार, सेवाएं और छोटे उद्योग भी लोगों को रोजगार और आय का सहारा देते हैं. इसके अलावा, खासकर गल्फ देशों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों से आने वाली रेमिटेंस (विदेश से भेजी गई कमाई) भी इस क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों, निवेश और खर्च करने की क्षमता को बढ़ाती है.
मतदाताओं की प्रमुख चिंताएं और विकास से जुड़े मुद्दे में सबसे अहम मांगें हैं, फसल विविधीकरण (crop diversification) के लिए बेहतर सहायता, बाजार से बेहतर जोड़ (market link) और सिंचाई की सुविधा, कृषि के बाहर खासकर युवाओं के लिए बेहतर नौकरी के अवसर, और बुनियादी ढांचे में सुधार, जिसमें दूर-दराज इलाकों में सार्वजनिक परिवहन, सड़कें, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाएं (मेडिकल सुविधाएं) शामिल हैं.
पर्यटन स्थलों में तरुर क्षेत्र के कुछ प्रमुख स्थान भी आते हैं, जैसे तरुर पूथकोडे भगवती मंदिर और अय्यप्पन कुडम डैम.
(श्रेया प्रसाद)