नेपाल और तिब्बत की सीमा पर हालिया विनाशकारी सैलाब ने एक बार फिर हिमालय के नाजुक ईकोसिस्टम को चर्चा में ला दिया है. लांगटांग लिरुंग पर्वत की ढलानों से शुरू हुई घटना में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरा, जिससे अस्थाई रुकावट बनी और फिर त्रिशुली नदी में भीषण बाढ़ आ गई.
सवाल यह उठता है कि इस क्षेत्र में ग्लेशियल झीलें कितनी हैं. क्या वे खतरा पैदा कर सकती हैं. भविष्य में ऐसे हादसे हो सकते हैं. वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार जवाब चिंताजनक है. लांगटांग घाटी और त्रिशुली नदी बेसिन नेपाल-चीन सीमा का संवेदनशील हिस्सा है. यहां ऊंचाई पर ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं.
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पिघलते ग्लेशियर के आगे या ऊपर पानी जमा होकर ग्लेशियल झीलें बनाता है. इनमें सुप्राग्लेशियल (ग्लेशियर पर बनी छोटी झीलें) और प्रोग्लेशियल (ग्लेशियर के आगे बनी बड़ी झीलें) दोनों शामिल हैं. हालिया घटना मुख्य रूप से हिमस्खलन और मलबा प्रवाह से जुड़ी थी, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे इलाकों में ग्लेशियल झीलों का फटना या रुके हुए पानी का अचानक निकलना आम होता जा रहा है. तिब्बत की ओर से आने वाली नदियां और नेपाल की खड़ी घाटियां इस खतरे को और बढ़ा देती हैं.
वैज्ञानिक रिपोर्ट्स के आंकड़े
अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की रिपोर्ट्स के अनुसार कोशी, गंडकी और कर्णाली बेसिन में लगभग 3624 ग्लेशियल झीलें दर्ज की गई हैं. इनमें से करीब 2070 नेपाल में, 1509 चीन के तिब्बत में और 45 भारत में हैं.

इनमें से 14 झीलें इतनी बड़ी हैं कि उनके फटने से बाढ़ आ सकती है. सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा यह है कि 47 झीलों को पोटेंशियली डेंजरस ग्लेशियल लेक्स यानी संभावित खतरनाक ग्लेशियल झीलें माना गया है. इनमें 21 नेपाल में, 25 तिब्बत में (ट्रांसबाउंड्री) और एक भारत में स्थित हैं. इनमें से अधिकांश कोशी बेसिन में हैं.
ग्यिरोंग-त्रिशुली और पोइक्कू-भोटेकोसी जैसे ट्रांसबाउंड्री बेसिनों पर हुए अलग अध्ययनों में दर्जनों झीलों को उच्च जोखिम वाला बताया गया है. कुछ रिपोर्ट्स में नेपाल में कुल ग्लेशियल झीलों की संख्या दो हजार से अधिक बताई गई है. यह संख्या लगातार बढ़ रही है. 2000 से 2020 के बीच कई क्षेत्रों में झीलों की संख्या और क्षेत्रफल दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है. लांगटांग क्षेत्र में भी झीलों की संख्या पिछले दो दशकों में काफी बढ़ी है.
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भविष्य में ऐसे हादसों की संभावना
वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि भविष्य में ऐसे हादसे बढ़ सकते हैं. ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं, नई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलें फैल रही हैं. मोरेन (ग्लेशियर द्वारा छोड़ी गई मिट्टी-पत्थर की दीवार) कमजोर हो रही हैं क्योंकि परमाफ्रॉस्ट पिघल रहा है.

मॉनसून की भारी बारिश, भूकंप और हिमस्खलन इन झीलों को ट्रिगर कर सकते हैं. कुछ अध्ययनों का अनुमान है कि उच्च पर्वतीय एशिया में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड का जोखिम सदी के अंत तक लगभग तीन गुना हो सकता है. चीन-नेपाल सीमा क्षेत्र विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि कई झीलें सीमा के उत्तर में हैं. उनकी बाढ़ मिनटों में नेपाल पहुंच जाती है. पिछले वर्षों में भोटेकोसी, मेलामची, सिक्किम और अन्य जगहों पर हुई घटनाएं इसी खतरे की पुष्टि करती हैं.
वैज्ञानिक रिपोर्ट्स लगातार चेतावनी दे रही हैं कि निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणाली और सीमा पार सहयोग जरूरी है. कुछ खतरनाक झीलों का जलस्तर कम करने के प्रयास पहले भी हुए हैं. लेकिन तेजी से बदलते जलवायु परिदृश्य में सिर्फ एक-दो झीलों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं.
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नेपाल जैसे पहाड़ी देश को अंतरराष्ट्रीय सहयोग, स्थानीय तैयारी और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा. हालिया सैलाब ने साबित कर दिया कि खतरा सिर्फ बड़ी झीलों तक सीमित नहीं, बल्कि ग्लेशियर अस्थिरता, मोरेन ढहने और अस्थायी रुकावटों से भी पैदा हो सकता है.
कुल मिलाकर, नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र ग्लेशियल झीलों से भरा है और वैज्ञानिक आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में और विनाशकारी घटनाएं संभव हैं. समय रहते तैयारी ही जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है.