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भयानक... नेपाल की बाढ़ में इतना मलबा आया कि उससे 40 पिरामिड बन जाएं

नेपाल में 26 अगस्त को लांगटांग लिरुंग से लगभग 40 गीजा पिरामिड जितनी चट्टान और बर्फ गिरने से भीषण मलबा बहा. इसमें 1300 से अधिक लोग मारे गए. जलवायु परिवर्तन से पहाड़ों में ऐसे खतरे बढ़ रहे हैं.

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नेपाल के नुवाकोट जिले के देवीघाट इलाके में पहाड़ों से आए मलबे पर सोता एक कुत्ता. (File Photo: Reuters)
नेपाल के नुवाकोट जिले के देवीघाट इलाके में पहाड़ों से आए मलबे पर सोता एक कुत्ता. (File Photo: Reuters)

नेपाल में 26 अगस्त को आई बाढ़ में बहे मलबे ने तबाही मचा दी. इसमें 1300 से अधिक लोग मारे गए. हजारों अब भी लापता हैं. इस घटना की भयावहता ने क्षेत्र के भूवैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया. काठमांडू के त्रिभुवन विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक रंजन दहल कहते हैं कि पीड़ितों का दर्द और बर्बाद हुए गांव देखकर विश्वास करना मुश्किल है. 

सैटेलाइट इमेज से पता चला कि लांगटांग लिरुंग पहाड़ से चट्टान और बर्फ का विशाल खंड गिरने से यह मलबा बहना शुरू हुआ. यह तेज धारा 160 से 190 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार से नीचे की ओर बढ़ी. रास्ते में कई गांवों को तबाह कर दिया. वैज्ञानिकों के अनुसार गिरी हुई चट्टान और बर्फ का मास लगभग 11 करोड़ घन मीटर था. ये इतना था कि इससे गीजा के 40 पिरामिड बन जाते. 

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इस आपदा की उत्पत्ति को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने कई वजहों का एनालिसिस किया है. शुरुआत में कुछ लोगों ने सोचा कि किसी ग्लेशियर के ढहने से हुआ होगा. लेकिन सैटेलाइट तस्वीरों से साफ हुआ कि पहाड़ के उत्तरी हिस्से में करीब 5150 मीटर ऊंचाई पर लगभग 2.2 वर्ग किलोमीटर चौड़ा चट्टानी स्लैब टूटकर नीचे गिर गया. 

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इस घटना में जलवायु परिवर्तन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इंसानों द्वारा पैदा की गई ग्लोबल वार्मिंग पहाड़ों को जोड़ने वाली बर्फ को पिघला रही है. ग्लेशियोलॉजिस्ट उल्याना पेना के अनुसार यह समस्या सिर्फ नेपाल तक सीमित नहीं है. पूरी दुनिया में ऊंचे पहाड़ टूट रहे हैं.

Nepal debris flow

चट्टान क्यों टूटी: भूकंप, पर्माफ्रॉस्ट और गर्मी का योगदान

वैज्ञानिकों का मानना है कि कई कारणों ने मिलकर इस चट्टान को तोड़ा. 2015 में आए 7.8 तीव्रता के गोरखा भूकंप ने लांगटांग लिरुंग की चट्टानों को कमजोर किया हो सकता है. उस भूकंप से पहले भी यहां भूस्खलन हुआ था जिसमें लगभग 200 लोग मारे गए थे. इसके अलावा जलवायु गर्म होने से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पर्माफ्रॉस्ट यानी स्थाई बर्फ नरम पड़ रही है. 

पर्माफ्रॉस्ट हजारों सालों से चट्टानों, मिट्टी और ग्लेशियरों को जोड़कर रखती थी. लेकिन ग्लोबल वार्मिंग से यह मक्खन की तरह नरम हो गई है. विश्व मौसम एट्रिब्यूशन की 17 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र में तापमान करीब 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, जो दुनिया के औसत से कहीं ज्यादा है.

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घटना से ठीक पहले का मौसम भी असामान्य रूप से गर्म था. 24-25 अगस्त को उस ऊंचाई पर औसत तापमान करीब 5 डिग्री सेल्सियस रहा और अधिकतम तापमान 10 डिग्री से ऊपर चला गया. जबकि सामान्य रूप से इस समय औसत 2.7 डिग्री और अधिकतम 6 डिग्री से ज्यादा नहीं जाता. 

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ग्लेशियर भी 2010 से 2026 के बीच 300 मीटर से अधिक पीछे हट चुका है, जिससे चट्टान पर दबाव बदल गया. पिघले पानी ने चट्टान की दरारों में घुसकर उन्हें और चौड़ा किया. कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि यह पानी चट्टान को रासायनिक रूप से कमजोर भी कर रहा था.

कमजोर चट्टान और मलबे का तेज बहाव

इस पहाड़ की चट्टानें मूल रूप से मिट्टी और रेत की परतों से बनी थीं, जो बाद में गर्मी और दबाव से बदल गईं. इनमें कमजोर परतें बनी रहीं, जिससे गिरते समय चट्टान आसानी से टूट-टूटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गई. इन टुकड़ों के आपसी टकराव से बर्फ पिघलकर पानी बन गई और ठोस मलबा तरल धारा में बदल गया. 

Nepal debris flow

यह धारा नीचे नदी घाटी में और अधिक पानी तथा मिट्टी समेटते हुए और तेज हो गई. 2021 में भारत के चमोली में भी इसी तरह की चट्टानी-बर्फीली हिमस्खलन से मलबा प्रवाह हुआ था जिसमें 200 से अधिक लोग मारे गए या लापता हो गए.

अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ता खतरा

यह खतरा सिर्फ नेपाल तक सीमित नहीं है. हिमालय के कई हिस्सों में जहां टूटी-फूटी चट्टानें, ग्लेशियर और खड़ी ढलानें हैं, वहां ऐसी घटना दोबारा हो सकती है. जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर पिघलने से ग्लेशियल झीलें भी बढ़ रही हैं. ये झीलें अचानक फट सकती हैं और बाढ़ ला सकती हैं. 

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1990 के बाद से ऐसी झीलों की संख्या बढ़ी है. 1.5 करोड़ लोग इनके खतरे वाले क्षेत्र में रहते हैं. एंडीज पर्वत में भी ग्लेशियल झीलें दोगुनी हो गई हैं. पेरू की कॉर्डिलेरा ब्लैंका में 1941 में ऐसी बाढ़ ने हजारों लोगों की जान ली थी. यूरोपीय आल्प्स में भी पिछले साल स्विट्जरलैंड में इसी तरह की घटना हुई.

नेपाल के वैज्ञानिक रंजन दहल कहते हैं कि हिमालय में भविष्य में फिर ऐसी आपदा आ सकती है. वे अंतरराष्ट्रीय सहयोग से शुरुआती चेतावनी प्रणालियां लगाने की अपील करते हैं ताकि जानें बचाई जा सकें. जलवायु परिवर्तन के कारण ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में हिमस्खलन, मलबा प्रवाह और ग्लेशियल बाढ़ जैसे खतरे लगातार बढ़ रहे हैं. समय रहते वैज्ञानिक अध्ययन, बेहतर मैपिंग और चेतावनी व्यवस्थाओं पर ध्यान देना जरूरी है.

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