भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. DRDO द्वारा विकसित लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल (LR-AShM) या LRHM हाइपरसोनिक मिसाइल को 2027 से 2029 के बीच सेवा में शामिल करने की योजना है. इस मिसाइल की रेंज लगभग 1500 किलोमीटर है. यह हाइपरसोनिक स्पीड पर टारगेट को भेद सकती है. शुरुआती उत्पादन दर 10 से 15 यूनिट प्रति वर्ष रहेगी, जो बाद में बढ़ाकर 25 से 40 यूनिट तक पहुंच सकती है.
LR-AShM एक बूस्ट-ग्लाइड हाइपरसोनिक मिसाइल है. यह दो स्टेज वाले सॉलिड रॉकेट मोटर से लॉन्च होती है और फिर हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल के रूप में लक्ष्य की ओर बढ़ती है. इसकी अधिकतम स्पीड 12348 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है. 1500 किलोमीटर की दूरी तय करने में इसे करीब 15 मिनट लग सकते हैं. यह स्थिर और गतिशील दोनों तरह के लक्ष्यों को निशाना बना सकती है, खासकर दुश्मन के युद्धपोतों को.
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मिसाइल की उड़ान पथ जटिल और अनिश्चित होता है, जिससे दुश्मन के रडार और इंटरसेप्शन सिस्टम को इसे रोकना मुश्किल हो जाता है. यह भारतीय नौसेना की तटीय बैटरियों के लिए विकसित की जा रही है, लेकिन भविष्य में जहाज और हवा से लॉन्च होने वाले संस्करण भी संभव हैं. स्वदेशी सेंसर और एवियोनिक्स सिस्टम इसकी सटीकता बढ़ाते हैं.
विकास और परीक्षण की प्रगति
DRDO ने इस मिसाइल के कई सफल परीक्षण किए हैं. ओडिशा तट पर हुए परीक्षणों में 1500 किलोमीटर की रेंज और टर्मिनल गाइडेंस की पुष्टि हुई है. गणतंत्र दिवस परेड में भी प्रदर्शन हो चुका है. अब यह सीरियल प्रोडक्शन चरण में प्रवेश कर चुकी है. उपयोगकर्ता मूल्यांकन परीक्षणों के बाद इसे सशस्त्र बलों में शामिल किया जाएगा.
यह विकास भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा है. हाइपरसोनिक तकनीक में महारत हासिल करना अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों की कतार में भारत को खड़ा करता है. हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सुरक्षा के लिए यह मिसाइल गेम चेंजर साबित हो सकती है.
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पारंपरिक एंटी-शिप मिसाइलों की तुलना में इसकी रेंज और स्पीड कहीं ज्यादा है. ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइलों से आगे बढ़कर यह दुश्मन के विमान वाहक और बड़े युद्धपोतों को दूर से ही नष्ट करने की क्षमता देगी. इससे भारत की समुद्री शक्ति और प्रतिरोधक क्षमता में बड़ा इजाफा होगा.
उत्पादन दर धीरे-धीरे बढ़ाने की योजना से यह सुनिश्चित होगा कि पर्याप्त संख्या में मिसाइलें उपलब्ध हों. शुरुआती 10-15 यूनिट से शुरू करके बाद में 25-40 तक पहुंचने से भारतीय नौसेना की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा.
चुनौतियां और आगे की राह
हाइपरसोनिक मिसाइल का विकास जटिल और महंगा होता है. गर्मी प्रतिरोधी सामग्री, सटीक मार्गदर्शन और विश्वसनीय प्रणोदन सिस्टम चुनौतीपूर्ण हैं. लेकिन DRDO की प्रगति उम्मीद जगाती है. भविष्य में इसकी रेंज 3000 किलोमीटर तक बढ़ाने के भी प्रयास चल रहे हैं.
यह मिसाइल न सिर्फ नौसेना बल्कि थल सेना और वायु सेना के लिए भी संस्करण विकसित किए जा सकते हैं. कुल मिलाकर LR-AShM भारत की रक्षा आधुनिकीकरण की दिशा में एक मजबूत कदम है. 2027-2029 तक इसके शामिल होने से देश की सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत होगी.