मिडिल ईस्ट में तनाव फिर से चरम पर है. यमन के हूती विद्रोही सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमले बढ़ा रहे हैं. ऐसे में पाकिस्तान ने अपने पुराने सहयोगी सऊदी की सुरक्षा के लिए सेना की तैनाती की पुष्टि की है. फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के नेतृत्व वाली पाकिस्तानी सेना पहले से सऊदी में मौजूद है और नए रक्षा समझौतों के तहत और ताकत बढ़ाने की बात हो रही है. लेकिन सवाल उठ रहे हैं- पाकिस्तान खुद कई मोर्चों पर फंसा हुआ है.
उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर है, अंदरूनी आतंकवाद और सीमा विवाद जारी हैं. फिर भी वह सऊदी को बचाने निकला है. क्या मुनीर की सेना हूतियों से लड़ पाएगी? हूतियों से भिड़ना आसान होगा क्या? क्यों कुछ लोग पाकिस्तानी सेना को कमजोर और फटेहाल बता रहे हैं?
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सऊदी-पाकिस्तान रक्षा संबंध और हूती संकट
पाकिस्तान और सऊदी अरब के सैन्य संबंध दशकों पुराने हैं. पाकिस्तानी सैनिक लंबे समय से सऊदी में पवित्र स्थलों की सुरक्षा और प्रशिक्षण के काम में लगे रहे हैं. 2025 में दोनों देशों ने स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए. इसमें कहा गया कि एक पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा.
अगस्त 2026 में तुर्की को शामिल कर मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट हुआ. हाल के हफ्तों में हूतियों ने सऊदी हवाई अड्डों, तेल सुविधाओं और अन्य ठिकानों पर हमले किए. जवाब में सऊदी समर्थित यमनी सेना ने जवाबी कार्रवाई शुरू की. अक्टूबर 2026 की शुरुआत में रियाद में इमरजेंसी बैठक हुई.

पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की ने सामूहिक रक्षा को सक्रिय करने और सेनाओं की तेजी से तैनाती का फैसला किया. पाकिस्तानी सैन्य प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने पुष्टि की कि पाकिस्तानी फौज पहले से सऊदी में है. संख्या और क्षमताएं गोपनीय बताई गईं, लेकिन कहा गया कि प्रतिबद्धता पूर्ण और बिना शर्त है.
यह फैसला अचानक नहीं आया. पाकिस्तान ने ईरान से भी बात की कि वह हूतियों को काबू करे. मुनीर ने ईरानी विदेश मंत्री से फोन पर चर्चा की. पाकिस्तान कूटनीति को प्राथमिकता दे रहा है, लेकिन समझौते के तहत सैन्य सहयोग भी बढ़ा रहा है. भूमिका मुख्य रूप से रक्षात्मक बताई जा रही है- सऊदी क्षेत्र की सुरक्षा, टोही और सहायता. यमन के अंदर लड़ाई में सीधे शामिल होने की बात आधिकारिक रूप से नहीं कही गई.
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पाकिस्तानी सेना की मौजूदा तैनाती और क्षमता
पाकिस्तानी सेना दुनिया की बड़ी सेनाओं में गिनी जाती है. लगभग 6 लाख 60 हजार सक्रिय सैनिक, परमाणु हथियार और आधुनिक हथियारों का मिश्रण है. टैंक, लड़ाकू विमान (जेएफ-17 समेत), ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम उपलब्ध हैं. सऊदी में पहले से हजारों सैनिक, कुछ विमान और एयर डिफेंस यूनिट मौजूद बताए जाते हैं. नए समझौते के तहत और बल भेजे जा सकते हैं. पाकिस्तान का अनुभव सऊदी में प्रशिक्षण और सुरक्षा का रहा है. 1990-91 की खाड़ी युद्ध में भी उसने मदद की थी.

लेकिन हूती खतरा अलग है. हूती पारंपरिक सेना नहीं हैं. वे एसिमेट्रिक जंग लड़ते हैं- सस्ते ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइल और समुद्री हमले. वे बाब अल-मंदेब जैसे रणनीतिक रास्तों को प्रभावित करते हैं. सऊदी के पास मजबूत एयर डिफेंस है, लेकिन लगातार हमले संसाधनों पर दबाव डालते हैं. पाकिस्तानी मदद एयर डिफेंस, टोही और सीमा सुरक्षा में उपयोगी हो सकती है. फिर भी पूर्ण युद्ध में उतरना जोखिम भरा है.
पाकिस्तानी सेना को क्यों कहा जा रहा है फटेहाल?
पाकिस्तानी सेना की ताकत उसकी संख्या, परमाणु क्षमता और अनुशासन में है. वह क्षेत्रीय शक्ति के रूप में देखी जाती है. लेकिन कई विश्लेषक कहते हैं कि वह कई मोर्चों पर फैली हुई है. बलूचिस्तान में बलूच विद्रोही, खैबर पख्तूनख्वा में टीटीपी, अफगानिस्तान सीमा पर तनाव और भारत के साथ लंबे समय से चला आ रहा विवाद- ये सब ध्यान और संसाधन बांटते हैं.
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2026 में सुरक्षा बलों के हताहतों की संख्या ऊंची रही. आतंकवाद सूचकांक में पाकिस्तान ऊंचे स्थान पर रहा. अर्थव्यवस्था कमजोर है, विदेशी सहायता पर निर्भरता है और मुद्रास्फीति जैसी समस्याएं बनी हुई हैं. फटेहाल कहने का मतलब यह नहीं कि सेना कमजोर है. बल्कि यह कि घरेलू मोर्चे पर दबाव ज्यादा है. जब खुद देश के अंदर अशांति हो तो विदेश में बड़ी लड़ाई लड़ना मुश्किल हो जाता है.

मुनीर के नेतृत्व में कमांड संरचना बदली गई है. वे चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज भी हैं. लेकिन आंतरिक चुनौतियां कम नहीं हुईं. सऊदी मिशन से अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है. कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि सेना पहले से फैली हुई है, इसलिए बड़े पैमाने पर लड़ाकू तैनाती आसान नहीं.
हूतियों से लड़ना आसान होगा क्या?
नहीं, आसान नहीं होगा. हूती ईरान समर्थित हैं और लंबे समय से यमन में लड़ रहे हैं. उनके पास मिसाइल और ड्रोन तकनीक है जो सऊदी जैसी एडवांस सुरक्षा व्यवस्था को भी चुनौती देती है. पाकिस्तानी सेना पारंपरिक युद्ध में अनुभवी है, लेकिन असमीमित खतरे के खिलाफ निरंतर रक्षा अलग बात है.
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सऊदी खुद वर्षों से हूतियों से निपट रही है. पाकिस्तान अगर सीमा सुरक्षा या एयर डिफेंस में मदद करे तो भूमिका सीमित रह सकती है. लेकिन अगर संघर्ष बढ़े और यमन के अंदर ऑपरेशन हो तो जोखिम बढ़ जाएगा. हूतियों ने चेतावनी दी है कि अगर पाकिस्तान या तुर्की शामिल हुए तो जवाब देंगे.
मुनीर की सेना के लिए चुनौती यह है कि वे घरेलू मोर्चे को मजबूत रखते हुए विदेश में विश्वसनीय सहयोगी बनें. कूटनीति जारी रखना जरूरी है क्योंकि ईरान के साथ रिश्ते बिगड़ने से पाकिस्तान के लिए समस्याएं पैदा होंगी.

मुनीर की रणनीति और क्षेत्रीय प्रभाव
आसिम मुनीर पाकिस्तान की सुरक्षा नीति के केंद्र में हैं. उन्होंने सऊदी और तुर्की के साथ रक्षा गठबंधन को मजबूत किया. साथ ही ईरान से बातचीत का दरवाजा खुला रखा. यह संतुलन बनाए रखना मुश्किल है. सऊदी से आर्थिक और धार्मिक संबंध मजबूत हैं. पवित्र स्थलों की सुरक्षा पाकिस्तान के लिए भावनात्मक मुद्दा भी है. लेकिन अगर हूती संघर्ष लंबा खिंचे तो पाकिस्तानी सैनिकों के हताहत होने का खतरा है.
घरेलू स्तर पर आलोचना हो सकती है कि अपनी समस्याओं को छोड़कर बाहर जा रहे हैं. क्षेत्रीय स्तर पर यह गठबंधन मिडिल ईस्ट की शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है. अमेरिका-ईरान तनाव के बीच पाकिस्तान की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है. लेकिन पाकिस्तान की अपनी सीमाएं हैं. बहु-मोर्चा युद्ध की क्षमता सीमित है.
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जोखिम भरा संतुलन
पाकिस्तानी सेना की सऊदी तैनाती पुराने रिश्तों और नए समझौतों का नतीजा है. वह कमजोर नहीं है, लेकिन फैली हुई जरूर है. हूतियों से सीधा मुकाबला आसान नहीं होगा क्योंकि यह पारंपरिक युद्ध नहीं बल्कि छापामार और तकनीकी खतरा है. मुनीर को घरेलू सुरक्षा, आर्थिक दबाव और क्षेत्रीय कूटनीति- तीनों को संभालना होगा.
अगर भूमिका रक्षात्मक और सीमित रही तो जोखिम कम रहेगा. लेकिन अगर संघर्ष बढ़ा तो पाकिस्तान को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है. यह घटना याद दिलाती है कि सैन्य ताकत सिर्फ हथियारों और संख्या से नहीं, बल्कि रणनीतिक समझदारी और संसाधन प्रबंधन से भी मापी जाती है. सऊदी की मदद करते हुए पाकिस्तान को अपनी हालत सुधारने पर भी ध्यान देना होगा, वरना अपना हाल फटेहाल वाली बातें और जोर पकड़ेंगी.