
रांची में चल रहा छात्र आंदोलन अब धीरे-धीरे 'जंतर-मंतर 2.0' की शक्ल लेता दिख रहा है. दिल्ली में Gen-Z प्रदर्शनकारियों को खाना खिलाकर सोशल मीडिया पर चर्चा में आए मोहम्मद जुनैद अब रांची पहुंच चुके हैं. जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में धरने पर बैठे छात्रों के बीच खाना बांटते उनके वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं.
जुनैद के लिए जगह नई है, लेकिन रोल वही... प्रदर्शनकारी छात्रों को खाना पहुंचाना. ऐसे में आजतक.इन ने उनसे बात कर जाना कि रांची और जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में उनको क्या अलग लगा.
मोहम्मद जुनैद कहते हैं, 'लोकेशन बदली है, लेकिन मुद्दा वही है... छात्रों का गुस्सा.' उनके मुताबिक, रांची और जंतर-मंतर के आंदोलन में फर्क कम, माहौल का अंतर ज्यादा है.
जुनैद के शब्दों में, 'दिल्ली में पुलिस ज्यादा सख्त थी. रांची पुलिस ज्यादा कॉर्पोरेटिव है. जंतर-मंतर पर खाने का एक-एक पैकेट सिक्योरिटी स्कैनर से गुजरता था, जबकि रांची में ऐसी सख्ती नहीं है. इससे प्रदर्शनकारियों तक खाना पहुंचाना आसान हो गया है.'

वो आगे कहते हैं, 'जंतर-मंतर में जगह सीमित थी, इसलिए भीड़ बढ़ते ही गर्मी में परेशानी शुरू हो जाती थी. रांची की प्रदर्शन स्थल कहीं ज्यादा बड़ा है. यहां कितने भी छात्र आ सकते हैं और गर्मी में भी जंतर-मंतर जैसी घुटन महसूस नहीं होती.'
कितने छात्र आ रहे होंगे? सवाल पर जुनैद कहते हैं- सुबह भीड़ कम रहती है. लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतता है छात्र बढ़ते जाते हैं. रात तो यहां डेढ़-दो हजार छात्र होंगे.
यानी सब जंतर-मंतर जैसा है? इस सवाल पर जुनैद कुछ पल रुके. फिर बोले, पूरी तरह नहीं.
उनके मुताबिक, 'दिल्ली में प्रदर्शनकारी एकजुट होकर लड़ रहे थे. यहां मुझे अलग-अलग गुट नजर आए हैं.' हालांकि उन्होंने इस पर कोई बड़ा निष्कर्ष निकालने से बचते हुए कहा, 'अभी मेरी सबसे ज्यादा बात नहीं हुई है. इसलिए इस बारे में ज्यादा कहना ठीक नहीं होगा.'
जुनैद ने आगे बताया कि वो रांची अपनी मर्जी से आए हैं, उनको किसी ने वहां बुलाया नहीं था. वह बोले, 'जहां छात्रों के साथ अन्याय होगा वहां मैं जाऊंगा. चाहे सरकार किसी की हो, उससे फर्क नहीं पड़ता. मेरी बस इतनी मांग है कि छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ बंद होना चाहिए.'
वह आगे बोले, 'पेपर 5-5 लाख में बिक जाते हैं. 14-14 घंटे पढ़ने वाले देखते रह जाते हैं. उनकी उम्र हो जाती है लेकिन नौकरी नहीं लगती. शादी तक में दिक्कत आती है.'
जुनैद और खाना... यानी फिर वही पुराना सवाल, 'पैसा कहां से आता है?' इस सवाल पर मोहम्मद जुनैद पहले हंस पड़े. फिर बोले, 'भाई, मैं सब अपनी जेब से खर्च नहीं करता.'
जुनैद के मुताबिक, उनका काम खाना खिलाने से ज्यादा लोगों को जोड़ने का है. वे कहते हैं, 'दिल्ली में भी लोग खुद राशन, खाना और मदद लेकर आते थे. यहां रांची में भी मैंने बस लोकल लोगों से बात करवाई, उन्हें जोड़ा. मैं सिर्फ कॉर्डिनेट करता हूं.'
उन्होंने कहा, 'मेरा रोल खाना बनवाने, पहुंचाने और बांटने का तालमेल बैठाना है. लेकिन सोशल मीडिया पर ऐसा दिखाया जाता है जैसे पूरा खर्च मैं अकेले उठा रहा हूं.'
फिर हंसते हुए बोले, 'कॉमन सेंस की बात है... एक अकेला आदमी डेढ़-दो हजार लोगों का खाना रोज कहां से कराएगा?'

जुनैद ने आगे कहा कि जंतर-मंतर की तरह यहां रांची में भी वेज बिरयानी जरूर बंटेंगी.
जुनैद आगे बताते हैं, 'यहां अकेला मैं खाना नहीं बांट रहा. भगवा पहने एक हिंदू भाई भी हैं. यह ही भारत की खूबसूरती है. हमारी मान्यता, धर्म अलग है. लेकिन हम फिर भी एक हैं.'
फंडिंग की बात खत्म होते-होते मोहम्मद जुनैद अचानक जंतर-मंतर के दिनों में लौट गए. बोली में हल्की-सी खुशी और यादों की गर्माहट थी. बोले, 'मैं तो एक जोड़ी कपड़ों में जंतर-मंतर पहुंचा था. कई दिन उन्हीं कपड़ों में रहा. दिन कैसे निकल जाता था, पता ही नहीं चलता था. 17-18 घंटे खड़े-खड़े बीत जाते थे. कोई माताजी चाय लेकर आ जाती थीं, कोई ढेर सारी इडली दे जाता था. जिसको जो बन पड़ा, वो लेकर पहुंच जाता था.'
जुनैद कहते हैं कि धीरे-धीरे मदद का दायरा बढ़ता गया. 'बाद में कुछ NGO जुड़े, किसान भाई भी आए. फिर खाने-पीने का इंतजाम आसान हो गया. सब मिलकर मैनेज हो गया.'
कॉकरोच जनता पार्टी से अब भी जुड़े हैं?
जुनैद ने आगे बताया कि कॉकरोच जनता पार्टी के लोग अब भी उनसे संपर्क में हैं. फिर CJP की National Working Committee में आपका नाम क्यों नहीं है? इस सवाल पर जुनैद बोले कि वो फर्स्ट लेयर की लिस्ट है. यानी जुनैद को दूसरी लिस्ट में अपना नाम आने की उम्मीद है. हालांकि, जुनैद ने आगे कहा, 'मुझे किसी पद की लालसा नहीं है. मैं काम करना जारी रखूंगा.'
मोहम्मद जुनैद ने आगे उम्मीद जताई कि जंतर-मंतर प्रोटेस्ट की तरह छात्रों का प्रदर्शन यहां भी सफल होगा, यानी जेपीएससी और जेएसएससी भर्ती परीक्षाओं से जुड़ी मांगें मानी जाएंगी. उन्होंने कहा, 'दिल्ली में तानाशाह सरकार झुक गई तो झारखंड सरकार क्या है. हम लोग भाषा-धर्म-जाति के आधार पर न जंतर-मंतर पर बंटे थे, न यहां बंटेंगे.'