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शिंदे पर नकेल, लोकसभा चुनाव के लिए नया पार्टनर... महाराष्ट्र में BJP ने एक तीर से साधे दो निशाने

बीजेपी ने रविवार को महाराष्ट्र की राजनीति में जो सियासी उलटफेर किया, उससे एक ही तीर से दो निशाने साध लिए गए हैं. जहां एक तरफ महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी का कद बढ़ा है तो वहीं विपक्षी एकता को भी चोट पहुंची है. अजित पवार के आने से भाजपा को लोकसभा चुनाव के लिए नया पार्टनर मिल गया है, जो कि शिंदे के लिए दबाव वाली स्थिति है.

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महाराष्ट्र डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार
महाराष्ट्र डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार

महाराष्ट्र में रविवार को जो सियासी भूचाल आया है, उससे सीधे तौर पर दो बातें सामने आती हैं. पहली एनसीपी में टूट होने से वह कमजोर हो गई है और शरद पवार की सियासी ताकत भी घट गई है. दूसरी बीजेपी ने महाराष्ट्र की सियासत में मजबूत पैठ हासिल कर ली है. अब बीजेपी के पास सीएम शिंदे के अलावा, अजित पवार भी बड़े विकल्प के तौर पर मौजूद हैं, जिसका फायदा पार्टी लोकसभा चुनाव में उठा सकती है.

इन दो बातों के अलावा जो तीसरी सबसे बड़ी बात हुई वह यह है कि बीजेपी ने 2024 से ठीक छह महीने पहले विपक्षी एकता पर करारा प्रहार कर दिया है. इसका घाटा सिर्फ शरद पवार को ही नहीं होगा, बल्कि बीते दिनों पटना में महाजुटान आयोजित करने वाले नीतीश कुमार समेत तमाम विपक्षी दलों को होगा. इसके अलावा अगले आम चुनावों में फिर से वापसी का सपना देख रही कांग्रेस को भी इससे चोट पहुंची है.  

एक तीर से साधे दो निशाने
पहले बात महाराष्ट्र की करते हैं. बीजेपी ने 'अजित पवार' नाम के एक तीर से दो निशाने साध लिए हैं. पहले तो महाराष्ट्र में सीएम एकनाथ शिंदे पर नकेल कस दी है और अगले लोकसभा चुनाव के लिए नया गठबंधन पार्टनर भी तलाश लिया है. साथ ही बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने की कोशिश में लगे विपक्षी नेताओं की एकता में सेंधमारी की है. ऐसा इसलिए क्योंकि शरद पवार विपक्षी महाजुटान का प्रमुख चेहरा हैं और अब उनकी ही पार्टी में दो फाड़ हो चुकी है. 

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शरद पवार (फाइल फोटो)

अजित का शामिल होना यानी बीजेपी हुई मजबूत
अजित पवार का शिंदे-बीजेपी सरकार में शामिल होना एक तरह से बीजेपी को मजबूत कर रहा है. बीजेपी शिंदे गुट के समर्थन के इतर भी बहुमत के आंकड़े तक पहुंच रही है. वर्तमान में सरकार के पास कुल 166 विधायकों का समर्थन है. अगर शिंदे कैंप के 40 विधायक जाते हैं तो ये संख्या 126 हो जाएगी. अगर अजित पवार खेमे के 30 विधायकों को भी जोड़ लें, तो भी सरकार के पास 156 विधायकों का समर्थन होगा, जो बहुमत से 11 ज्यादा होगा.

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ऐसे में अब मुख्यमंत्री भले ही शिंदे हों लेकिन अजित और देवेंद्र फडणवीस की जोड़ी डिप्टी सीएम के तौर पर सरकार पर हावी रहेगी. साथ ही अपने मुद्दों और लोगों को आगे करने में भी इन दोनों ही नेताओं की चलेगी. 

लोकसभा के लिए मिला नया पार्टनर 
अजित पवार के पास तीन सांसदों का भी दावा किया जा रहा है. बीजेपी पिछले लोकसभा चुनाव में शिवसेना के साथ थी तब शिवसेना को 18 सीटें मिली थीं. इस बार शिंदे की तरफ से इतनी सीटें मिलने की उम्मीद नहीं है. अजित के आने से भाजपा को लोकसभा के लिए नया पार्टनर मिल गया है. ऐसे में अजित की एनसीपी और शिंदे की शिवसेना मिलकर महाराष्ट्र और फिर केंद्र में मिलकर एनडीए को मजबूती दे सकते हैं.

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शिवसेना से गठबंधन टूटने के बाद शिंदे के तौर पर महाराष्ट्र में बीजेपी को पार्टनर तो मिला लेकिन फिर भी इतने बड़े सूबे में पार्टी को गठबंधन के मजबूत चेहरों की दरकार थी. अब अजित पवार के बूते बीजेपी लोकसभा चुनाव में एनसीपी के बड़े वोट बैंक को एनडीए के पाले में खींच सकती है.

विपक्षी एकता को भी पहुंचाई चोट
इसके साथ ही बीजेपी का ये मास्टरस्ट्रोक विपक्षी एकता के खिलाफ भी काम कर गया है. विपक्षी खेमे में शरद पवार बड़ा चेहरा माने जा रहे हैं. लेकिन अब उनकी स्थिति वैसी नहीं रही. शरद पवार के हालात ऐसे हो गए हैं कि वह पार्टी बचाएं या खुद का वजूद. अब इस बगावत से उनकी नेतृत्व क्षमता और पार्टी को एकजुट रखने के प्रयास भी विफल होते दिख रहे हैं क्योंकि जिन प्रफुल्ल पटेल को उन्होंने कुछ दिन पहले कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया था वही अजित पवार के साथ मंच साझा करते दिख गए हैं. ऐसे में अंदरूनी कलह झेल रहे शरद पवार के लिए विपक्ष को एकसाथ खड़े रखना और भी मुश्किल हो जाएगा.

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विपक्षी एकता को झटका (फाइल फोटो)

आमने-सामने चाचा-भतीजे
अब ताजा घटनाक्रम में जो स्थिति बनी है उसमें महाराष्ट्र के कद्दावर नेता की पहचान रखने वाले शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार विरोधी के तौर पर सामने हैं. अजित पवार ने पार्टी से तो बगावत की ही है, साथ ही उन्होंने पार्टी के नाम और निशान पर भी दावा ठोक दिया है. पांच जुलाई को एनसीपी के दोनों धड़ों ने पार्टी के नेताओं की बैठक बुलाई है. इस तरह से शरद पवार के सामने जो स्थिति उत्पन्न हुई है वह उद्धव ठाकरे के सामने पैदा हुई स्थिति जैसी ही है. शिवसेना प्रमुख रहे उद्धव ठाकरे ने सीएम एकनाथ शिंदे के साथ नाम और निशान की लंबी लड़ाई लड़ी है. शिवसेना के दोनों धड़े उद्धव गुट और शिंदे गुट के नाम से जाने जाते हैं.

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