5 अगस्त 2019 को दफा 370 खत्म होने पर इमरान खान ने मुजफ्फराबाद में रैली कर आग उगली थी. लेकिन सात साल बाद बाजी पलट चुकी है. आज उसी मुजफ्फराबाद, मीरपुर और रावलाकोट में लोग इस्लामाबाद के शोषण और पाक फौज के ज़ुल्म के खिलाफ सड़कों पर हैं. वहीं LoC के इस पार का कश्मीर अमन और तरक्की की मिसाल बन चुका है.
जो समाज पुरुषों के आपसी झगड़ों में बार-बार महिला की गरिमा पर चोट करता है, वह सिर्फ महिलाओं को सुरक्षित रखने में नाकाम नहीं हुआ है, बल्कि उसने खुद को भी नीचा गिरा लिया है.
इथेनॉल ब्लेंडिंग से 11 साल में बचाई गई1.84 लाख करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की चमक खाद्य तेलों के आयात बिल के आगे फीकी पड़ रही है. भारत ने महज एक साल में करीब 1.90 लाख करोड़ का खाने का तेल विदेशों से मंगा लिया. जानिए कैसे क्रूड ऑयल बचाने का यह गणित रसोई के बजट और देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी पड़ रहा है.
हर साल सावन के महीने में सड़कों पर उमड़ता शिवभक्तों का जनसैलाब भारत की उस गहरी सामाजिक बुनावट का प्रतीक है, जहां आस्था और समरसता एक साथ प्रवाहित होती हैं, कांवड़ यात्रा एक ऐसा मंच है जहां अमीर-गरीब का भेद समाप्त हो जाता है और सेवा भाव सर्वोपरि होता है.
राउज एवेन्यू कोर्ट से बृजभूषण शरण सिंह को कानूनी राहत मिल गई है, लेकिन भारतीय कुश्ती से जुड़े सवाल अब भी बाकी हैं. पहलवान हाईकोर्ट जाने की तैयारी में हैं. यह मामला सिर्फ एक मुकदमे का नहीं, बल्कि खिलाड़ियों के भरोसे, खेल संघों की जवाबदेही और भारतीय कुश्ती की विश्वसनीयता की अगली परीक्षा का भी है.
सत्ता जितनी लंबी होती जाती है, उसकी चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी होती जाती हैं. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की बढ़ती सक्रियता कुछ यही बात कह रही है. सरकार के हालिया फैसलों और चुनावी तेवर यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि यह आत्मविश्वास की राजनीति है या आने वाले चुनावों को लेकर बढ़ती बेचैनी?
बांकीपुर और दतिया की हार सिर्फ दो सीटों का नुकसान नहीं. ये भाजपा की अंदरूनी दरारों को बेनकाब कर रही हैं. जो अगले यूपी चुनाव में भारी पड़ सकता है. पूरा राज्य ऐसे ही कई गढ़ों से भरा है, जहां पार्टी की मजबूती दिखावे की है.
एक आम इंसान जब उदास होता है, तो वह किसी दोस्त के गले लगकर रो सकता है, सोशल मीडिया पर अपना दर्द लिख सकता है, या किसी थेरेपिस्ट के पास जाकर कह सकता है कि 'डॉक्टर साहब, मुझे बचा लीजिए, मैं अंदर से मर रहा हूं.' लेकिन जब एक मनोचिकित्सक ही डिप्रेशन में घिरता है, तो उसके लिए किसी के आगे हाथ फैलाना सबसे मुश्किल काम बन जाता है.
BJP का गढ़ रहे बांकीपुर में जन सुराज का परचम लहराकर प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति में नया इतिहास रच दिया है. पीके को अपने पहले चुनाव अभियान में कामयाबी मिलना बड़ी बात है, लेकिन इससे बड़ी खबर है कि बीजेपी के ‘ट्रिपल इंजन’ का फेल होना.
भारतीय जनता पार्टी के लिए बांकीपुर और दतिया की हार खतरे की घंटी है. इतिहास बताता है कि राजनीति में वही दल लंबे समय तक टिकते हैं जो जनता के संकेतों को समझते हैं, अपनी रणनीति बदलते हैं और संगठन को निरंतर जीवंत बनाए रखते हैं.
बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की बड़ी जीत ने बिहार की राजनीति में नए सवाल खड़े कर दिए हैं. बीजेपी की हार को राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, जबकि प्रशांत किशोर का उभार तेजस्वी यादव और राजद के लिए भी चुनौती बन सकता है.
प्रशांत किशोर की बांकीपुर से जीत सिर्फ एक उपचुनाव का नतीजा नहीं है. अब तक प्रशांत किशोर बाहर खड़े होकर सत्ता और विपक्ष, दोनों पर हमला करते थे. अब वो एनकाउंटर सदन के भीतर देखने को मिलेगा. पीके सिर्फ सम्राट चौधरी ही नहीं, तेजस्वी यादव के लिए भी सिरदर्द होने जा रहे हैं.
कंगना रनौत के उदाहरण से लिखा गया यह लेख बेबाकी, अभिव्यक्ति की आजादी और जवाबदेही के बीच के फर्क पर बात करता है. इसमें कई ऐसे सवाल उठाए गए हैं, जो सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, पूरे सार्वजनिक जीवन से जुड़े हैं.
जुलाई महीने में दो आंदोलनों ने सुर्खियां बटोरी- एक NEET पेपर लीक पर CJP का प्रोटेस्ट, और दूसरा E20 पेट्रोल को लेकर लामबंदी. दोनों मुद्दों पर प्रोटेस्ट जहां पहुंचा है, उसने आंदोलन करने वाली दो पीढ़ियों का फर्क साफ कर दिया है. और यह बताया गया है कि Gen-Z के तौर-तरीके भले विवादों से भरे हों, लेकिन सरकार को झुकाने के लिए कारगर भी वही हैं.
E20 पेट्रोल पर सरकार की सफाई जितनी बढ़ रही है, सवाल उतने गहरे होते जा रहे हैं. सरकार ही नहीं, भाजपा भी E20 पेट्रोल की गुणवत्ता के गुण गा रही है. लेकिन, इसके लिए वह जो आंकड़े दे रही है वे न सिर्फ गलत हैं, बल्कि गैर-जरूरी भी.
NEET पेपर लीक विवाद और छात्र आंदोलन ने व्यवस्था की नींव हिला दी. शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और नंदन नीलेकणी टास्क फोर्स के गठन के बाद सवाल यह है- क्या मोदी सरकार इसे महज डैमेज कंट्रोल तक सीमित रखेगी या दशकों पुरानी खामियों को दूर कर एक नई 'शिक्षा क्रांति' की शुरुआत करेगी? यह वक्त विवादों से परे बड़े बदलावों का है.
मनमोहन सिंह के लिए यह फैसला बहुत देर से आया. राजनीति आमतौर पर कानून की तुलना में बहुत तेज चलती है और जनता की राय शायद ही कभी किसी जज के फैसले का इंतजार करती है.
NEET पेपर लीक मुद्दे पर किरकिरी झेलने वाली सरकार के लिए दो चुनौतियां दरवाजे पर खड़ी हुई हैं. E20 पेट्रोल पर सरकार की नीतियों का विरोध सोशल मीडिया पर उबल रहा है, तो दूसरी तरफ एक प्रेशर ग्रुप आरक्षण हटाने की मुहिम चलाए बैठा है. इन दोनों मुद्दों से जुड़े लोग अहम वोटर वर्ग भी है.
पेपर लीक के ख़िलाफ़ CJP के विरोध-प्रदर्शन ने आरक्षण-विरोधी आंदोलन को जन्म दिया है और उसके लिए एक रूपरेखा तैयार की है. यही वजह है कि NEET-UG पेपर लीक को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शनों ने कोटा सिस्टम पर बहस को फिर से छेड़ दिया है.
अमेरिका और चीन जैसे देश पर्यावरण को सबसे ज्यादा प्रभावित करते रहे हैं. उन्होंने औद्योगिकीकरण के दौर में कठोर नियमों की परवाह कम की और आर्थिक शक्ति हासिल की. आज भी उनके कार्बन उत्सर्जन और संसाधन दोहन के आंकड़े हमसे कहीं ऊंचे हैं.
'कॉकरोच जनता पार्टी' के उग्र प्रदर्शन ने साबित कर दिया कि सत्ता बहरी नहीं है. दूसरी तरफ E20 ईंधन की जल्दबाजी में सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा का लक्ष्य तो छू लिया, लेकिन पुरानी गाड़ियों के इंजनों और मध्यम वर्ग के भरोसे को दांव पर लगा दिया. ऐसे में सवाल ये है कि सड़क पर उतरी भीड़ के शोर के आगे घुटने टेकती सरकार क्या उस आम नागरिक की शांत पुकार सुन पाएगी, जो हर रोज पेट्रोल पंप पर ठगा सा महसूस कर रहा है?