तापमान
तापमान (Temperature) एक भौतिक फेनोमेनन है जो गर्म और ठंडे को व्यक्त करता है. यह सभी पदार्थों में मौजूद तापीय ऊर्जा की अभिव्यक्ति है, जो गर्मी की घटना का स्रोत है. ऊर्जा का प्रवाह, जब एक शरीर दूसरे के संपर्क में होता है जो ठंडा या गर्म हो सकता है.
दिल्ली के सफदरजंग मौसम केंद्र में 30 अक्टूबर को अधिकतम तापमान 20.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया. अक्टूबर में 1951 के बाद यह सबसे कम अधिकतम तापमान है. इससे पहले 1975 में पारा 21.5 डिग्री तक गिरा था. आमतौर पर बादल, बारिश और हवा की दिशा में बदलाव से दिन के तापमान पर असर पड़ता है.
अक्टूबर में ही मौसम ने दिसंबर वाली ठंड का एहसास करा दिया है. दिल्ली में चार साल का सबसे ठंडा दिन दर्ज हुआ, तो पहाड़ों पर बर्फबारी और देश के कई राज्यों में बारिश ने मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल दिया है.
दिल्ली-एनसीआर में बारिश और तेज ठंडी हवाओं ने मौसम का मिजाज बदल दिया है. पश्चिमी विक्षोभ और चक्रवाती तूफान अर्नब के असर से गुरुवार से रुक-रुककर बारिश हो रही है. इसके चलते राजधानी का अधिकतम तापमान सामान्य से 5.6 डिग्री गिरकर 25.4 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया. मौसम विभाग ने येलो अलर्ट जारी किया था. बारिश का असर करवाचौथ पर भी दिखा, जब कई महिलाओं को चांद देखने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा.
अक्टूबर के आखिरी दिनों में पहाड़ों का मौसम बदल सकता है. उत्तराखंड में भारी बारिश का अलर्ट है, जबकि हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में भी बारिश के आसार हैं. तापमान गिरने से ठंड बढ़ सकती है, वहीं ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी पर नजर रहेगी.
दिल्ली में अक्टूबर के आखिरी दिनों में सुबह की ठंड बढ़ने लगी है. मंगलवार को न्यूनतम तापमान 15.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ, जो तीन साल का सबसे कम स्तर है. हालांकि, हवा की क्वालिटी अब भी मध्यम श्रेणी में बनी हुई है.
धरती का बढ़ता तापमान, गर्म होते महासागर और बदलता मौसम सिर्फ प्राकृतिक बदलाव नहीं हैं. नई स्टडी में वैज्ञानिकों ने बताया है कि इन बदलावों के पीछे इंसानी गतिविधियों के सबूत पहले से ज्यादा मजबूत हो चुके हैं.
यूरोप में बढ़ती भीषण गर्मी अब जानलेवा साबित हो रही है. 2026 की गर्मियों में 50 हजार से अधिक लोगों की मौत का अनुमान है, जिनमें करीब 32 हजार मौतें जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, जीवाश्म ईंधन का बढ़ता इस्तेमाल तापमान को खतरनाक बना रहा है. बुजुर्गों के साथ युवाओं की जान पर भी गर्मी का खतरा बढ़ रहा है.
बर्लिन में पीयूष गोयल ने यूरोप की ‘इक्वल ब्लेम’ यानी बराबर दोष वाली क्लाइमेट थ्योरी को खारिज कर दिया. भारत दुनिया की 17% आबादी रखने के बावजूद 3% से कम उत्सर्जन करता है, जबकि यूरोप 3-4% आबादी से 18% उत्सर्जन.
तुर्की की मशहूर सॉल्ट लेक में पानी की कमी ने चिंता बढ़ा दी है. कम बारिश और भूजल के ज्यादा इस्तेमाल से झील लगभग सूख गई. अब इसका असर फ्लेमिंगो के रहने की जगह, नमक के कारोबार और पर्यटन पर पड़ सकता है.
पेट्रोल-डीजल के विकल्प की तलाश में वैज्ञानिकों ने बांस से तेल बनाने का तरीका खोजा है. लैब में सिर्फ 10 मिनट में तेल जैसा पदार्थ तैयार हुआ. दावा है कि बड़े स्तर पर उत्पादन होने पर इसकी लागत भी कम हो सकती है.
कश्मीर में तेजी से सिकुड़ते ग्लेशियर और बदलती बर्फबारी का असर अब श्रीनगर की पानी सप्लाई पर दिख रहा है. दूध गंगा में घटता पानी 2 लाख से ज्यादा लोगों की परेशानी बढ़ा सकता है.
धरती का तापमान बढ़ने के साथ अब कुदरत के जरूरी सिस्टम पर भी संकट गहराने लगा है. अमेजन के जंगलों से अटलांटिक महासागर तक बढ़ते खतरे के बीच वैज्ञानिक ने चेताया है कि ग्लोबल वार्मिंग को रोकना अब बेहद जरूरी है.
दुनिया में गर्मी का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. 60 साल पहले साल में औसतन 5 हीट स्टॉर्म आती थीं, अब यह आंकड़ा 102 है. सबसे बड़ी हीट स्टॉर्म 367 दिन तक चली और धरती के 85% हिस्से तक पहुंची.
अंतरिक्ष में वैज्ञानिकों को पहली बार हरे रंग का तारा मिला है. यह तारा कभी अपने आसपास मौजूद ग्रहों के टूटे हिस्सों को निगल चुका है. इसके अंदर मौजूद सोडियम और हीलियम की खास स्थिति ने इसका रंग बदल दिया.
धरती पर खतरा सिर्फ बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं है. हवा में गैसों की बढ़ती मात्रा, पिघलते ग्लेशियर और बढ़ता समुद्र का जलस्तर हालात की गंभीरता दिखाते हैं. नई रिपोर्ट में 7 क्लाइमेट संकेत रिकॉर्ड स्तर पर मिले हैं.
1870 के दशक में सूखे और फसलें बर्बाद होने से दुनिया के कई हिस्सों में ऐसा अकाल पड़ा कि लाखों लोगों की जान चली गई. इस तबाही में अल-नीनो की भी बड़ी भूमिका थी. क्या आज दुनिया ऐसे संकट से बच सकती है?
स्लोवेनिया में कभी दो ग्लेशियर थे, लेकिन अब एक पूरी तरह गायब हो चुका है. आखिरी ग्लेशियर को बचाने के लिए बर्फ पर कंकड़ तक बिछाया गया, फिर भी पिघलना नहीं रुका. इसका असर नदियों और पीने के पानी पर भी पड़ सकता है.
अल-नीनो के असर से बढ़ती गर्मी और सूखे ने इंडोनेशिया में जंगलों की आग का खतरा बढ़ा दिया है. आग से उठता जहरीला धुआं अब मलेशिया और सिंगापुर तक पहुंच रहा है, जिससे हवा और लोगों की सेहत पर संकट गहरा रहा है.
CBRI रुड़की के वैज्ञानिकों ने पहली बार ग्लेशियल झील पर स्वदेशी GLOF अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया. आठ करोड़ की अनुमानित लागत वाले सिस्टम को सिर्फ 61 लाख में तैयार किया है. दो घंटे पहले चेतावनी मिलेगी.
नेपाल में तबाही की वजह सिर्फ भारी बारिश नहीं है. तेजी से पिघलते ग्लेशियर, खतरनाक झीलें, खिसकते पहाड़ और उफनती नदियां मिलकर खतरा बढ़ा रहे हैं. आखिर कैसे पहाड़ों पर जमा बर्फ नीचे रहने वालों के लिए मुसीबत बन रही है?
दिल्ली-NCR समेत उत्तर भारत में अगले कुछ दिनों तक अलग-अलग जगहों पर भारी बारिश और तूफान की संभावना है. दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की वापसी जारी है. दिल्ली में आंशिक बादल, हल्की बारिश और तापमान सामान्य के आसपास रहने का अनुमान है.