महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई. उद्धव ठाकरे गुट ने विधानसभा स्पीकर और निर्वाचन आयोग (ECI) के फैसलों पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि दोनों स्तरों पर स्थापित नियमों और कानून की अनदेखी कर एकनाथ शिंदे गुट को फायदा पहुंचाया गया. उद्धव गुट की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने दलीलें रखीं.
सिब्बल ने कहा कि बागी विधायकों का मामला संविधान की दसवीं अनुसूची के उल्लंघन से जुड़ा है. उनके मुताबिक, बागी विधायकों ने किसी दूसरी पार्टी में विलय का दावा करने के बजाय खुद को ही 'असली शिवसेना' बताना शुरू कर दिया. इसके बाद चीफ व्हिप और विधानसभा में पार्टी का नेता तय करने जैसे अधिकारों पर भी उन्होंने कब्जा कर लिया.
सिब्बल ने कहा कि उद्धव गुट ने इसकी शिकायत निर्वाचन आयोग से की थी और स्पीकर से बागी विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की थी. उस समय सुनील प्रभु पार्टी के चीफ व्हिप थे, लेकिन स्पीकर ने उनकी मांग पर उचित कार्रवाई नहीं की.
'शिवसेना के 1999 के संविधान को देखना चाहिए था'
उद्धव गुट ने दलील दी कि शिवसेना का संचालन उसके 1999 के संविधान के मुताबिक होता है. सिब्बल ने कहा कि स्पीकर को निर्वाचन आयोग के पास मौजूद पार्टी के मूल संविधान को आधार बनाना चाहिए था और शिंदे गुट की ओर से पेश कथित संविधान का उससे मिलान करना चाहिए था.
सिब्बल ने कहा कि अगर पार्टी संविधान का कोई दूसरा संस्करण पेश किया गया था तो स्पीकर को मूल संविधान के आधार पर बागी गुट से सवाल पूछने चाहिए थे. उन्होंने आरोप लगाया कि स्पीकर और निर्वाचन आयोग को वास्तविक स्थिति की जानकारी थी, लेकिन इसके बावजूद महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की गई.
सुनवाई के दौरान पार्टी संविधान के एक विवादित पैराग्राफ का मुद्दा भी उठा. सिब्बल ने सवाल किया कि विवादित पैराग्राफ आया कहां से और मूल पैराग्राफ को कैसे हटाया गया. इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने हल्के अंदाज में टिप्पणी की कि 'पैराग्राफ भी गुटों में बंटे हुए हैं.'
'धनुष-बाण' शिंदे गुट को देने पर भी सवाल
उद्धव गुट ने निर्वाचन आयोग की ओर से शिवसेना का मूल चुनाव चिह्न 'धनुष-बाण' शिंदे गुट को दिए जाने पर भी आपत्ति जताई. सिब्बल ने इसे अनुचित बताते हुए कहा कि निर्वाचन आयोग ने जांच भी स्थापित नियमों के मुताबिक नहीं की.
सिब्बल ने दलील दी कि बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग जून में की गई थी, जबकि संबंधित संशोधन जुलाई में किए जाने की बात कही गई. उन्होंने आरोप लगाया कि स्पीकर ने तथ्यों को जानते हुए भी दूसरे गुट को मान्यता दी और दसवीं अनुसूची से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं की अनदेखी की.
सुनवाई में सादिक अली मामले और कांग्रेस (O) तथा कांग्रेस (J) के विभाजन से जुड़े पुराने मामलों का भी जिक्र हुआ. जस्टिस बागची ने पार्टी संगठन में समय पर चुनाव कराए जाने को लेकर सवाल किया. सिब्बल ने कहा कि सादिक अली मामले का फैसला मौजूदा शिवसेना विवाद पर उसी रूप में लागू नहीं होता क्योंकि दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग हैं.
शिवसेना विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को भी सुनवाई जारी रहेगी. अगले सप्ताह दूसरे पक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल दलीलें रखेंगे.