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'दगाबाज दोस्त'... सऊदी की लाज रखने में फेल रहा PAK, हूती हर ओर से कर रहे हमले

पाकिस्तान सऊदी अरब की रक्षा के वादे बार-बार दोहराता रहा है लेकिन 2015 से लेकर 2026 तक हूती हमलों के खिलाफ सामने की लड़ाई में पूरी तरह शामिल नहीं हुआ है. शाहबाज और मुनीर की जुबानी मदद के बावजूद प्रैक्टिकल मदद अधूरी रही है.

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हूतियों के खिलाफ सऊदी की मदद करने को लेकर पाकिस्तान सिर्फ जुबानी बमबारी कर रहा है. (Photo: ITG)
हूतियों के खिलाफ सऊदी की मदद करने को लेकर पाकिस्तान सिर्फ जुबानी बमबारी कर रहा है. (Photo: ITG)

पाकिस्तान और सऊदी अरब के रिश्ते दशकों पुराने हैं. दोनों देश धार्मिक, आर्थिक और सैन्य स्तर पर एक-दूसरे के करीब रहे हैं. 1967 में दोनों के बीच पहला सुरक्षा सहयोग समझौता हुआ. 1979 में मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर हमले के बाद पाकिस्तानी विशेष बलों ने सऊदी को मदद दी. 1982 के प्रोटोकॉल समझौते के तहत हजारों पाकिस्तानी सैनिक सऊदी में तैनात किए गए. 

1980 और 1990 के दशक में कभी-कभी 13,000 से 15,000 तक सैनिक वहां मौजूद रहे. खाड़ी युद्ध के दौरान भी पाकिस्तानी फौज ने सऊदी की सीमाओं और पवित्र स्थलों की रक्षा में हिस्सा लिया. प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास और सलाहकार भूमिका लगातार चलती रही. सऊदी ने आर्थिक मदद से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को सहारा दिया तो पाकिस्तान ने सैन्य विशेषज्ञता दी. यही रिश्ता बाद में औपचारिक रक्षा समझौतों में बदला.

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2015 का यमन संकट और पाकिस्तान का स्पष्ट इनकार

मार्च 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू हुआ. सऊदी ने पाकिस्तान से जहाज, विमान और जमीनी सैनिक भेजने की मांग की. पाकिस्तान सरकार ने शुरुआत में सकारात्मक संकेत दिए लेकिन 6 से 10 अप्रैल 2015 तक संसद में लंबी बहस चली. 

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10 अप्रैल 2015 को संयुक्त सत्र में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास हुआ कि पाकिस्तान यमन संघर्ष में तटस्थ रहेगा ताकि कूटनीतिक भूमिका निभा सके. साथ ही कहा गया कि अगर सऊदी की क्षेत्रीय अखंडता या मक्का-मदीना जैसे पवित्र स्थलों को खतरा हुआ तो पाकिस्तान कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहेगा. 

Houthi attacks Saudi

यह फैसला सऊदी की उम्मीदों पर पानी फेरने वाला साबित हुआ. पाकिस्तान ने व्यावहारिक सैन्य मदद नहीं दी जबकि बयानबाजी में समर्थन जारी रखा. यह पहला बड़ा उदाहरण था जब वादे और अमल में अंतर साफ दिखा.

2025-2026 के नए रक्षा समझौते और बड़े वादे

17 सितंबर 2025 को रियाद में प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए. इसमें कहा गया कि किसी एक पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा. 7 अगस्त 2026 को मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट साइन हुआ. इसमें सामूहिक रक्षा का नियम है. 

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5 अक्टूबर 2026 को रियाद में आपात बैठक हुई जिसमें तीनों देशों ने सैन्य बलों और क्षमताओं की त्वरित तैनाती का फैसला लिया. रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान सऊदी की रक्षा के लिए उपलब्ध हर साधन इस्तेमाल करेगा. ISPR प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने 18 सितंबर 2026 के आसपास कहा कि पाकिस्तान सऊदी की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाएगा और यह प्रतिबद्धता बिना शर्त है. 

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शाहबाज शरीफ ने जुलाई 2026 में हूती हमलों के बाद क्राउन प्रिंस से बात कर पूरी एकजुटता जताई. सितंबर और अक्टूबर 2026 में भी बार-बार बयान आए कि पाकिस्तान कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है.

Houthi attacks Saudi

हूती हमलों का बढ़ता सिलसिला और पाकिस्तान  

2026 में हूती हमले तेज हुए. जुलाई 2026 में लाल सागर में सऊदी तेल टैंकरों पर हमले हुए. सितंबर 2026 में नागरिक और ऊर्जा सुविधाओं पर हमले में दर्जनों घायल हुए. अक्टूबर 2026 में रियाद एयरपोर्ट और अन्य जगहों पर हमलों में मौतें और सैकड़ों घायल हुए. 

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय, प्रधानमंत्री और सैन्य प्रवक्ता ने इन हमलों की निंदा की. 9 और 11 अक्टूबर 2026 को शाहबाज शरीफ ने बयान दिए कि पाकिस्तान सऊदी की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा के प्रति दृढ़ है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी पाकिस्तान ने सऊदी का समर्थन दोहराया. लेकिन हर बार जोर इस बात पर रहा कि मदद रक्षात्मक होगी.

सैन्य तैनाती के आंकड़े और वास्तविक भूमिका

पाकिस्तानी सैनिक दशकों से सऊदी में मौजूद हैं. 2026 में रिपोर्ट्स के अनुसार लगभग 8,000 सैनिक, एक स्क्वाड्रन जेएफ-17 लड़ाकू विमान (करीब 16), ड्रोन स्क्वॉड्रन और चीनी एचक्यू-9 एयर डिफेंस सिस्टम भेजे गए. कुछ रिपोर्ट्स में यह संख्या 15,000 या उससे ज्यादा बताई गई. सऊदी इन खर्चों का वहन करता है. 

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लेफ्टिनेंट जनरल चौधरी ने अक्टूबर 2026 में सीएनएन को बताया कि पाकिस्तानी फौजें पहले से कई क्षमताओं में मौजूद हैं. रक्षा मंत्री आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान और तुर्की की भूमिका सहायक है- खुफिया और निगरानी जैसी, जबकि लड़ाई मुख्य रूप से सऊदी फौजें लड़ रही हैं. 

पाकिस्तान ने साफ कहा कि सैनिक यमन में प्रवेश नहीं करेंगे. वे सिर्फ सऊदी क्षेत्र की रक्षा करेंगे. न्यूयॉर्क टाइम्स जैसी रिपोर्ट्स में पाकिस्तानी जेट्स के इस्तेमाल का जिक्र आया लेकिन पाकिस्तान ने उसे खारिज कर दिया.

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अधूरी मदद के आरोप 

2015 में संसद ने तटस्थता का रास्ता चुना. 2025-2026 में बड़े-बड़े समझौते हुए और बयानबाजी तेज हुई लेकिन व्यावहारिक लड़ाई में पाकिस्तान ने सीमा खींच रखी. हूती हमले जारी हैं, सऊदी पर दबाव बढ़ रहा है फिर भी पाकिस्तान की भूमिका सलाहकार, प्रशिक्षण और अंदरूनी रक्षा तक सीमित दिखती है. 

शाहबाज शरीफ और आसिम मुनीर की तरफ से बार-बार 'कंधे से कंधा' और 'किसी भी हद तक' जैसे शब्द आए लेकिन यमन में सक्रिय लड़ाई या आक्रामक भूमिका से परहेज साफ है. आर्थिक निर्भरता, भारत सीमा पर सुरक्षा चिंताएं और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की मजबूरी पाकिस्तान को आगे बढ़ने से रोकती है. 

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सऊदी को उम्मीद थी कि पुराने रिश्ते और नए समझौते ठोस सैन्य समर्थन देंगे लेकिन अब तक मदद अधूरी नजर आती है. बयानबाजी जोरदार है लेकिन मैदान में पूरी प्रतिबद्धता दिखाई नहीं दे रही. यह स्थिति दोनों देशों के रिश्ते में विश्वास के सवाल खड़े करती है.

पाकिस्तान-सऊदी संबंध मजबूत बने हुए हैं लेकिन सुरक्षा सहयोग में वादे और अमल का अंतर बार-बार उभरता रहा है. 2015 का तटस्थता वाला फैसला और 2026 में रक्षात्मक सीमाएं दिखाती हैं कि पाकिस्तान बड़े संघर्ष में पूरी तरह कूदने से बचता है. हूती खतरा बढ़ रहा है तो सऊदी को और ठोस सहयोग की जरूरत है. 

पाकिस्तान को अपने आर्थिक हितों, सैन्य क्षमताओं और क्षेत्रीय राजनीति के बीच संतुलन बनाना होगा. अगर सिर्फ जुबानी बमबारी जारी रही तो पुराने दोस्त की लाज रखने का दावा कमजोर पड़ता रहेगा. दोनों देशों को व्यावहारिक सहयोग बढ़ाने की जरूरत है ताकि वादे सिर्फ कागजी न रह जाएं.

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