बिहार में सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने की बात लगातार हो रही है. नई बिल्डिंग, स्मार्ट क्लास और बेहतर सुविधाओं के दावे किए जा रहे हैं. लेकिन आजतक की टीम जब सहरसा, पश्चिम चंपारण, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर और कैमूर के सरकारी स्कूलों तक पहुंची, तो तस्वीर कुछ और ही मिली.
कई स्कूल आज भी अपनी इमारत का इंतजार कर रहे हैं. कहीं बच्चे झोपड़ी में पढ़ रहे हैं, कहीं पेड़ के नीचे, कहीं टिन शेड में तो कहीं एक ही कमरे में कई क्लासेज की पढ़ाई चल रही है.
सहरसा में प्राथमिक विद्यालय की पूरी पढ़ाई कहीं झोपड़ी के नीचे तो कहीं पेड़ के नीचे चल रही है. पश्चिम चंपारण के बगहा में पहली कक्षा आज भी पेड़ के नीचे लगती है. बेगूसराय में एक कमरे और बरामदे में पूरा स्कूल सिमटा हुआ है.
टिन शेड में पढ़ रहे 200 से ज्यादा
मुजफ्फरपुर में भी दो कमरों और एक जर्जर टिन शेड में 200 से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं, जबकि कैमूर में जर्जर भवन और कमरों की कमी के बीच कई क्लासेज का संचालन एक साथ करना पड़ रहा है. ये तस्वीरें अलग-अलग जिलों की जरूर हैं, लेकिन इनकी कहानी लगभग एक जैसी है.
आजतक की टीम ने सहरसा, पश्चिम चंपारण, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर और कैमूर के सरकारी स्कूलों का दौरा किया. ग्राउंड पर जो जमीनी हकीकत सामने आए है, उसने ये सवाल जरूर खड़ा किया कि जिन स्कूलों में अब भी भवन, शौचालय, पीने के पानी और पर्याप्त कमरों जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, वहां पढ़ने वाले बच्चों तक शिक्षा सुधार की योजनाओं का लाभ आखिर कब पहुंचेगा.
सहरसा
सोनबरसा प्रखंड के मैना पट्टी और झिटकिया गांव के दो प्राथमिक विद्यालयों की तस्वीर बताती है कि भवन की कमी आज भी बड़ी समस्या बनी हुई है. मैना पट्टी गांव का प्राथमिक विद्यालय पूरी तरह एक झोपड़ी में चलता है. पहली से पांचवीं तक की सभी कक्षाएं इसी झोपड़ी में लगती हैं.
इस स्कूल में 55 बच्चों का नामांकन है और पांच शिक्षक तैनात हैं. बैठने के लिए सिर्फ नौ बेंच हैं. पहली से चौथी तक दो-दो बेंच और पांचवीं के लिए सिर्फ एक बेंच है. स्कूल में शौचालय नहीं है. लाइब्रेरी नहीं है. पीने के पानी की भी कोई व्यवस्था नहीं है. प्रधानाध्यापिका कुमारी रंजन बताती हैं कि टीचर अपने घर से पानी लेकर आते हैं.
बरसात में झोपड़ी की छत टपकने लगती है और कई बार पढ़ाई रोकनी पड़ती है. टीचरों के बैठने के लिए भी अलग कमरा नहीं है. भवन निर्माण के लिए कई बार जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग को पत्र भेजे गए, लेकिन अब तक कोई काम शुरू नहीं हुआ.
यहीं एक और तस्वीर सामने आई. स्कूल में उर्दू टीचर मोहम्मद शाहजहां की नियुक्ति है, लेकिन एक भी उर्दू का छात्र का एडमिशन नहीं हुआ है. ऐसे में वो हिंदी, गणित, पर्यावरण अध्ययन और दूसरे विषय पढ़ाते हैं ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो.
सोनबरसा के ही झिटकिया गांव का प्राथमिक विद्यालय साल 2007 में शुरू हुआ था. करीब 20 साल बाद भी स्कूल का अपना भवन नहीं बन पाया है. पहली और दूसरी कक्षा के बच्चे पेड़ के नीचे बैठते हैं. तीसरी से पांचवीं तक की कक्षाएं गांव के स्थानीय निवासी काशी बाबू की जमीन पर बने अस्थायी ढांचे में चलती हैं. स्कूल में 91 बच्चों का नामांकन है और चार टीचर हैं.
टीचर रीता देवी बताती हैं कि भवन निर्माण के लिए कई बार आवेदन दिए गए. अधिकारी भी आए, लेकिन आज तक कोई स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी. स्कूल के हैंडपंप के पानी में आयरन की मात्रा ज्यादा है, इसलिए उसका पानी पीने योग्य नहीं माना जाता. प्रधानाध्यापक का दफ्तर भी एक छोटे से स्टोर रूम में चलता है. बरसात के दिनों में पढ़ाई सबसे ज्यादा प्रभावित होती है.
पश्चिमी चंपारन
देवरिया तरुअनवा पंचायत का कुनई लक्ष्मीपुर राजकीय प्राथमिक विद्यालय पिछले 14 सालों से भवन का इंतजार कर रहा है. पुराना भवन जर्जर होने के बाद गांव के एक व्यक्ति ने स्कूल के लिए जमीन दान दी. इसके बाद भी नया भवन नहीं बन सका. आखिरकार ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर चार कमरों का टिन शेड तैयार कराया.
आज दूसरी से पांचवीं तक की कक्षाएं उसी टिन शेड में चलती हैं, जबकि पहली कक्षा पेड़ के नीचे लगती है. स्कूल में 106 बच्चे और छह टीचर हैं. रसोईघर नहीं होने के कारण मिड-डे मील के लिए बच्चों को करीब एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. गर्मी में टिन शेड तपता है और बारिश के समय पढ़ाई अक्सर रुक जाती है.
मटिहानी प्रखंड का नवसृजित प्राथमिक विद्यालय, धोबी टोल एक सामुदायिक भवन के एक कमरे और एक बरामदे में चलता है. 112 बच्चों की पढ़ाई इसी सीमित जगह में होती है. पहली और दूसरी कक्षा बरामदे में चलती है. तीसरी, चौथी और पांचवीं कक्षा एक ही कमरे में बैठती हैं.
एक ही ब्लैकबोर्ड पर दो टीचर्स अलग-अलग कक्षाओं को पढ़ाती हैं. बच्चों के बैठने के लिए बेंच नहीं हैं. स्कूल में चापाकल और शौचालय भी नहीं है. पांच महिला टीचर्स को शौचालय के लिए आसपास के घरों का सहारा लेना पड़ता है.
मुजफ्फरपुर
भवनविहीन मध्य विद्यालय नई तालीम में पहली से आठवीं तक 228 से ज्यादा बच्चों का नामांकन है. पूरे स्कूल के लिए सिर्फ दो कमरे और एक जर्जर टिन शेड है. पहली से पांचवीं तक की कक्षाएं एक कमरे में चलती हैं. छठी, सातवीं और आठवीं के छात्र टिन शेड के नीचे पढ़ते हैं. स्कूल में बेंच-डेस्क नहीं हैं. बच्चे दरी पर बैठते हैं.
बारिश में टिन शेड से पानी टपकता है और तेज हवा चलने पर ब्लैकबोर्ड गिरने का खतरा बना रहता है. कई कक्षाएं एक साथ चलने से पढ़ाई भी प्रभावित होती है.
कैमूर
अखलासपुर प्राथमिक विद्यालय में 99 बच्चों के लिए सिर्फ तीन टीचर हैं. स्कूल के तीन कमरों में से दो जर्जर हैं. टीचरों के मुताबिक कुछ समय पहले छत से प्लास्टर गिरने से एक शिक्षक और एक छात्र घायल हो गए थे. कमरों की कमी के कारण पहली, दूसरी और तीसरी कक्षा बरामदे में चलती है, जबकि चौथी और पांचवीं एक ही कमरे में पढ़ती हैं. टीचर्स का कहना है कि इस व्यवस्था में सभी बच्चों पर बराबर ध्यान देना आसान नहीं होता.
इन पांच जिलों के स्कूलों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन दिक्कतें लगभग एक जैसी हैं. कहीं भवन नहीं है, कहीं जर्जर है. कहीं पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है तो कहीं शौचालय नहीं. कई जगह एक ही कमरे में कई कक्षाएं चल रही हैं और बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ना पड़ रहा है.
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टीचर्स का कहना है कि भवन और दूसरी सुविधाओं के लिए कई बार विभाग को पत्र भेजे गए हैं. कुछ गांवों में लोगों ने अपनी तरफ से जमीन दी, कहीं चंदा जुटाकर अस्थायी ढांचा तैयार किया, लेकिन स्थायी समाधान अब तक सरकार की तरफ से नहीं हुआ है. इन स्कूलों की तस्वीर यही बताती है कि शिक्षा की गुणवत्ता की चर्चा के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं की कमी पर भी उतना ही ध्यान देने की जरूरत है.
दूसरी तरफ पिछले सप्ताह बिहार सरकार ने एक बार फिर नए सिरे से जिला शिक्षा पदाधिकारी को पत्र लिखकर भवनहीन स्कूलों की लिस्ट मांगी है. इसका मकसद स्कूलों के भवन बनाना है, हालांकि ये कब तक मुमकिन होगा ये कहना मुश्किल है.