मिडिल ईस्ट में जारी भू-राजनीतिक तनाव अब एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है. यमन के ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के प्रमुख तेल प्रतिष्ठानों, इंटरनेशनल एयरपोर्ट और सैन्य ठिकानों पर हाल ही में किए गए भीषण ड्रोन और मिसाइल हमलों ने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया है.
इन हमलों के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने स्पष्ट कर दिया है कि 'मक्का रक्षा समझौते' के तहत यदि सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता पर कोई खतरा उत्पन्न होता है, तो इसे पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा. इस्लामाबाद अपनी सामूहिक रक्षा समझौतों को पूरा करने से पीछे नहीं हटेगा.
यह भी पढ़ें: अपने-आप फट गया टैंक, बांग्लादेश में दो सैनिकों की युद्धाभ्यास के दौरान मौत, Video
इस बयान के बाद यह बहस तेज हो गई है कि पाकिस्तान यमन में हूतियों के ठिकानों पर किस तरह का हमला कर सकता है- क्या वह फाइटर जेट्स से बमबारी करेगा या अपनी लंबी दूरी की मिसाइलों का इस्तेमाल करेगा?
पाकिस्तान और यमन के बीच दूरी और हमले की स्ट्रैटेजी
पाकिस्तान और यमन के बीच की दूरी सबसे महत्वपूर्ण पहलू है. कराची या इस्लामाबाद से यमन के प्रमुख हूती-नियंत्रित इलाकों (जैसे सना, सादा या अदन) की सीधी दूरी करीब 2000 से 2800 KM के बीच है. पाकिस्तान के घरेलू हवाई अड्डों से फाइटर जेट उड़ाना, इतनी दूरी पार करके सीधे यमन में सटीक बमबारी करके सुरक्षित वापस लौटना बेहद कठिन और जोखिम भरा है.

पाकिस्तान वायु सेना (PAF) के पास JF-17 थंडर और F-16 फाइटिंग फाल्कन जैसे एडवांस लड़ाकू विमान हैं, लेकिन हवा में ईंधन भरने की सीमित क्षमताओं के कारण पाकिस्तान से सीधे उड़ान भरकर लंबी दूरी के हमले करना तकनीकी रूप से जटिल है.
इस भौगोलिक चुनौती को देखते हुए सैन्य रणनीतिकारों का मानना है कि यदि पाकिस्तान वायु सेना सीधे हमलों में शामिल होती है, तो वह पाकिस्तान से उड़ान भरने के बजाय सऊदी अरब के हवाई अड्डों का उपयोग करेगी. मक्का रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान अपने JF-17 या F-16 विमानों की स्क्वॉड्रन सऊदी अरब के किंग खालिद एयर बेस या रियाध के पास फॉरवर्ड पोस्ट पर तैनात कर सकता है.
यह भी पढ़ें: इंडियन एयरफोर्स को मिल सकता है AWACS किलर... पाक-चीन की आएगी शामत
सऊदी अरब के जमीनी ठिकानों से उड़ान भरकर पाकिस्तानी वायुसेना यमन के उत्तर-पश्चिमी हिस्से (सादा प्रांत और सना) में हूती विद्रोहियों के कमान सेंटरों, हथियार डिपो और मिसाइल लॉन्चिंग पैड पर प्रिसीशन गाइडेड बम गिरा सकती है. यह रणनीति अमेरिकी और सऊदी गठबंधन द्वारा पहले अपनाए गए तरीकों जैसी ही होगी, जिससे विमानों को ईंधन की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा.

मिसाइलों से हमला सबसे ज्यादा संभावित ऑप्शन
दूसरा और सबसे घातक सैन्य विकल्प मिसाइल स्ट्राइक का है. पाकिस्तान के पास एक बेहद एडवांस और विशाल बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइल का भंडार है. यदि रणनीतिक कमांड यमन में हूतियों के मजबूत ठिकानों को बिना मानवीय नुकसान के नष्ट करना चाहती है, तो वह बाबर सीरीज की क्रूज मिसाइलों या शाहीन और गजनवी बैलिस्टिक मिसाइलों का सहारा ले सकती है.
बाबर क्रूज मिसाइल अपनी लो-एल्टीट्यूड फ्लाइंग क्षमता और जीपीएस/इनेरशियल नेविगेशन सिस्टम के कारण दुश्मन के रडार को चकमा देकर यमन में हूती ठिकानों को सटीक निशाना बना सकती है. अरब सागर में तैनात पाकिस्तान नौसेना के युद्धपोतों या अगोस्ता 90B पनडुब्बियों से दागी जाने वाली क्रूज मिसाइलें भी दागी जा सकती हैं, जिससे बिना वायु सेना भेजे यमन में जमीनी बुनियादी ढांचे को नष्ट किया जा सकता है.
यह भी पढ़ें: तीनों सेनाओं के लिए बड़ी सौगात, 1.10 लाख करोड़ के हथियारों को हरी झंडी
इस तरह की प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई के गहरे राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव भी होंगे. यमन में हूती विद्रोहियों को सीधे निशाना बनाने से पाकिस्तान का ईरान के साथ कूटनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है, क्योंकि ईरान हूती समूह का मुख्य समर्थक माना जाता है.
यही कारण है कि पाकिस्तान रणनीतिक रूप से दोहरे रास्ते पर चल रहा है- एक तरफ वह ईरान को हूतियों पर नियंत्रण पाने की चेतावनी दे रहा है, तो दूसरी तरफ सऊदी अरब को रक्षात्मक बैकअप, खुफिया जानकारी, रडार निगरानी और लॉजिस्टिक्स सहायता प्रदान कर रहा है.

अरब सागर और अदन की खाड़ी के पास नौसैनिक नाकेबंदी करके हूतियों तक पहुंचने वाली हथियारों की आपूर्ति श्रृंखला को काटना भी पाकिस्तान की नौसेना रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा बन सकता है.
यमन में हूतियों के खिलाफ पाकिस्तान की कार्रवाई की रूपरेखा इस बात पर निर्भर करेगी कि सऊदी अरब पर हमले कितने भीषण होते हैं. यदि संघर्ष व्यापक रूप धारण करता है, तो पाकिस्तान मुख्य रूप से सऊदी भूमि पर अपने फाइटर जेट तैनात करके हवाई बमबारी करेगा.
लंबी दूरी के लक्ष्यों के लिए नौसैनिक या जमीनी क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल करेगा. यह कदम न केवल मक्का रक्षा समझौते की पहली बड़ी परीक्षा साबित होगा, बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट और दक्षिण एशिया के सैन्य संतुलन को भी नया आकार देगा.