पृथ्वी के वायुमंडल के नीचे और उसके ऊपर होने वाली सभी प्राकृतिक और मानवनिर्मित घटनाओं की वैज्ञानिक खबरें. अंतरिक्ष, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदा, स्वास्थ्य संबंधी रिसर्च, नदी, ग्लेशियर, पहाड़, पर्यावरण, वन्य जीव, जैव विविधता, मौसम, ऊर्जा, जेनेटिक्स. कुछ भी हो. यहां होने वाले बदलाव, उनसे होने वाले असर. इंसानों की वजह से बदल रहा मौसम या बदला लेती धरती. या बेवजह की बाढ़ या ग्लेशियर के टूटने से आई आपदा. हर खबर पर पैनी नजर. आपको मिलेगी यहां साइंस की स्टोरी, एनालिसिस, फोटो गैलरी, विजुअल स्टोरी और वीडियो.
मिडिल ईस्ट संघर्ष के बीच तेल के कुओं और रिफाइनरी में लगी आग ने हालात गंभीर कर दिए हैं. इन आग को बुझाने के लिए पानी, फोम, विस्फोट और रिलीफ वेल जैसे तरीके अपनाए जाते हैं. सऊदी, कतर और ईरान के कई बड़े प्लांट प्रभावित हुए हैं, जिससे तेल सप्लाई और पर्यावरण पर असर पड़ा.
ब्रह्मांड में 12 अरब प्रकाश-वर्ष दूर एक विशाल पानी का बादल मिला है. इसमें पृथ्वी के सभी महासागरों से 140 ट्रिलियन गुना ज्यादा पानी है. ये बादल ब्रह्मांड के शुरुआती समय का है, जहां एक बड़ा ब्लैक होल है. वैज्ञानिक हैरान हैं क्योंकि इतने पुराने समय में इतना पानी होने से जीवन की संभावना ब्रह्मांड में बहुत पहले से हो सकती है.
मिडिल ईस्ट वॉर में तेल के कुएं और प्लांट्स की आग बुझाने के 6 मुख्य तरीके हैं – पानी स्प्रे से ठंडा करना. डायनामाइट विस्फोट. फोम या ड्राई केमिकल. गैस टरबाइन मिस्ट. रिलीफ वेल ड्रिलिंग. मैकेनिकल कैपिंग. सबसे ज्यादा तबाही इन 7 प्लांट्स ने झेली है, जहां आग लगी हुई है- रास तनूरा (सऊदी), रास लाफान (कतर), मुस्साफा (यूएई), साउथ पार्स (ईरान), खार्ग आइलैंड, तेहरान रिफाइनरी और अबादान.
दूर अंतरिक्ष में 11,000 प्रकाश-वर्ष दूर दो ग्रहों की भयंकर टक्कर हुई, जिसे वैज्ञानिकों ने कैद कर लिया. Gaia20ekh तारे की चमक में अचानक गिरावट से पता चला कि टक्कर से निकला 15 करोड़ किमी चौड़ा धूल-मलबे का गुबार तारे की रोशनी रोक रहा था. यह घटना पृथ्वी-चंद्रमा निर्माण जैसी है, ब्रह्मांड में ऐसी टक्करें आम लेकिन दुर्लभ दिखती हैं.
रूसी टैंकर आर्कटिक मेटागाज़ इटली-माल्टा के बीच बिना चालक के कई दिनों से बह रहा है. 3 मार्च को ड्रोन हमले में क्षतिग्रस्त हुआ. इसमें 900 टन डीजल और 60,000 टन एलएनजी है, जो पर्यावरण के लिए टाइम बम है. हेलिकॉप्टर से देखा गया कि जहाज झुका हुआ है. इटली चिंतित है कि बदलती हवा से यह उसके तट की ओर आ सकता है.
रूस का तेल टैंकर आर्कटिक मेटागाज़ इटली-माल्टा के बीच बिना क्रू के कई दिनों से बह रहा है. 3 मार्च को ड्रोन हमले में 30 सदस्यीय चालक दल ने जहाज छोड़ दिया. इसमें 900 मीट्रिक टन डीजल और 60,000 मीट्रिक टन एलएनजी है, जो पर्यावरण के लिए टाइम बम है. इटली चिंतित है कि बदलती हवाओं से यह उसके तट की ओर आ सकता है.
कतर एनर्जी ने ईरान के ड्रोन-मिसाइल हमलों के बाद रास लैफन फैसिलिटी बंद कर दी है. इससे दुनिया भर में हीलियम सप्लाई का 33% हिस्सा रुक गया है. इससे MRI मशीनें, सेमीकंडक्टर चिप प्रोडक्शन और रॉकेट फ्यूल पर असर पड़ रहा है. अगर यह बंदी 60-90 दिन चली तो सेमीकंडक्टर और मेडिकल क्षेत्र में बड़ा संकट आ सकता है.
नासा का रोवर क्यूरियोसिटी ने मंगल के गेडिज वैली चैनल में एक चट्टान पर चढ़ा और उसे कुचल दिया. अंदर से पीले क्रिस्टल निकले, जो शुद्ध सल्फर के थे. मंगल पर सल्फेट तो मिले थे, लेकिन शुद्ध सल्फर यह पहली बार है. आसपास कई ऐसी चट्टानें हैं. वैज्ञानिक इसे 'रेगिस्तान में ओएसिस' जैसा बताते हैं. अब इसका रहस्य समझने में जुटे हैं.
भारत का स्वदेशी GPS 'नाविक' गंभीर संकट में है. 11 सैटेलाइट में से सिर्फ 3 ही काम कर रहे हैं. इनमें से एक किसी भी समय फेल हो सकता है क्योंकि उसकी उम्र 10 साल से ज्यादा हो चुकी है. नेविगेशन के लिए कम से कम 4 सैटेलाइट जरूरी हैं. इससे सेना की मिसाइल मार्गदर्शन, जहाजों-विमानों की लोकेशन और युद्ध क्षमता पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है.
जब से स्पेस टूरिज्म यानी अंतरिक्ष की सैर की सुविधा शुरू हुई है इंसान धरती के बाहर की दुनिया को खंगालने में ज्यादा ही दिलचस्पी लेने लगा है. वह दिन दूर नहीं जब इंसान अंतरिक्ष में न सिर्फ सैर कर पाएगा, बल्कि अपनी छुट्टियां भी बिता सकेगा. एक तरफ मंगल और चांद पर इंसानी बस्ती बसाने की तैयारी है, तो दूसरी ओर 'स्पेस होटल' का सपना हकीकत बनने के करीब है आखिर कैसा होगा धरती के बाहर बन रहा ये लग्जरी होटल?
अगर आप प्रकृति को ध्यान से देखें तो एक दिलचस्प फर्क नजर आता है. पक्षियों और मछलियों में आपको नीले, लाल, हरे और पीले जैसे चमकीले रंग आसानी से दिख जाते हैं. मोर के पंख, तोते का रंग या समुद्री मछलियों की चमकदार त्वचा इसका उदाहरण हैं.
मेलाटी विजसेन 12 साल की उम्र में 'बाय-बाय प्लास्टिक' कैंपेन चलाकर बाली में प्लास्टिक पर बैन लगवाया. आज 25 साल की उम्र में 5 किताबें लिख चुकी हैं. यूथोपिया प्लेटफॉर्म से युवाओं को पर्यावरण शिक्षा दे रही हैं. वो कहती हैं कि बदलाव के लिए सरकार, संस्थाएं और युवा साथ आएं, सकारात्मक रास्ते चुनें और टाइमलाइन बनाकर काम करें.
एलपीजी घरेलू कुकिंग के लिए सिलेंडर में तरल रूप में आती है. सीएनजी वाहनों में उच्च दबाव से गैस के रूप में इस्तेमाल होती है. पीएनजी पाइपलाइन से घरों में सीधे पहुंचती है. एलएनजी को -162°C पर तरल बनाकर बड़े जहाजों से उद्योगों और बिजली प्लांट तक भेजी जाती है. मुख्य फर्क- संरचना, स्टोरेज और इस्तेमाल में है.
क्या आपने कभी सोचा है कि हिमालय की ऊंची चोटियों पर चमकती सफेद बर्फ आखिर पिघलती क्यों नहीं? सूरज के ज्यादा करीब होने के बावजूद ये बर्फ सालभर जमी रहती है. इसके पीछे आखिर कौन-सा विज्ञान काम करता है?
कच्चा तेल धरती की गहराइयों से तेल कुओं और ऑफशोर प्लेटफॉर्म से निकाला जाता है. रिफाइनरी में फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन से पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और अन्य ईंधन बनते हैं. पाइपलाइन, ट्रक, ट्रेन और सुपरटैंकरों से स्टोरेज व डिस्ट्रीब्यूशन होता है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरकर ईरान जैसे देशों से दुनिया भर में पहुंचता है, जिससे वैश्विक तनाव सीधे पेट्रोल पंप और रसोई तक असर डालता है.
नई स्टडी के मुताबिक Israel-Gaza war से अब तक लगभग 3.3 करोड़ टन CO₂e ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन हुआ है. वैज्ञानिकों का कहना है कि युद्ध केवल मानवीय और आर्थिक नुकसान ही नहीं पहुंचाते, बल्कि climate change को भी तेजी से बढ़ाते हैं. सैन्य गतिविधियां, बमबारी और reconstruction से भारी carbon emission हो रहा है.
जंग जलवायु परिवर्तन को तेज कर रहे हैं. वन अर्थ जर्नल की स्टडी के अनुसार, इजरायल-गाजा संघर्ष से 3.3 करोड़ मीट्रिक टन CO₂e उत्सर्जन हुआ, जो जॉर्डन के पूरे साल के उत्सर्जन या 76 लाख कारों के सालाना धुएं या 3.31 करोड़ एकड़ जंगलों द्वारा एक साल में सोखे जाने वाले कार्बन के बराबर है. सैन्य गतिविधियां, बमबारी और पुनर्निर्माण इसका मुख्य कारण हैं.
पृथ्वी की निचली कक्षा यानी लो अर्थ ऑर्बिट अब धीरे-धीरे सैटेलाइट मलबे के खतरनाक जाल में फंसती जा रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समय रहते इसपर नियंत्रण नहीं किया गया, तो भविष्य में सैटेलाइट्स टकराकर कचरा बढ़ाएंगे. धरती के लिए बड़ी मुसीबत होगी. सूरज की रोशनी भी प्रभावित होगी. यानी पृथ्वी पर तबाही आएगी...
मार्च में भारत का मौसम चौंकाने वाला बन गया है. मैदानी इलाकों में तापमान 40°C के पार पहुंच रहा है, जबकि जम्मू-कश्मीर और हिमाचल में बर्फबारी व ओलावृष्टि हो रही है. मौसम वैज्ञानिक इसके पीछे Western Disturbance और climate change को बड़ी वजह मान रहे हैं.
भारत का मौसम तेजी से बदल रहा है. मैदानी क्षेत्रों में पारा 40 डिग्री पार कर गया है, जबकि हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में बर्फबारी व ओले गिर रहे हैं. मुख्य वजह पश्चिमी विक्षोभ है. क्लाइमेट चेंज के कारण मौसम अनियमित हो गया है. IMD ने अगले दिनों में भी गर्मी और बारिश का अलर्ट जारी किया है.
समुद्र के जहाज इतने बड़े होते हैं कि इनमें हजारों टन सामान और हजारों लोग एक साथ सफर करते हैं. ऐसे में इनको चलाने के लिए भी अलग तरह का ईंधन इस्तेमाल किया जाता है. समुद्र में चलने वाले बड़े जहाजों में आमतौर पर हेवी फ्यूल ऑयल या बंकर फ्यूल इस्तेमाल किया जाता है.