संसद का मौजूदा मॉनसून सत्र शुरुआत से ही लगातार हंगामे की भेंट चढ़ा है. सरकार और विपक्ष के बीच जारी टकराव का असर विधायी कार्यवाही पर साफ दिखाई दिया. स्थिति ये रही कि केवल कुछ चुनिंदा विधेयकों पर ही विस्तार से चर्चा हो सकी, जबकि कई महत्वपूर्ण विधेयक बिना किसी सार्थक बहस के कुछ ही मिनटों में पारित कर दिए गए.
अब तक केवल 'पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक, 2026' पर दोनों सदनों में विस्तृत चर्चा हुई. लोकसभा में इस पर करीब 12 घंटे और राज्यसभा में 10 घंटे, यानी कुल 22 घंटे बहस चली. इसके अलावा अधिकांश विधेयक बिना विस्तृत चर्चा के पारित हुए. लगातार हो रहे हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित होती रही. विपक्ष 'चंदा चोरी' के मुद्दे और छात्रों पर कथित लाठीचार्ज को लेकर गृह मंत्री अमित शाह से जवाब की मांग पर अड़ा रहा.
'विपक्ष का रवैया नाटक के मंच जैसा'
इस पूरे घटनाक्रम पर बीजेपी सांसद डॉ. दिनेश शर्मा ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि संसद विपक्ष की वजह से नहीं चल पा रही है. उनके मुताबिक, विपक्ष का काम लोकतांत्रिक तरीके से सरकार का विरोध करना और अपनी बात रखना है, लेकिन वर्तमान में विपक्ष का व्यवहार ऐसा प्रतीत होता है मानो वह संसद नहीं, बल्कि किसी नाटक का मंच हो.
उन्होंने कहा कि कभी विपक्षी सांसद दानपात्र लेकर आते हैं तो कभी भगवान राम की तस्वीर को समाजवादी पार्टी के सांसदों के चरणों में रखकर धरना देते हैं. राज्यसभा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विपक्षी सदस्य जोर-जोर से शोर मचाते हैं, जबकि ऐसा व्यवहार छोटे बच्चे भी नहीं करते.
'चर्चा नहीं चाहता विपक्ष'
डॉ. शर्मा ने कहा कि विपक्ष की एक गरिमा और मर्यादा होती है. जनता के टैक्स का करोड़ों रुपये संसद चलाने पर खर्च होता है, लेकिन विपक्ष के रवैये के कारण सदन में विधेयकों पर चर्चा नहीं हो पा रही.
उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष पंजाब और झारखंड की घटनाओं पर चर्चा नहीं करना चाहता और केवल हंगामा कर संसद का समय बर्बाद करना चाहता है.
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि वह भी राज्यसभा में अलग-अलग तरह की आवाजें निकालकर सदन की गरिमा को प्रभावित कर रहे हैं.
वहीं, आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद बलविंदर सिंह कंग ने सरकार को संसद की कार्यवाही बाधित होने के लिए जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने कहा कि संसद को सुचारु रूप से चलाना सरकार की जिम्मेदारी है. उनके अनुसार, विपक्ष कई महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दे उठाना चाहता है और सरकार को उन पर जवाब देना चाहिए.
उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलन के दौरान हुए कथित लाठीचार्ज और भगवान राम में आस्था रखने वाले करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकार को सदन में अपना पक्ष रखना चाहिए.
उन्होंने आरोप लगाया कि गृह मंत्री अमित शाह राज्यसभा में तो आते हैं, लेकिन लोकसभा में इन मुद्दों पर जवाब देने से बच रहे हैं. उनका कहना था कि यदि सरकार इन दोनों प्रमुख मुद्दों पर जवाब दे दे, तो संसद की कार्यवाही सामान्य हो सकती है.
सपा का सरकार पर निशाना
समाजवादी पार्टी के सांसद राजीव राय और आनंद भदौरिया ने भी इसी तरह की राय व्यक्त की. दोनों नेताओं का कहना था कि सरकार ही संसद नहीं चलाना चाहती.
राजीव राय ने कहा कि विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों को सदन में सुनना चाहता है. उन्होंने आरोप लगाया कि जिन मुद्दों को लेकर बीजेपी जनता के बीच गई. उन्हीं मुद्दों पर अब सरकार चुप्पी साधे हुए है. उन्होंने कहा कि विपक्ष लगातार स्थगन प्रस्ताव देकर गृह मंत्री से जवाब मांग रहा है, लेकिन वह सदन में आकर जवाब नहीं दे रहे.
सत्र में पारित और पेश किए गए प्रमुख विधेयकों की स्थिति
मानसून सत्र के दौरान कई विधेयक बेहद कम वक्त में पारित किए गए या बिना चर्चा के आगे बढ़ा दिए गए. मॉनसून सत्र के दौरान कई विधेयक बिना किसी खास बहस के पारित कर दिए गए. 'पब्लिक एग्जामिनेशंस संशोधन विधेयक, 2026' पर लोकसभा में 12 घंटे और राज्यसभा में 10 घंटे चर्चा हुई. वहीं, 'पंजीकरण जन्म एवं मृत्यु संशोधन विधेयक, 2026' पर लोकसभा में केवल लगभग 2 मिनट ही चर्चा हो सकी.
'राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण संशोधन विधेयक, 2026' दोनों सदनों से पारित, इस बिल पर कुल लगभग 14 मिनट चर्चा. भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक, 2026– केवल लोकसभा में पेश. बैंकर्स बुक एविडेंस विधेयक, 2026- केवल लोकसभा में पेश. सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026- लोकसभा से बिना चर्चा पारित हो गया. कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026- केवल लोकसभा में पेश.
सिमटी संसदीय बहस की परंपरा
मानसून सत्र की कार्यवाही से यह स्पष्ट है कि सरकार और विपक्ष के बीच जारी टकराव का सबसे बड़ा असर संसद की विधायी प्रक्रिया पर पड़ा है. एक ओर सरकार विपक्ष पर अनावश्यक हंगामे का आरोप लगा रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष का कहना है कि सरकार जवाबदेही से बच रही है. ऐसे में संसदीय बहस की परंपरा और विधेयकों पर गंभीर चर्चा का दायरा लगातार सिमटता दिखाई दे रहा है.