मेरठ के चर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में सौरभ राजपूत की हत्या के दोषी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को जिला एवं सत्र न्यायालय ने 14 अक्टूबर को फांसी की सजा सुनाई. करीब 19 महीने पहले हुई इस जघन्य हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था. अदालत का फैसला उस मां के लिए कुछ राहत लेकर आया होगा, जिसने अपना बेटा खो दिया. सौरभ की मां रेनू देवी ने भी दोषियों के लिए कड़ी सजा की मांग की थी. 126 सुनवाइयों और 22 अभियोजन गवाहों के बाद आया यह फैसला पीड़ित परिवार के लंबे इंतजार का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. हालांकि, मृत्युदंड का मामला है इसलिए बहुत जल्द मामला हाईकोर्ट के सामने होगा. और इससे भी आगे अपील की कानूनी प्रक्रिया भी संभव है.
लेकिन इस फैसले के बहाने एक बड़ा सवाल उठना चाहिए. क्या किसी अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा मिल जाना ही न्याय है? अदालत का काम केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि न्याय की ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करना भी है, जिससे नागरिकों का कानून पर भरोसा मजबूत हो और समाज में अपराध की पुनरावृत्ति रोकने की परिस्थितियां बनें. किसी परिवार के साथ हुई त्रासदी का जवाब केवल एक सजा में तलाशना पर्याप्त नहीं है. न्याय का उद्देश्य अपराध के बाद प्रतिशोध की भावना को संतुष्ट करने तक सीमित नहीं रह सकता.
यह सच है कि कुछ अपराध इतने भयावह होते हैं कि उन्हें सुनकर मन में गहरा आक्रोश पैदा होता है. सौरभ राजपूत हत्याकांड भी ऐसा ही मामला है. लेकिन जब कोई जघन्य अपराध सामने आता है तो हमारी सार्वजनिक चर्चा अक्सर दो बिंदुओं पर सिमट जाती है, अपराध कितना वीभत्स था और अपराधियों को कितनी कठोर सजा मिलनी चाहिए. उसके बाद समाज अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट जाता है. अपराध के पीछे मौजूद परिस्थितियों, हिंसक व्यवहार की प्रवृत्तियों और सामाजिक जिम्मेदारियों पर व्यापक चर्चा शायद ही कभी होती है.
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यहां एक बुनियादी अंतर समझना होगा. कठोर सजा और अपराध की रोकथाम एक ही चीज नहीं हैं. मृत्युदंड को लेकर यह धारणा प्रचलित है कि इससे दूसरे संभावित अपराधियों के मन में भय पैदा होगा. लेकिन भारत के विधि आयोग ने अपनी 262वीं रिपोर्ट में कहा था कि अभी तक हुए शोध बताते हैं कि मृत्युदंड के आजीवन कारावास की तुलना में अतिरिक्त निवारक प्रभाव को प्रमाणित नहीं करते. इसका अर्थ यह नहीं कि अपराधियों को सजा न दी जाए. बल्कि यह कि सजा की कठोरता के साथ अपराध पकड़े जाने की निश्चितता, जांच की गुणवत्ता और न्याय मिलने की प्रभावी व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.
हमारे समाज की एक बड़ी समस्या यह है कि व्यक्तिगत सफलता और आर्थिक प्रगति की दौड़ में सामाजिक सवाल पीछे छूटते जा रहे हैं. परिवार अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाने, बेहतर नौकरी दिलाने और आर्थिक रूप से सफल बनाने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं. यह स्वाभाविक और जरूरी भी है. लेकिन क्या हमने बच्चों को यह सिखाने के लिए पर्याप्त समय निकाला है कि असहमति से कैसे निपटना है, रिश्तों में तनाव होने पर क्या करना है और किसी दूसरे इंसान की स्वतंत्रता तथा जीवन का सम्मान कैसे करना है?
समाज में हिंसा को केवल पुलिस और अदालतों की जिम्मेदारी मान लेने से समस्या का समाधान नहीं होगा. परिवार, स्कूल, कॉलेज, सामाजिक संगठन और मीडिया-सभी की इसमें भूमिका है. बच्चों को केवल प्रतियोगिता के लिए तैयार करने के बजाय उनमें संवेदनशीलता, आत्मसंयम और दूसरे के प्रति सम्मान विकसित करना भी शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए. रिश्तों में संकट आने पर अलग होने या मदद मांगने जैसे विकल्पों को स्वीकार्य सामाजिक व्यवहार के रूप में समझना जरूरी है. हालांकि किसी विशेष अपराध को किसी एक सामाजिक कारण से जोड़ देना उचित नहीं होगा, लेकिन ऐसे अपराध हमें व्यापक सामाजिक वातावरण पर विचार करने के लिए जरूर प्रेरित करते हैं.
दुखद यह है कि किसी बड़ी घटना के बाद कुछ दिनों तक टीवी बहसों, सोशल मीडिया पोस्ट और राजनीतिक बयानों में आक्रोश दिखाई देता है. दोषियों के लिए कठोरतम सजा की मांग होती है. फिर कोई दूसरी घटना सुर्खियों में आ जाती है और पिछली त्रासदी हमारी सामूहिक स्मृति से धीरे-धीरे ओझल हो जाती है. अपराध से जुड़े सामाजिक प्रश्न वहीं के वहीं पड़े रहते हैं. हम परिणाम पर बहस करते हैं, लेकिन उन व्यवस्थाओं को सुधारने की निरंतर कोशिश नहीं करते जो हिंसा को रोकने, संभावित पीड़ितों को सहायता देने और समय रहते हस्तक्षेप करने में सहायक हो सकती हैं.
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सरकारों को अपराध की रोकथाम के लिए पुलिस और न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए. घरेलू हिंसा, रिश्तों में गंभीर विवाद और धमकी जैसी स्थितियों में समय पर सहायता उपलब्ध होनी चाहिए. स्कूलों और कॉलेजों में परामर्श की सुविधाएं तथा मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए. मीडिया को भी अपराध की सनसनीखेज जानकारी दिखाने से आगे बढ़कर उसके सामाजिक संदर्भ और रोकथाम के उपायों पर चर्चा करनी चाहिए. ऐसी पहल किसी एक अपराध को निश्चित रूप से रोक देंगी, यह दावा नहीं किया जा सकता. लेकिन इनके बिना रोकथाम की व्यापक व्यवस्था विकसित करना मुश्किल है.
सौरभ राजपूत की मां के लिए अदालत का फैसला न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. उनके दुख की भरपाई कोई फैसला नहीं कर सकता. न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए यह भी स्वीकार करना होगा कि मृत्युदंड सुनाए जाने से मामला कानूनी रूप से समाप्त नहीं हो जाता. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 407 के अनुसार, सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा पर अमल तभी हो सकता है, जब हाईकोर्ट उसकी पुष्टि कर दे.
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आखिरकार, किसी सभ्य समाज की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि वह अपराधियों को कितनी कठोर सजा देता है. यह भी देखना होगा कि वह अपराध होने से पहले उसे रोकने के लिए कितना प्रयास करता है, पीड़ितों और उनके परिवारों को कितनी सहायता देता है और नागरिकों में मानवीय संवेदनाएं विकसित करने के लिए क्या करता है. हमें पैसा कमाने, करियर बनाने और सुविधाएं जुटाने के साथ समाज को बेहतर बनाने के लिए भी समय निकालना होगा. वरना हर भयावह घटना के बाद हम कुछ दिनों तक आक्रोश जताएंगे, फांसी की मांग करेंगे और फिर अगली घटना का इंतजार करने लगेंगे.