पश्चिम बंगाल में लोगों ने सिर्फ बीजेपी को जिताने के लिए वोट नहीं दिया, बल्कि उससे कहीं ज्यादा तृणमूल कांग्रेस (TMC) को हराने के लिए बटन दबाया. बंगाल कभी राजा राममोहन राय, टैगोर, और विवेकानंद जैसी महान विभूतियों की कर्मभूमि था. लेकिन आज? आज के बंगाल का कलाकार और साहित्यकार सत्ता की तालियों का मोहताज हो गया है.
UAE के फुजैरा पोर्ट पर ईरान की मिसाइल हमले से एक बार फिर मिडिल-ईस्ट को गर्म कर दिया है. और ये हमला तब हुआ है जब ईरान और अमेरिका के बीच होर्मुज स्ट्रेट को लेकर सहमति बन गई है. और जहाजों की आवाजाही भी सामान्य होती जा रही है.
तमिलनाडु में बहुमत के लिए दस सीटों की भरपाई में जुटी विजय की पार्टी TVK एक के बाद एक नए दांव चलती जा रही है. कांग्रेस ने समर्थन के बदले मंत्रिपद मांगे तो विजय ने दूसरी पार्टियों के दरवाजे पर दस्तक दे दी.
यूनुस सरकार के दौर में बांग्लादेशी हिंदुओं के साथ हुई बर्बरता के जो वीडियो बंगाल तक पहुंचे, उसने वोटरों में भय पैदा कर दिया. हमले, हत्याएं, रेप और न जाने क्या-क्या. माना जाने लगा कि ममता के मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते बंगाल में भी ढाका और चटगांव जैसे भयावह हालात हो सकते हैं.
विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक 2024 के आम चुनाव से पहले केंद्र की सत्ता से बीजेपी को बेदखल कर सरकार बनाने के लिए गठित हुआ था. अब इंडिया ब्लॉक के लिए सत्ता हासिल करना बहुत दूर की बात लग रही है, अभी तो जैसे तैसे प्रासंगिक बनाए और अस्तित्व बरकार रखने की लड़ाई लड़ने की नौबत आ गई है.
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और असम में कांग्रेस पार्टी की बुरी पराजय हुई. लेकिन, जहां-जहां से भी इनके उम्मीदवार चुनाव जीते, उन्होंने दोनों पार्टियों की कथित सेकुलर पॉलिटिक्स से पर्दा उठा दिया. टीएमसी और कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों के स्ट्राइक रेट ने ‘तुष्टिकरण पॉलिटिक्स’ के नैरेटिव को और मजबूत किया है.
थलपति विजय के राजनीति में कदम रखने के साथ ही एक फैन के लिए एक पूरा एहसास बदल रहा है. दिल्ली में रहने वाले एक दक्षिण भारतीय के लिए दिवाली सेलिब्रेशन का मतलब था— विजय की फिल्में. जब स्क्रीन पर विजय नहीं होंगे, तो क्या दिवाली पहले जैसी बचेगी?
ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल चुनाव के काफी पहले से ही तैयारी कर रही थीं. अपनी रणनीति के तहत हर मुद्दे को जोर शोर से उठाती थीं. SIR का मुद्दा हो, या माछ-भात खाने का. ममता बनर्जी ने बीजेपी को हर तरह से घेरने की कोशिश की, लेकिन बंगाल ही नहीं भवानीपुर के ही चक्रव्यूह में फंस गईं.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला. भारतीय जनता पार्टी ने लंबे संघर्ष के बाद राज्य में ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए सत्ता हासिल कर ली. पार्टी ने 207 सीटों पर जीत हासिल की. जबकि सत्तारूढ़ दल दोहरे अंकों में सिमट कर रह गया.
थलपति विजय तमिलनाडु की राजनीति में नई ताकत बनकर उभरे हैं. चुनाव जीतने के बाद अब नई चुनौती सरकार बनाने की है. टीवीके को बहुमत न मिलने के कारण सरकार भी गठबंधन की ही बनानी है - और राजनीतिक या प्रशासनिक अनुभव न होने के कारण थलपति विजय के लिए सामने चुनौतियां काफी हैं.
विधानसभा चुनावों के नतीजों ने साबित किया कि अब सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि मजबूत 'नैरेटिव' ही चुनाव जिताता है, केरल से लेफ्ट की विदाई और बंगाल में भाजपा के प्रवेश के पीछे के असली चुनावी और सामाजिक कारण क्या हैं?
इस चुनाव के नतीजों ने कई संदेश दिए हैं, पश्चिम बंगाल से लेकर असम और पुंडुचेरी तक नतीजे बीजेपी के पक्ष में रहे तो वहीं तमिलनाडु में विजय की ब्लॉकबस्टर जीत ने बड़े-बड़े दिग्गजों को हिलाकर रख दिया.
तृणमूल कांग्रेस पार्टी ममता बनर्जी का चेहरा आगे करके महिला सशक्तिकरण का जो नैरेटिव बना रही थी, शायद वो बंगाल की महिलाओं के ही गले नहीं उतर रहा था. ’लक्ष्मी भंडार योजना’ जैसी कैश स्कीम भी ममता के लिए जीत की गारंटी नहीं बन पाई.
थलपति विजय की राजनीतिक सफलता के पीछे सिर्फ उनका स्टारडम ही नहीं, उनके पिता एस ए चंद्रशेखर की शानदार प्लानिंग भी है. बेटे के लिए फिल्में बनाने से लेकर, उसका फैन क्लब शुरू करने तक चंद्रशेखर ने सालों पहले जो प्लान बनाया, उसका नतीजा तमिलनाडु चुनाव में विजय की दमदार जीत है.
पश्चिम बंगाल में चुनावी जीत के साथ ही, भारतीय जनता पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली अधूरी सफलता का चक्र पूरा कर लिया है. ब्रांड मोदी के जरिए तेजी से रफ्तार भर रही बीजेपी के लिए केरल और तमिलनाडु के नतीजों ने भी रास्ता आसान कर दिया है.
विजय का राजनीतिक सफर अचानक नहीं, बल्कि फिल्मों के जरिए धीरे-धीरे बना एक नैरेटिव है. थुपक्की से सरकार तक उनके किरदारों ने समाज के लिए खड़े होने, सिस्टम से टकराने और लीडरशिप के लिए तैयार एक हीरो का चेहरा गढ़ा. यही वजह है कि उनका सियासत में आना, धमाकेदार एंट्री नहीं बल्कि एक नैचुरल ट्रांजिशन जैसा है.
राजनीति में कुछ जीत सिर्फ आंकड़ों में दर्ज होती हैं, और कुछ इतिहास में. पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की यह जीत दूसरी श्रेणी में आती है. यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि उस सियासी धारा का टूटना है जो पिछले डेढ़ दशक से एक ही दिशा में बह रही थी.
पश्चिम बंगाल की 293 सीटों पर सोमवार को काउंटिंग हुई. एक सीट फलता पर 21 मई को मतदान होगा. बीजेपी को बहुमत मिला है. बीजेपी ने 206 सीटें जीती हैं जबकि टीएमसी ने 79 सीटों पर जीत दर्ज की है.
पश्चिम बंगाव विधानसभा चुनावों में टीएमसी को मिली बड़ी हार का मूल्यांकल अब शुरू हो गया है. पिछले तीन विधानसभा चुनाव जीतने में ममता बनर्जी ने जिसे हथियार बनाया वही इस बार टीएमसी की हार का सबसे बड़ा कारण बना है. बांग्लादेशी नारे मां-माटी-मानूष, जय बांग्ला और खेला होबे इस बार उल्टा पड़ गया.
केरलम में कांग्रेस की जीत सामने है, लेकिन उतना ही करीब है असली इम्तिहान. कौन बनेगा केरलम का अगला सीएम? और बाकी दावेदारों का क्या होगा? क्या मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल, कर्नाटक जैसी सिरफुटव्वल होगी?
पश्चिम बंगाल में भी राहुल गांधी के भाषण में वैसी ही बातें सुनने को मिली हैं, जैसी दिल्ली विधानसभा चुनाव में. और, स्टैंड करीब करीब वैसा नजर आया - आखिर ममता बनर्जी को लेकर राहुल गांधी की रणनीति क्या थी?