संसद के मॉनसून सत्र हंगामे के भेट चढ़ गया, अब सिर्फ दो कामकाजी दिन बचे हैं. सत्र के आखिरी दिन अक्सर दोपहर के आसपास अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया जाता है. असल में, विधायी कामकाज के लिए संसद के मॉनसून सत्र में सिर्फ़ एक दिन बचा है. मोदी सरकार ने हंगामे के बीच मॉनसून सत्र में धड़ाधड़ 19 विधेयक को पास करा ले गई, लेकिन सवाल है कि सरकार परिसीमन और एफसीआरए बिल पर क्या करेगी?
मॉनसून सत्र का पहला सप्ताह पूरी तरह से हंगामे के भेट चढ़ गया था, लेकिन दूसरे सप्ताह में सरकार ने विधेयक को पास करने की रणनीति बनाई. इसके बाद हंगामे के बीच सरकार ने धड़ाधड़ बिल पास काया. एंटी पेपर लीक बिल पर ही विस्तृत चर्चा हो सकी है, उसके अलावा बाकी बिल बिना बहस के पास हो गए.
मोदी सरकार मॉनसून सत्र में जिस तरह ताबड़तोड़ बिल पास कराए हैं, यह बहस का विषय है. सरकार ने तो सात बिल महज 36 मिनट में पास कर करा लिए. औसतन हर पांच मिनट में एक बिल, जिसमें कुछ बिलों में ज़्यादा समय लगा, क्योंकि सांसदों ने उनमें संशोधन का प्रस्ताव दिया था. अब सदन में सिर्फ एक दिन का ही काम बचा हुआ है, लेकिन परिसीमन और एफसीआरए पर तस्वीर साफ नहीं है?
मॉनसून सत्र हंगामे के भेंट, अब एक दिन ही बचा
संसद का मॉनसून सत्र 13 अगस्त तक चलना है, आज के बाद कल का ही दिन है. सरकार सत्र में कई अहम बिल पास कराने में कामयाब रही, लेकिन संसदीय बहस की गुणवत्ता पर नज़र डालें, तो सरकार द्वारा लाए गए 'एंटी-पेपर लीक बिल' पर ही सार्थक चर्चा हुई, इसके अलावा किसी और बड़े कानून पर कोई खास बहस नहीं हुई.
लोकसभा में ज़्यादातर कार्यवाही सुबह 11बजे शुरू हुई, लेकिन विपक्ष के विरोध के कारण दोपहर तक स्थगित कर दी गई. इसके बाद जब सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई, तो हंगामा जारी रहा और स्थगन का समय दोपहर 2 बजे तक बढ़ा दिया गया. देखा गया कि दोपहर 2 बजे के बाद भी लगातार नारेबाज़ी और हंगामे के चलते सदन को पूरे दिन के लिए स्थगित करना पड़ा. अब सिर्फ गुरुवार का ही दिन बचा हुआ है.
संसद मॉनसून सत्र में कितने घंटे हो सका काम
संसद के मॉनसून सत्र में दोनों सदनों के कामकाज हंगामे के चलते भेंट चढ़ गया. संसद में अगर रोज़ाना छह घंटे की संसदीय कार्यवाही मानी जाए, तो 15 दिनों में 90 घंटे का काम होना चाहिए था. हालांकि, लोकसभा में इस सत्र में केवल 15 घंटे 36 मिनट ही काम हो सका है जबकिराज्यसभा में 15 दिनों में 24 घंटे 21 मिनट काम हुआ, जिसमें हर बिल को पास करने में औसतन लगभग एक घंटा लगा.
मॉनसून में हंगामे के बावजूद सरकार अपना विधायी एजेंडा पूरा करने में सफल रही. विपक्ष के नारेबाजी और हंगामे के बीच सरकार ने बिल पास कराने की रणनीति अपनाई थी. सरकार के पास दोनों सदन में बहुमत है, जिसके चलते ताबड़तोड़ 19 विधेयक को पास करा लिया.
मॉनसून सत्र में सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि 'पब्लिक एग्जामिनेशन (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन बिल' का पास होना था, इस बिल पर लोकसभा में 11 घंटे और राज्यसभा में 7 घंटे 14 मिनट तक बहस हुई.इस सत्र में सबसे ज़्यादा असर 'प्रश्नकाल' (Question Hour) पर पड़ा - यह हो ही नहीं पाया. प्रश्न काल बर्बाद होने का मतलब है कि सदस्यों को सवाल पूछने का मौका नहीं मिला.
परिसीमन और FCRA बिल पर अब क्या होगा?
पेपर लीक के मुद्दे पर छात्रों के आंदोलन के चलते धर्मेंद्र प्रधान का केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद विपक्ष ने अपना फोकस गृह मंत्री अमित शाह पर केंद्रित कर दिया था. राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि छात्रों के ख़िलाफ़ कार्रवाई शाह के कहने पर की गई थी,यह एक ऐसा आरोप था जिसे सरकार ने बार-बार और साफ़ तौर पर खारिज किया. इस राजनीतिक टकराव और बार-बार हो रहे हंगामे के वजह से परिसीमन बिल और FCRA बिल पर चर्चा नहीं हो सकी.
एफसीआरए के बिल पर कुछ समूहों ने शुरुआती आपत्तियां उठाईं, जिसके बाद अमित शाह ने संसद के भीतर ईसाई समुदाय से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की. उन्होंने कहा कि सरकार सभी संबंधित पक्षों की बात सुनने के बाद ही आगे बढ़ेगी, इन आश्वासनों के बावजूद, FCRA बिल को लेकर अनिश्चितता बनी रही. परिसीमन बिल को लेकर सस्पेंस बना हुआ है.
संसद सत्र में सिर्फ़ दो दिन बचे होने और आखिरी दिन आमतौर पर बहुत कम कामकाज होने के कारण, यह मामला राज्यसभा की बिज़नेस एडवाइज़री कमेटी की बैठक में फिर से उठा. कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने मांग की कि FCRA बिल को वापस लिया जाए, जबकि विपक्ष के कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया है कि इसे जेपीसी के पास भेजा जाना चाहिए. सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार इस बिल को JPC के पास भेजने पर विचार कर रही है.
परिसीमन (डिलिमिटेशन) का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा. सरकार ने परिसीमन विधेयक को फिर से आगे बढ़ाने के लिए ज़ोरदार कोशिश की. संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मामले पर राहुल गांधी के साथ तीन दौर की बातचीत की. हर बार राहुल गांधी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार को सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए. रिजिजू का रुख यह था कि अगर कांग्रेस विधेयक का समर्थन करने को तैयार हो, तो सरकार तुरंत ऐसी बैठक बुला सकती है, लेकिन अगर पार्टी ने पहले ही इसका विरोध करने का फ़ैसला कर लिया हो, तो बैठक बुलाने का कोई खास मतलब नहीं है.