ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी बिहार जैसा सियासी करिश्मा उत्तर प्रदेश में दोहराना चाहते हैं. इसके लिए वे पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक सियासी जमीन तलाशने में जुट गए हैं. सपा और कांग्रेस से गठबंधन के दरवाजे बंद होने के बाद ओवैसी ने अकेले दम पर प्रदेश की करीब 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति बनाई है, जिसके लिए माहौल तैयार करने का काम भी शुरू कर दिया गया है.
इसी कड़ी में असदुद्दीन ओवैसी पूर्वांचल में अपनी सियासी जमीन मजबूत करने के लिए रविवार को आजमगढ़ पहुंचे. आजमगढ़ के सिरसल क्लब ग्राउंड में आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने मुस्लिम समाज का आह्वान किया कि वे वोट बैंक की पारंपरिक राजनीति से बाहर निकलकर खुद का सियासी नेतृत्व खड़ा करें.
ओवैसी ने आजमगढ़ से 'मिशन-2027' का आगाज करके पूर्वांचल में अपने सियासी पैर पसारने की तैयारी कर ली है. पूर्वांचल के आजमगढ़, जौनपुर, गाजीपुर, मऊ और बलिया जिलों की तीन दर्जन (36) विधानसभा सीटों पर ओवैसी की नजर टिकी हुई है. इन मुस्लिम बहुल सीटों पर उम्मीदवार उतारने का उनका प्लान सपा-कांग्रेस के सियासी गणित को बिगाड़ सकता है.
पूर्वांचल की इन सीटों पर ओवैसी का फोकस
आजमगढ़ रैली के दौरान असदुद्दीन ओवैसी ने सीधे तौर पर अखिलेश यादव और बीजेपी दोनों पर निशाना साधा. आजमगढ़, जौनपुर, मऊ, गाजीपुर और बलिया जिलों की कई सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की आबादी 15 से 30 प्रतिशत तक है.
मुबारकपुर, गोपालपुर, निजामाबाद और आजमगढ़ सदर जैसी सीटों पर यह वोटबैंक पूरी तरह निर्णायक साबित होता है. इसी तरह जौनपुर की सदर और शाहगंज सीट तथा मऊ जिले की सदर व घोसी सीट पर भी मुस्लिम मतदाता काफी अहम माने जाते हैं. AIMIM के यूपी नेताओं के मुताबिक, ओवैसी पूर्वांचल की उन तीन दर्जन सीटों पर मुख्य फोकस करेंगे जहाँ जीत-हार की चाबी मुस्लिम मतदाताओं के हाथ में है.
2022 के आंकड़ों में दिखा था AIMIM का प्रभाव
2022 के विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने इन तीन दर्जन सीटों में से सिर्फ 12 पर उम्मीदवार उतारे थे और बिना किसी बड़े संगठन के भी 3 फीसदी वोट हासिल किए थे. आजमगढ़ की मुबारकपुर सीट पर AIMIM प्रत्याशी शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को 36,460 वोट (16% से अधिक) मिले थे. हालांकि वे चुनाव नहीं जीत सके, लेकिन उन्होंने खुद को एक बड़ा 'वोट कटवा' फैक्टर साबित कर दिया था.
2022 में इन तीन दर्जन सीटों में से 29 पर सपा-सुभासपा गठबंधन ने कब्जा जमाया था, लेकिन 12 सीटों पर हार-जीत का अंतर 10 हजार वोटों से भी कम का था. जौनपुर की शाहगंज सीट पर सपा प्रत्याशी शैलेंद्र यादव 'ललई' महज 719 वोटों से चुनाव हार गए थे, जहाँ AIMIM उम्मीदवार को 8,128 वोट मिले थे.
जौनपुर सदर सीट पर बीजेपी ने सपा को 8,052 वोटों से हराया था, जबकि यहाँ ओवैसी की पार्टी को 6,228 वोट मिले थे. वहीं गाजीपुर सदर सीट पर सपा प्रत्याशी किसी तरह 1,692 वोटों के मामूली अंतर से जीत पाए थे, जहाँ AIMIM को 1,260 वोट मिले थे. इस बार AIMIM नई रणनीति के साथ उतर रही है.
पूर्वांचल में 'पतंग' उड़ाने का नया प्लान
2027 के लिए AIMIM की योजना ऐसे स्थानीय प्रभावशाली और मुस्लिम नेताओं को साधने की है, जिनके टिकट सपा या अन्य विपक्षी दलों द्वारा काटे जाने की संभावना है. पार्टी इन असंतुष्ट नेताओं को अपना सिंबल देकर पूर्वांचल के मैदान में उतारने की तैयारी में है. पार्टी ऐसे उम्मीदवारों की सूची तैयार कर रही है और कुछ नेताओं से संपर्क भी साधा जा चुका है.
AIMIM नेता ओसामा नदवी का कहना है कि पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक का मुस्लिम समुदाय अब सपा और कांग्रेस की पारंपरिक राजनीति से ऊब चुका है और अपना खुद का नेतृत्व खड़ा करना चाहता है. उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव बीजेपी को हराने के बजाय उसकी सरकार बनवाने में मदद कर रहे हैं. नदवी के मुताबिक, सपा के कई मुस्लिम नेता AIMIM के संपर्क में हैं और चुनाव से ठीक पहले बड़ी संख्या में पार्टी में शामिल हो सकते हैं.
सपा के 'PDA' नरेटिव को झटका देंगे ओवैसी
पूर्वांचल में सपा की सबसे बड़ी ताकत 'MY' (मुस्लिम-यादव) समीकरण माना जाता है. 2022 में सपा के साथ ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा थी, जो अब एनडीए के साथ है. ऐसे में अगर ओवैसी पूर्वांचल की सभी तीन दर्जन सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारते हैं और मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा भी AIMIM के खाते में खिसकता है, तो सपा के 'पीडीए' (PDA) नरेटिव को बड़ा झटका लग सकता है.
आजमगढ़ हमेशा से सपा का मजबूत गढ़ रहा है. ओवैसी का यह आरोप कि उन्हें गठबंधन में जगह नहीं दी गई, मुस्लिम मतदाताओं के बीच यह संदेश देने की कोशिश है कि पारंपरिक दल उन्हें केवल 'वोट बैंक' समझते हैं, हिस्सेदार नहीं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पूर्वांचल में यदि मुस्लिम वोटों में विभाजन होता है, तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलेगा. यही वजह है कि अखिलेश यादव ने अपने प्रवक्ताओं को ओवैसी के खिलाफ आक्रामक बयानबाज़ी से बचने की हिदायत दी है, ताकि वोटों का ध्रुवीकरण AIMIM के पक्ष में न होने पाए. अब देखना यह होगा कि 2027 में ओवैसी अपने इस 'मिशन पूर्वांचल' में कितने कामयाब हो पाते हैं.