चुनाव आयोग यानी देश में लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व चुनाव का पहरेदार. तीन सदस्यीय इस संवैधानिक संस्था से आम तौर पर एक सुर में बोलने की उम्मीद की जाती है. लेकिन क्या चुनाव आयोग के भीतर हमेशा फैसले एकमत से होते हैं? जवाब है- नहीं. वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से जुड़े ताजा खुलासे इस तथ्य को फिर से सामने ला दिया है.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार SIR प्रक्रिया के दौरान लिए गए फैसलों और जारी किए गए आदेशों पर औपचारिक रूप से आपत्ति जताई थी. इस रिपोर्ट से बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है; विपक्षी पार्टियां सुप्रीम कोर्ट से दखल देने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग कर रही हैं.
रिपोर्ट पर पूछे गए सवालों के जवाब में चुनाव आयोग के सूत्रों ने कहा कि दोनों आयुक्तों ने वोटर लिस्ट को ठीक करने (क्लीनअप) के दौरान अलग-अलग राज्यों में नाम हटाने और वोटर डेटाबेस को संभालने से जुड़े मुद्दों पर चिंता जताई थी.
लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. चुनाव आयोग के इतिहास में ऐसा कई बार हुआ है जब सदस्यों की राय में मतभेद रहे हैं.
टीएन सेशन बनाम एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति
इन घटनाओं में सबसे चर्चित नामों में से एक है टीएन शेषन का. 1990 के दशक में शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे और चुनावी व्यवस्था में सख्ती के लिए उनकी अलग पहचान बन चुकी थी. अक्टूबर 1993 में राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग में दो और चुनाव आयुक्त नियुक्त किए- एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति. इसके साथ ही आयोग एक सदस्यीय से बहुसदस्यीय हो गया.
टीएन शेषन ने इस व्यवस्था को चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. जुलाई 1995 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि संविधान बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की परिकल्पना करता है और चुनाव आयुक्तों की भी निर्णय प्रक्रिया में भूमिका है. यानी CEC आयोग का हिस्सा जरूर है, लेकिन बाकी चुनाव आयुक्त केवल औपचारिक सदस्य नहीं हैं.
यहीं से एक अहम सिद्धांत स्पष्ट हुआ. अगर तीनों सदस्यों की राय अलग हो तो बहुमत का फैसला लागू होगा. यही व्यवस्था आगे चलकर चुनाव आयोग के भीतर होने वाली असहमतियों का आधार बनी.
1995 में गिल ने आरोप लगाया कि सेशन उन्हें और कृष्णमूर्ति को आयोग के काम में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं कर रहे हैं. एक विवाद में सेशन ने आयोग के काम का एक हिस्सा डिप्टी चुनाव आयुक्त को सौंप दिया, जिस पर गिल और कृष्णमूर्ति ने आपत्ति जताई.
तब शेषन पर आरोप लगा था कि वे आयुक्तों को मीटिंग में नहीं बुला रहे थे, कागजात नहीं दिखा रहे थे और अकेले फैसले ले रहे थे. गिल और कृष्णमूर्ति ने आरोप लगाया कि शेषन ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे वे मौजूद ही नहीं हैं. दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ पत्र लिखते रहे, प्रेस में बयानबाजी हुई और आयोग का कामकाज प्रभावित हुआ.
एमएस गिल ने इंडिया टुडे के साथ बातचीत में कहा था, "मुख्य चुनाव आयुक्त ने ऐसा व्यवहार किया जैसे हम मौजूद ही नहीं हैं.”
एन. गोपालस्वामी बनाम नवीन चावला
ये एक असाधारण मामला था. इस मामले में चीफ इलेक्शन कमिश्नर ने अपने सहयोगी और इलेक्शन कमिश्नर को हटाने की सिफारिश कर दी थी.
चुनाव आयोग के भीतर ऐसा टकराव सामने आया, जिसने पूरे संस्थान को हिला दिया. जनवरी 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को अपने ही साथी चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफारिश भेज दी.
गोपालस्वामी ने चावला पर एक राजनीतिक दल के पक्ष में पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करने का आरोप लगाया था. यह सिफारिश ऐसे समय आई थी, जब लोकसभा चुनाव कुछ ही महीने दूर थे और खुद गोपालस्वामी का कार्यकाल अप्रैल 2009 में खत्म होने वाला था.
मामला इसलिए और बड़ा हो गया क्योंकि आयोग के तीसरे सदस्य एसवाई कुरैशी को भी इस फैसले की प्रक्रिया से अलग रखे जाने की खबर सामने आई. कुरैशी ने कथित तौर पर इसे CEC का व्यक्तिगत फैसला बताया था, आयोग का सामूहिक फैसला नहीं.
आखिरकार राष्ट्रपति ने सरकार की सलाह पर गोपालस्वामी की सिफारिश को स्वीकार नहीं किया. इसके बाद चावला अप्रैल 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने.
मतलब यह है कि चुनाव आयोग में असहमति इस स्तर तक पहुंच चुकी थी कि एक CEC ने अपने ही साथी आयुक्त को हटाने की सिफारिश कर दी थी.
PM मोदी-शाह को क्लीन चिट और अशोक लवासा की अलग राय
इसके बाद 2019 का लोकसभा चुनाव आयोग के भीतर असहमति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहा. तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े आदर्श आचार संहिता के मामलों में आयोग के बहुमत के फैसलों से अलग राय रखी.
कई शिकायतों में आयोग के बहुमत ने आचार संहिता का उल्लंघन नहीं माना, जबकि लवासा की राय अलग थी. उन्होंने अपनी असहमति को आयोग के आदेशों में दर्ज किए जाने की मांग की.
यही विवाद आगे बढ़ा तो लवासा ने आचार संहिता से जुड़े मामलों की बैठकों से खुद को अलग कर लिया. उनका तर्क था कि यदि उनकी असहमति को रिकॉर्ड में शामिल नहीं किया जाता, तो बैठकों में शामिल होने का कोई औचित्य नहीं है.
इस प्रकरण ने चुनाव आयोग में ‘minority view’ यानी अल्पमत की राय को सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाने को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी. हालांकि आयोग ने स्पष्ट किया कि सदस्यों के बीच मतभेद होना असामान्य नहीं है.
21 मई 2019 को पूर्ण आयोग ने 2-1 के बहुमत से तय किया कि सदस्यों की अलग-अलग राय फाइल में दर्ज की जाएगी, लेकिन उसे अंतिम आदेश में सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।
यह प्रकरण इसलिए ऐतिहासिक रहा क्योंकि पहली बार चुनाव आयोग के भीतर किसी आयुक्त की असहमति इतनी स्पष्ट तरीके से सार्वजनिक बहस का विषय बनी.
दरअसल तीन सदस्यीय चुनाव आयोग की व्यवस्था में बहुमत से फैसले लेने का प्रावधान है. इसलिए सदस्यों के बीच अलग राय होना अपने आप में असंवैधानिक या असामान्य नहीं है.
असली सवाल तब उठता है जब यह असहमति आयोग के फैसलों, उसकी पारदर्शिता या सदस्यों के बीच अधिकारों के संतुलन को लेकर सार्वजनिक विवाद का रूप ले लेती है.