ब्रिटेन में इस साल रिकॉर्ड गर्मी और सूखे ने अनाज की खेती को बड़ा झटका दिया है. सबसे ज्यादा असर जौ, गेहूं और ओट्स जैसी फसलों पर पड़ा है. शुरुआती अनुमान बताते हैं कि 2026 की फसल 1984 के बाद सबसे खराब हो सकती है. इसका असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि बियर और व्हिस्की बनाने वाले उद्योग पर भी पड़ सकता है, क्योंकि जौ इन दोनों के लिए सबसे अहम कच्चा माल है.
यह जानकारी एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट (ECIU) के विश्लेषण और एग्रीकल्चर एंड हॉर्टिकल्चर डेवलपमेंट बोर्ड (AHDB) के शुरुआती फसल आंकड़ों पर आधारित है. रिपोर्ट के मुताबिक, खराब मौसम की वजह से ब्रिटेन की अनाज और ऑयलसीड्स फसल में करीब 25 लाख मीट्रिक टन तक की कमी आ सकती है. इससे किसानों को लगभग 390 मिलियन पाउंड यानी करीब 524 मिलियन डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है.
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ब्रिटेन के मौसम विभाग (Met Office) के अनुसार, इंग्लैंड में जून 2026 अब तक का सबसे गर्म जून रहा. वहीं पूरे ब्रिटेन के लिए यह दूसरा सबसे गर्म जून दर्ज किया गया. इसके बाद इंग्लैंड और वेल्स में जुलाई रिकॉर्ड स्तर का सबसे सूखा जुलाई रहा. लगातार गर्मी और कम बारिश की वजह से कई इलाकों में फसल ठीक से विकसित नहीं हो सकी.
जौ की फसल क्यों है इतनी अहम?
ब्रिटेन में उगने वाला जौ सिर्फ खाने और पशुओं के चारे के लिए ही नहीं, बल्कि बियर और व्हिस्की बनाने में भी इस्तेमाल होता है. जौ से माल्ट तैयार किया जाता है, जो इन दोनों उद्योगों का जरूरी कच्चा माल है. अगर जौ की पैदावार कम रहती है, तो कंपनियों को कच्चा माल महंगा मिल सकता है. इससे उत्पादन लागत बढ़ सकती है और आगे चलकर कीमतों पर भी असर पड़ सकता है. हालांकि अभी बियर या व्हिस्की की सप्लाई में कमी की कोई आधिकारिक चेतावनी नहीं दी गई है.
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फसल के आंकड़े क्या कहते हैं?
AHDB के शुरुआती अनुमान के मुताबिक, इस साल गेहूं की औसत पैदावार 6.8 टन प्रति हेक्टेयर रहने का अनुमान है, जो पिछले 10 साल के औसत से कम है. रिपोर्ट के अनुसार, अभी तक करीब 54 फीसदी गेहूं की कटाई पूरी हो चुकी है. अगर यही स्थिति बनी रही, तो इस साल ब्रिटेन की कुल अनाज और ऑयलसीड्स फसल करीब 19.5 मिलियन टन रह सकती है. यह 1984 से रखे जा रहे रिकॉर्ड में सबसे खराब फसल हो सकती है.
ब्रिटेन के किसान संगठनों ने भी सूखे को लेकर चिंता जताई है. उनका कहना है कि अगर ऐसे हालात बने रहे तो खेती की लागत बढ़ेगी और कुछ खाद्य उत्पादों की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि लगातार बढ़ती गर्मी और सूखे जैसी घटनाएं क्लाइमेट चेंज का असर दिखाती हैं. ऐसे में खेती को बचाने के लिए पानी का बेहतर प्रबंधन और मौसम के मुताबिक नई कृषि योजनाओं की जरूरत पहले से ज्यादा बढ़ गई है.