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एक महीने में अमित शाह से दूसरी मुलाकात... आखिर ईसाई समुदाय की FCRA बिल पर चिंताएं क्या हैं

भारत में विदेश से आने वाले फंड को रेगुलेट करने के लिए मोदी फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट में बदलाव कर नया संशोधन विधेयक लेकर आ रही है. FCRA के नए बिल को लेकर ईसाई समुदाय कई सवाल उठा रहे हैं. कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) की एक महीने में दूसरी बार केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिलेंगे और अपनी बात रखेंगे.

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कैथोलिक बिशपों की अमित शाह से मुलाकात
कैथोलिक बिशपों की अमित शाह से मुलाकात

विदेशी फंडिंग और एनजीओ की गतिविधियों पर कड़ा नियंत्रण रखने के लिए मोदी सरकार संसद के मॉनसून सत्र में फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) संशोधन बिल लाने की तैयारी में है. सरकार का उद्देश्य देश की सुरक्षा प्रभावित होने से रोकना और विदेशी धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता लाना है. FCRA विधेयक की सियासी चर्चा के बीच  
ईसाई समुदाय का एक प्रतिनिधि मंडल केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से गुरुवार शाम मुलाकात करेगा. 

भारत में ईसाई समुदाय के सबसे बड़े संगठन कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI)  की एक महीने में अमित शाह से दूसरी मुलाकात होने है. CBCI के अध्यक्ष कार्डिनल पूला एंथनी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने 10 जुलाई को अमित शाह से मुलाकात कर FCRA संशोधन विधेयक को लेकर अपनी चिंताए रखी थी. 

कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया के अगुवाई में ईसाई समुदाय के दस सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल गुरुवार को फिर से अमित शाह से मिलेंगे और FCRA विधेयक पर बात रखेंगे. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ईसाई समुदाय की FCRA बिल को लेकर क्या चिंताए हैं, जिसके लिए एक महीने में दूसरी बार मुलाकात कर रहे. 

FCRA संशोधन विधेयक मोदी सरकार क्यों ला रही
भारत में फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट 2010, यह अधिनियम देश में विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है. अभी एनजीओ, सोसायटी , कंपनी या अन्य संगठन जो विदेश से फंडिंग प्राप्त करना चाहते हैं उनके लिए FCRA रजिस्ट्रेशन करना अनिवार्य होता है. इसका हर 5 साल में रजिस्ट्रेशन रिन्यू करवाना जरूरी होता है.

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मोदी सरकार अब विदेश से आने फंडिंग को लेकर विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन (FCRA) विधेयक, 2026 लाने जा रही है. इसके जरिए विदेशों से आने वाले पैसे का इस्तेमाल भारत के हितों के विरुद्ध न किया जा सके. सरकार इसमें कई बदलाव और जरूरी प्रावधान जोड़े हैं. नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन को मिलने वाले विदेश फंड का इस्तेमाल कहां,कैसे किया जाता है, इसकी अकाउंटेबिलिटी क्या है, जैसी कई चीजें तय करनी है. 

सरकार नए संशोधन विधेयक के अनुसार डेजिग्नेटिड अथॉरिटी का गठन किया जाएगा. कोई संस्था विदेशी फंड प्राप्त करती है और उसका FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाता है, रिन्यू नहीं होता है,सरेंडर कर दिया जाता है या एक्सपायर हो जाता है तब ऐसे में विदेशी फंड और उस फंड से बनी सभी संपत्तियां डेजिग्नेटिड अथॉरिटी को ट्रांसफर कर दिया जाएगा.  सरकार ने रजिस्ट्रेशन रिन्यू नहीं करने वाली संस्थाओं की संपत्तियों को भी ट्रांसफर करने का प्रावधान जोड़ा है.

 डेजिग्नेटिड अथॉरिटी के पास यह अधिकार होगा कि वह इन जरूरत पड़ने पर संपत्तियों को बेच भी सकती है. बेचने के बाद जो पैसा आएगा वह कंसोलिडेटेड फंड ऑफ़ इंडिया में ट्रांसफर किया जाएगा. कोई एनजीओ बंद हो जाता है या उसकी गतिविधियां इनएक्टिव हो जाती है ऐसे मामलों में भी उस संस्था की ऐसी संपत्तियों जो विदेशी फंड से बनी है वह सरकार की डेजिग्नेटिड अथॉरिटी के पास ट्रांसफर कर दी जाएगी.

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ईसाई समाज आखिर चिंताएं क्या-क्या है?
कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया ने 10 जुलाई को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के मिले थे तो एक ज्ञापन सौंपा था. ईसाई समुदाय के प्रतिनिधि मंडल ने FCRA संशोधन विधेयक के संबंध में प्रतिनिधिमंडल ने कहा था कि विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधन गरीबों के हितों के खिलाफ हैं. FCRA संशोधन के प्रावधान समाज के बड़े वर्गों के कल्याण के लिए काम करने वाले संगठनों पर प्रतिकूल असर डालेंगे.

कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ने अनुरोध किया था कि नया विधेयक तैयार किया जाए और उसे केवल भविष्य के मामलों पर लागू किया जाए. संगठन ने कहा कि नए कानून के तहत निर्णय लेने के लिए नियुक्त अधिकारी न्यायिक अधिकारी होना चाहिए ताकि उसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके. संपत्तियों का निपटान, हस्तांतरण या अधिग्रहण तभी किया जाना चाहिए जब सभी अपीलों की प्रक्रिया पूरी हो जाए. छोटी और बड़ी चूकों में अंतर किया जाना चाहिए और मामूली चूकों पर कठोर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए.

ईसाई समुदाय ने मांग है कि विधेयक से 'प्रोसिलिटाइजेशन' (धर्मांतरण के लिए प्रेरित करना) शब्द हटाया जाए, क्योंकि इसका दुरुपयोग किया जा सकता है. संगठन ने कहा था कि इस तरह की सभी मानवीय और परोपकारी गतिविधियां केवल राष्ट्र निर्माण और जनकल्याण के लिए होती हैं. इसको धार्मिक धर्मांतरण के प्रयास के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए.

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ईसाई संगठन ने यह भी कहा था कि विधेयक के पूर्व प्रभाव से लागू होने वाले और खुले प्रावधान परोपकारी गतिविधियों के लिए मिलने वाली वैध विदेशी फंडिंग को हतोत्साहित कर सकते हैं. इससे भारत के विकास क्षेत्र पर असर पड़ेगा और इसका बोझ समाज के वंचित वर्गों पर भी पड़ेगा. साथ ही में विभिन्न राज्यों में 'धर्मांतरण विरोधी' कानूनों के तहत ईसाइयों पर हमलों और उनके खिलाफ दर्ज मामलों का मुद्दा भी उठाया था.

कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ने कहा था कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत अनुसूचित जाति समुदायों के जो सदस्य ईसाई धर्म अपना लेते हैं, वे अपनी अनुसूचित जाति की मान्यता खो देते हैं. इस प्रावधान को 2004 से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. संगठन ने कहा कि सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए कि इस मामले की जल्द सुनवाई हो और फैसला आए.

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