सुल्तान बाथरी, केरल के वायनाड जिले का एक खास और जटिल विधानसभा क्षेत्र है. यह केरल विधानसभा का क्षेत्र संख्या 18 है. बाथरी वायनाड का प्रमुख व्यापार, स्वास्थ्य और प्रशासनिक केंद्र है, लेकिन इसके साथ-साथ यह इलाका खेती, जंगलों से जुड़ी आजीविका और सीमावर्ती व्यापार पर भी बहुत निर्भर है.
क्योंकि यहां खेती, जंगल और वन्यजीव गलियारे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. जलवायु परिवर्तन, जमीन के उपयोग को लेकर विवाद और इंसान-जानवरों के बीच टकराव यहां के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और राजनीति को प्रभावित करते हैंय
सुल्तान बाथरी को केरल की राजनीति में कांग्रेस पार्टी का गढ़ माना जाता है. अब तक यहां से केवल कांग्रेस या उसके सहयोगी दल ही चुनाव जीतते आए हैं. यह समर्थन किसी एक चुनाव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक समूहों के लंबे समय से बने गठबंधन का नतीजा है.
आदिवासी समुदाय, मध्य त्रावणकोर से आए ईसाई किसान और कन्नूर तट से आए मुस्लिम समुदाय- इन सबने मिलकर खेती, जमीन, सुरक्षा और कल्याण से जुड़ी राजनीति को मजबूत किया है.
बाथरी तीन बड़े वन्यजीव क्षेत्रों के संगम पर स्थित है- वायनाड वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी, कर्नाटक का बंडीपुर टाइगर रिजर्व और तमिलनाडु का मुदुमलाई टाइगर रिजर्व. इसलिए यह इलाका पर्यावरण की दृष्टि से बहुत संवेदनशील है. जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश के पैटर्न बदल रहे हैं, जंगलों में पानी की कमी हो रही है और हाथी-बाघ जैसे जानवर भोजन व पानी की तलाश में बस्तियों की ओर आ रहे हैं.
यह इलाका नेशनल हाईवे 766 पर स्थित है, जो कोझिकोड को मैसूर से जोड़ता है, और कर्नाटक व तमिलनाडु की सीमाओं के पास है. इससे व्यापार, पर्यटन और आवाजाही बढ़ी है, लेकिन जंगलों से होकर गुजरने वाले वाहनों से वन्यजीवों पर खतरा भी बढ़ा है.
यहां मलयालम के साथ-साथ तमिल, कन्नड़ और उर्दू भाषाएं भी बोली जाती हैं, जिससे इसकी सामाजिक संस्कृति विविध और समावेशी बनती है.
इस विधानसभा क्षेत्र में सुल्तान बाथेरी शहर, अंबालवायल, नेनमेनी, नूलपुझा, चीराल और किडंगनाड जैसे इलाके आते हैं.
अंबालवायल सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण है, जहां हेरिटेज म्यूजियम और एडक्कल गुफाएं हैं. नेनमेनी और नूलपुझा जंगल के किनारे बसे इलाके हैं, जहां आदिवासी आबादी ज्यादा है और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बार-बार होती हैं.
यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती है. काली मिर्च और अदरक प्रमुख फसलें हैं, साथ ही कॉफी, सुपारी, केला और धान भी उगाए जाते हैं.
लेकिन अनियमित बारिश, फसलों पर जानवरों के हमले, दाम गिरना और लागत बढ़ने से किसान कर्ज़ में डूब रहे हैं.
पानिया, कट्टुनायक, कुरुमा और अडिया जैसे आदिवासी समुदाय यहां की पुरानी आबादी हैं, लेकिन आज भी उन्हें जमीन के अधिकार और जंगल से जुड़े संसाधनों तक पूरी पहुँच नहीं मिल पाई है.
दूसरी ओर, प्रवासी ईसाई किसान और मुस्लिम समुदाय खेती और व्यापार में प्रभावशाली हैं. जमीन पर कब्जा, वन अधिकार और पुनर्वास जैसे मुद्दे चुनाव के समय अक्सर विवाद का कारण बनते हैं.
यह क्षेत्र हाथी और बाघों के हमलों के लिए जाना जाता है. फसल नष्ट होना, मकानों को नुकसान और जान-माल की हानि आम बात हो गई है. लोगों का मानना है कि यह समस्या सिर्फ जंगल की नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, गलत भूमि उपयोग और कमजोर नीतियों का नतीजा है.
यहां प्रमुख मुद्दों की बात करें तो जलवायु परिवर्तन का खेती और जल संसाधनों पर गहरा प्रभाव, हाथी-बाघों से बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष, किसानों की लगातार बिगड़ती आर्थिक स्थिति, आदिवासी समुदायों के भूमि और वन अधिकारों से जुड़े लंबित सवाल, जंगलों के आसपास अनियंत्रित विकास और पर्यटन का दबाव, तथा एनएच-766 पर सड़क सुरक्षा की समस्या और वन्यजीवों की बढ़ती मौतें सबसे अहम चुनौतियां हैं.
सुल्तान बाथेरी को वायनाड का पर्यावरणीय और राजनीतिक केंद्र कहा जाता है. यहां चुनाव जीतने के लिए जरूरी है कि कोई भी नेतृत्व जंगल और खेती, वन्यजीव और इंसानी जीवन, तथा विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बना सके. यही इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती और पहचान है.