दुनिया के सबसे तनावपूर्ण क्षेत्र मध्य पूर्व में एक बार फिर नया मोड़ आता दिख रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान पर सैन्य प्रहार की चर्चा जोरों पर है. लेकिन इस पूरे मामले में इजरायल का रुख काफी दिलचस्प है. इजरायल, जो ईरान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है, ट्रंप के ईरान अटैक से दूरी बना रहा है... सवाल उठता है कि आखिर इजरायल ऐसा क्यों कर रहा है?
क्या वह अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए चुपके-चुपके ईरान को सीधा और घातक झटका देने की तैयारी कर रहा है? विशेष रूप से दक्षिणी लेबनान में सीक्रेट री-डिप्लॉयमेंट प्लान पर काम इस संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
ईरानी प्रॉक्सी यानी ईरान समर्थित समूहों जैसे हिज्बुल्लाह पर लगाम कसने के लिए इजरायल लंबे समय से ट्राई कर रहा है. दक्षिण लेबनान में सैन्य तैनाती को फिर से व्यवस्थित करने का गुप्त प्लान अगर सफल होता है तो ईरानी प्रॉक्सी की रीढ़ टूट सकती है.
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ट्रंप के प्लान से इजरायल की दूरी का कारण
ट्रंप के ईरान पर हमले की योजना को लेकर इजरायल सार्वजनिक रूप से बहुत उत्साहित नहीं दिख रहा है. इसके कई कारण हो सकते हैं.

दक्षिण लेबनान में सीक्रेट री-डिप्लॉयमेंट प्लान
सबसे दिलचस्प हिस्सा है दक्षिणी लेबनान में इजरायल का सीक्रेट री-डिप्लॉयमेंट प्लान. लेबनान की दक्षिणी सीमा हिज्बुल्लाह का गढ़ मानी जाती है. हिज्बुल्लाह ईरान का सबसे मजबूत प्रॉक्सी है, जिसके पास हजारों रॉकेट और मिसाइल हैं. इजरायल पिछले कई महीनों से इस क्षेत्र में अपनी खुफिया गतिविधियां बढ़ाए हुए है.
री-डिप्लॉयमेंट का मतलब है कि इजरायल अपनी सेना और खुफिया तंत्र को दक्षिण लेबनान में फिर से मजबूती से तैनात करने की योजना बना रहा है. यह प्लान चुपके-चुपके चल रहा है ताकि ईरान और हिज्बुल्लाह को पहले से कोई भनक न लगे. अगर यह प्लान सफल हुआ तो ईरानी प्रॉक्सी की रणनीतिक क्षमता बुरी तरह प्रभावित होगी.
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हिज्बुल्लाह की सप्लाई लाइन कट सकती है. ईरान का लेबनान के जरिए इजरायल पर दबाव बनाने का रास्ता बंद हो सकता है. ईरान ने पूरे मध्य पूर्व में प्रॉक्सी नेवटर्क तैयार किया है. इसमें हिज्बुल्लाह (लेबनान), हमास (गाजा), हूती (यमन) और कई इराकी मिलिशिया शामिल हैं. इन प्रॉक्सी के जरिए ईरान इजरायल और अमेरिका दोनों को परेशान करता रहा है.
दक्षिण लेबनान में इजरायल की सफल री-डिप्लॉयमेंट ईरानी प्रॉक्सी की रीढ़ को तोड़ सकती है. अगर हिज्बुल्लाह कमजोर होता है तो ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव घटेगा. इससे न सिर्फ इजरायल को सुरक्षा मिलेगी बल्कि पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन भी बदल जाएगा.

इजरायल की रणनीतिक सोच
इजरायल हमेशा से प्री-एम्पटिव स्ट्राइक की नीति पर चलता आया है. वह खतरे को बढ़ने से पहले ही खत्म करने में विश्वास रखता है. ट्रंप के हमले का इंतजार करने के बजाय इजरायल अपने तरीके से ईरान को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है.
सीक्रेट प्लान का फायदा यह है कि अगर ट्रंप का हमला हुआ भी तो इजरायल पहले से तैयार स्थिति में होगा. अगर ट्रंप हमला नहीं करते हैं तो भी इजरायल का अपना प्लान तैयार रहेगा. यह ड्यूल स्ट्रैटेजी इजरायल को लचीलापन देती है. इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ ईरान और इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा.
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लेबनान की स्थिरता प्रभावित हो सकती है. सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश जो ईरान के खिलाफ हैं, इस स्थिति पर नजर रखे हुए हैं. अमेरिका के अंदर भी इस मुद्दे पर बहस चल रही है. कुछ लोग सीधा सैन्य हस्तक्षेप चाहते हैं तो कुछ लोग कूटनीतिक रास्ता अपनाने की बात कर रहे हैं.
इजरायल इन सबके बीच अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है. हालांकि यह प्लान उतना आसान नहीं है. हिज्बुल्लाह एक मजबूत संगठन है. दक्षिण लेबनान में कोई भी सैन्य गतिविधि भारी संघर्ष को जन्म दे सकती है. ईरान भी जवाबी कार्रवाई की धमकी दे सकता है.

अगर इजरायल का प्लान सामने आ गया तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ सकता है. आने वाले हफ्तों या महीनों में मध्य पूर्व में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. अगर इजरायल अपना सीक्रेट प्लान सफलतापूर्वक लागू कर लेता है तो ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा को बड़ा झटका लगेगा.
ट्रंप का ईरान पर दबाव और इजरायल का चुपके से अपना प्लान- दोनों मिलकर ईरानी प्रभाव को कम करने का काम कर सकते हैं. लेकिन इसकी कीमत क्या होगी, यह समय ही बताएगा. ट्रंप के ईरान प्रहार से दूरी बनाकर इजरायल कोई कमजोरी नहीं दिखा रहा, बल्कि अपनी रणनीतिक चतुराई दिखा रहा है.