उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए पश्चिमी यूपी एक प्रमुख प्रयोगशाला बन रहा है. एक तरफ बसपा प्रमुख मायावती के भतीजे आकाश आनंद ने अपना पूरा ध्यान पश्चिमी यूपी पर केंद्रित कर रखा है, तो वहीं भाजपा आरएलडी के सहारे अपने सियासी किले को मजबूत बनाए रखने की कवायद में जुटी है.इस बीच, समाजवादी पार्टी ने भी पश्चिमी यूपी को लेकर अपनी नई रणनीति तैयार की है.
आरएलडी प्रमुख व केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी को 'चवन्नी' बताने वाले बयान के बाद अखिलेश यादव 'जाटलैंड' में अपने बिगड़े समीकरणों को दुरुस्त करने के लिए सहारनपुर उतरने जा रहे हैं. हालांकि, उनसे पहले जयंत चौधरी भी अपने 'मिशन-2027' का आगाज सहारनपुर से ही करने वाले हैं. इस तरह सहारनपुर 2027 की राजनीति का मुख्य अखाड़ा बनने जा रहा है.
साल 2022 का विधानसभा चुनाव सपा और आरएलडी ने मिलकर लड़ा था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में जयंत चौधरी ने भाजपा से हाथ मिला लिया. इसके बाद अखिलेश यादव ने हाल ही में जयंत का नाम लिए बिना तंज कसा था, 'चवन्नी से जिसे रुपया बना दिया, वे भी छोड़कर चले गए.इस बयान के बाद से पश्चिमी यूपी की सियासी तपिश काफी बढ़ गई है. ऐसे में अखिलेश यादव ने वेस्ट यूपी के समीकरणों को 'बेस्ट' बनाने का प्लान तैयार किया है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सहारनपुर सितंबर महीने में नया सियासी अखाड़ा बनने जा रहा है. आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी 3 सितंबर को सहारनपुर में एक बड़ी जनसभा करने जा रहे हैं. जयंत इस रैली के माध्यम से 2027 के विधानसभा चुनाव अभियान को सियासी धार देंगे.
आरएलडी ने इस रैली को सफल बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. बिजनौर से सांसद चंदन चौहान समेत पार्टी के सभी बड़े नेता तैयारी में जुटे हुए हैं. चवन्नी वाले बयान पर खड़े विवाद के बाद जयंत की इस पहली बड़ी रैली पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं.
जयंत चौधरी की रैली के ठीक तीन दिन बाद, 6 सितंबर को सहारनपुर में ही सपा प्रमुख अखिलेश यादव हुंकार भरेंगे. अखिलेश यादव की इस रैली की कमान सपा के राष्ट्रीय महासचिव चौधरी रुद्रसेन संभाल रहे हैं. इसे युवा योद्धा सम्मेलन का नाम दिया गया है.
अखिलेश युवाओं पर फोकस करते हुए अपने सियासी समीकरण साधने का दांव चलेंगे. माना जा रहा है कि सपा अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण को वेस्ट यूपी में नए तरीके से मजबूत करने में जुटी है, जिसके लिए उनका ध्यान दलित, मुस्लिम, गुर्जर और त्यागी समाज को जोड़ने पर है.
सहारनपुर की रैली के जरिए अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी को साधने के साथ-साथ जयंत चौधरी और कांग्रेस सांसद इमरान मसूद पर भी निशाना साध सकते हैं. वे जयंत चौधरी के गठबंधन तोड़ने और 'चवन्नी' वाले बयान पर अपनी बात रख सकते हैं. इसकी वजह यह है कि आरएलडी ने अखिलेश यादव के बयान को जाट सम्मान के साथ जोड़ दिया है, जिसे काउंटर करने के लिए सपा प्रमुख अपनी बात रख सकते हैं.
इसके साथ ही, वे सपा और उसकी मुस्लिम राजनीति पर लगातार सवाल खड़े करने वाले कांग्रेस सांसद इमरान मसूद को भी सियासी संदेश दे सकते हैं. माना जा रहा है कि अखिलेश यादव सहारनपुर में मुस्लिम नेताओं की पूरी फौज उतारकर बड़ा राजनीतिक संदेश देंगे. सहारनपुर के पूर्व सांसद हाजी फजलुर्रहमान, विधायक उमर अली खान, विधायक आशु मलिक से लेकर हाल में सपा में शामिल हुए शायान मसूद मंच पर अखिलेश यादव के साथ नजर आ सकते हैं.
पश्चिमी यूपी में आरएलडी के साथ गठबंधन टूटने के बाद सपा के पास मुस्लिम मतदाताओं के अलावा कोई दूसरा बड़ा एकमुश्त वोट बैंक नहीं बचा है. केवल मुस्लिम वोटों के सहारे भाजपा गठबंधन से चुनाव जीतना संभव नहीं है. इसीलिए सपा पश्चिमी यूपी के सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने में लगी है. इसके तहत सपा ने पहले गुर्जर समाज का भरोसा जीतने की कोशिश की और फिर त्यागी-ब्राह्मण वोटों को अपने साथ जोड़ने का दांव चला. अब सहारनपुर में सपा का मुख्य फोकस गुर्जर-मुस्लिम गठजोड़ को साधने पर है.
सहारनपुर के बाद अखिलेश यादव ने 12 सितंबर को बुलंदशहर में भी रैली करने का प्लान बनाया है. बुलंदशहर भी आरएलडी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, वहां 'युवा सम्मेलन' के बहाने युवाओं को साधने के साथ सियासी समीकरण दुरुस्त करने की रणनीति है. इस तरह सपा जयंत चौधरी के एक-एक गढ़ को भेदने की योजना पर काम कर रही है.
सपा के लिए सिर्फ आरएलडी ही नहीं, बल्कि मायावती के भतीजे आकाश आनंद भी नई चुनौती पेश कर रहे हैं. बसपा के नेशनल को-ऑर्डिनेटर आकाश आनंद ने हाथरस से 'मिशन-2027' के चुनावी अभियान की शुरुआत की थी. इसके बाद उन्होंने नोएडा के जेवर में रैली करके सियासी संदेश दिया और अब उनकी तीसरी रैली 17 सितंबर को सहारनपुर में होने जा रही है.
पश्चिमी यूपी बसपा का मजबूत गढ़ हुआ करता था. सहारनपुर बसपा की सियासी प्रयोगशाला रही है, जहां से मायावती ने खुद चुनावी मैदान में उतरी थी. बसपा यह सीट जीतती रही है. दलित नेता चंद्रशेखर आजाद भी सहारनपुर से आते हैं. पश्चिमी यूपी में दलित वोट काफी निर्णायक है.