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मरने से पहले भेजा वॉट्सएप मैसेज अब माना गया 'Dying Declaration', हाई कोर्ट ने खारिज की 3 आरोपियों की जमानत

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने धार जिले के एक आत्महत्या मामले में बड़ा फैसला दिया है. अदालत ने 25 साल के युवक के मरने से ठीक पहले अपने पिता को भेजे गए वॉट्सएप मैसेज को 'मरते समय दिया गया बयान यानी डाइंग डिक्लेयरेशन' माना है. इस आधार पर हाई कोर्ट ने तीन आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी है. आइए देखते हैं इस कानूनी फैसले की पूरी रिपोर्ट...

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डिजिटल युग में अब मोबाइल के वॉट्सएप मैसेज भी अदालत में निर्णायक सबूत बन रहे हैं.(Photo: Representational)
डिजिटल युग में अब मोबाइल के वॉट्सएप मैसेज भी अदालत में निर्णायक सबूत बन रहे हैं.(Photo: Representational)

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने डिजिटल-इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में 25 साल के मृतक के मोबाइल से मिले वॉट्सएप मैसेज को 'मृत्यु-पूर्व बयान' यानी Dying Declaration माना है. इसी आधार पर हाई कोर्ट ने मामले के तीनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं. 

हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने 27 जुलाई को धार जिले के स्पेशल जज (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति - अत्याचार निवारण अधिनियम)  के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं और इसके खिलाफ उनकी अपील भी खारिज कर दी.

क्या है पूरा मामला? 

दरअसल, संतोष, उर्फ ​​लखन औसारी ने कृषि भूमि से जुड़े विवाद को लेकर करण जाट, धर्मेंद्र जाट और उमेश जाट से मिली प्रताड़ना, गाली-गलौज, अपमान और जान से मारने की धमकियों के कारण फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. जांच से पता चला कि 7 मई को अपनी मौत से पहले, औसारी ने अपने पिता को वॉट्सएप मैसेज भेजे थे.

WhatsApp मैसेज बने प्रमुख आधार

हाई कोर्ट ने कहा, "अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किया गया एक अहम सबूत मृतक के मोबाइल फोन से संबंधित पंचनामा है. रिकॉर्ड से पता चलता है कि अपनी मौत से कुछ समय पहले, मृतक ने अपने पिता के मोबाइल नंबर पर तीन वॉट्सएप मैसेज भेजे थे."

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सिंगल-जज बेंच ने कहा कि यह इलेक्ट्रॉनिक सबूत प्रथम दृष्टया महत्वपूर्ण मृत्यु-पूर्व बयान के रूप में काम करता है, जिसमें अपीलकर्ताओं का साफ तौर से नाम लिया गया है.

अदालत ने कहा, "इसके अलावा जांच के दौरान दर्ज मृतक के पिता, भूरलाल औसारी और भाई, भीमा औसारी के बयान अभियोजन पक्ष के दावे की पुष्टि करते हैं. दोनों गवाहों ने साफ रूप से कहा है कि अपीलकर्ताओं ने कृषि भूमि के पुराने विवाद को लेकर मृतक को लगातार धमकाया, गाली दी और अपमानित किया, और उसे लगातार जान से मारने की धमकियां दीं, जिसके कारण उसने अपनी जान दे दी."

आरोपियों के वकील की दलील खारिज

आरोपियों के वकील ने तर्क दिया कि तीनों का औसारी की आत्महत्या से कोई संबंध नहीं था और उन्हें पुरानी दुश्मनी के कारण मामले में फंसाया गया था. हालांकि, अभियोजन पक्ष ने जांच के दौरान मिले सबूतों और आरोपों की प्रकृति का हवाला देते हुए जमानत याचिकाओं का विरोध किया.

दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद, हाई कोर्ट ने कहा कि औसारी ने अपनी मौत से पहले भेजे गए वॉट्सएप मैसेज में आरोपियों का विशेष रूप से नाम लिया था. अदालत ने यह भी गौर किया कि उसके करीबी परिवार के सदस्यों के बयान लगातार प्रताड़ना की ओर इशारा करते हैं. 

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हाई कोर्ट ने कहा, "अपील करने वालों की ओर से सबूतों के आधार पर पेश किए गए बचाव और तर्क इस चरण पर जमानत देने के लिए पर्याप्त भरोसा नहीं जगाते हैं."

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