हम सभी बचपन से सुनते आ रहे हैं कि शरीर को सेहतमंद रखने के लिए बदल-बदलकर हरी सब्जियां, फल और दालें खानी चाहिए. मौसम के अनुसार अपनी डाइट बदलनी चाहिए. लेकिन क्या कभी आपने इस बात पर गौर किया है कि हम साल के बारह महीने एक ही तरह के आटे (मुख्य रूप से गेहूं) की रोटी खाते रहते हैं जिसकी मात्रा हमारी थाली में बहुत ज्यादा होती है. आयुर्वेद और हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, हमारे शरीर की जरूरतें मौसम के बदलने के साथ-साथ बदलती रहती हैं.
सर्दी, गर्मी और बरसात तीनों मौसमों में हमारे पाचन तंत्र की क्षमता अलग होती है. ऐसे में हर मौसम में एक ही तरह का अनाज खाना आपके पाचन और सेहत पर बुरा असर डाल सकता है. आइए जानते हैं कि बारिश के मौसम में आपको किस आटे की रोटी खानी चाहिए और क्यों हर मौसम में रोटियां बदलना जरूरी है.
मौसम के अनुसार क्यों बदलनी चाहिए रोटी?
आयुर्वेद के मुताबिक, हर अनाज की अपनी एक अलग तासीर यानी गुण होते हैं. कुछ अनाज शरीर को ठंडक देते हैं, तो कुछ गर्माहट पैदा करते हैं.
गर्मी के मौसम में शरीर को ठंडक देने वाले और हल्के अनाज जैसे जौ (बार्ले) या ज्वार (सोरघम) की रोटी फायदेमंद होती है.
सर्दी के मौसम में शरीर को अंदर से गर्म रखने और ऊर्जा देने के लिए बाजरा (पर्ल मिलेट) या मक्का (मेज) की रोटी अच्छी मानी जाती है.
वहीं, बरसात के मौसम में नमी बहुत ज्यादा होती है जिससे हमारी पाचन शक्ति काफी कमजोर हो जाती है. भारी अनाज आसानी से पच नहीं पाते, इसलिए इस मौसम में हल्का और पचने में आसान अनाज चुनना जरूरी है. चूंकि अभी बारिश का मौसम चल रहा है तो यहां हम आपको इसके हिसाब से सही आटा और रोटी की जानकारी दे रहे हैं.
बारिश के मौसम में किस आटे की रोटी खानी चाहिए
बरसातों के दिनों में संक्रमण और पेट से जुड़ी समस्याएं (जैसे अपच, गैस, ब्लोटिंग) आम हो जाती हैं. ऐसे में गेहूं की जगह कुछ हल्के आटों की रोटी का चुनाव करना चाहिए.
जौ का आटा: जौ की तासीर ठंडी और हल्की होती है. यह पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है और शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालने में मदद करता है.
सिंघाड़े का आटा या कुट्टू का आटा: यह न सिर्फ व्रतों में बल्कि सामान्य दिनों में भी मानसून के दौरान बहुत फायदेमंद माना जाता है, क्योंकि यह पचने में बेहद हल्का होता है.
रागी का आटा: फाइबर और पोषक तत्वों से भरपूर रागी पाचन को ठीक रखती है.
सत्तू, चना का आटा: इसकी तासीर और गुण मानसून में पेट को राहत देते हैं.
मल्टीग्रेन आटा: अगर आप पूरी तरह गेहूं नहीं छोड़ना चाहते, तो गेहूं के आटे में जौ, चना या रागी का आटा मिलाकर मल्टीग्रेन रोटी बना सकते हैं.
एक ही तरह की रोटी खाने के नुकसान
पाचन तंत्र पर दबाव: सालभर एक ही भारी अनाज खाने से पेट भारी रहता है और गैस-एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है.
पोषण की कमी: हर अनाज में अलग-अलग विटामिन्स और मिनरल्स होते हैं. एक ही आटा खाने से शरीर को सभी प्रकार के पोषक तत्व नहीं मिल पाते.