Hindu Dharam: वर्तमान समय में दुनिया भर में उथल-पुथल, युद्ध के माहौल, प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन को देखकर अक्सर यह सवाल मन में आ रहा है कि क्या कलयुग का अंत निकट है? दुनिया का पूर्ण विनाश भले ही न हो, लेकिन मानव जाति के सामने गंभीर संकट मंडरा रहे हैं. सनातन ग्रंथों और भविष्यवाणियों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि कैसे कलयुग के चरम पर पहुंचने के बाद एक महापरिवर्तन आएगा और सतयुग की पुनः स्थापना होगी. श्रीमद्भागवत पुराण और ओडिशा की प्रसिद्ध 'भविष्य मालिका' में युग परिवर्तन को लेकर कुछ बेहद चौंकाने वाले और गहरे संकेत दिए गए हैं. आइए जानते हैं कि ग्रंथों के अनुसार सतयुग की शुरुआत कब और किन खास संयोगों के तहत होगी.
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार सतयुग की शुरुआत का योग
श्रीमद्भागवत पुराण के 12वें स्कंध (अध्याय 2, श्लोक 24) में खगोलीय और ग्रह-नक्षत्रों के एक दुर्लभ संयोग का जिक्र किया गया है:
“यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्यबृहस्पती।
एकराशौ समेष्यन्ति तदा भवति तत्कृतम्॥”
इसका अर्थ है कि जब सूर्य, चंद्रमा और गुरु (बृहस्पति)- ये तीनों ग्रह एक साथ 'तिष्य' यानी पुष्य नक्षत्र और एक ही राशि (कर्क राशि) में प्रवेश करेंगे, तब 'कृतयुग' यानी सत्ययुग का आरंभ होगा. चूंकि पुष्य नक्षत्र का आधिपत्य गुरु ग्रह के पास है और यह कर्क राशि के अंतर्गत आता है, इसलिए तीनों का यह मिलन बिंदु युग परिवर्तन का आधार बनता है. खगोलीय गणनाओं के अनुसार, इस तरह के दुर्लभ संयोग भविष्य में साल 2038 के आसपास अपनी पूर्णता के करीब देखे जा रहे हैं.
भविष्य मालिका और महागुप्त पद्मकल्प के डरावने संकेत
संत अच्युतानंद दास द्वारा रचित 'भविष्य मालिका' में युग के अंतिम चरण और महाप्रलय को लेकर बहुत ही बारीक भविष्यवाणियां की गई हैं:
“वैशाख शुक्ल पक्ष अष्टमी गुरुवार दिने, सेहि दिन कलयुग होइब संपूर्णे...”
ग्रंथ के मुताबिक, जब वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि और गुरुवार का संयोग बनेगा, तब कलि युग का चक्र अपनी पूर्णता को प्राप्त करेगा. इस विशेष दिन पर दुनिया में अभूतपूर्व और चमत्कारी घटनाएं घटित होंगी. मान्यताओं के अनुसार, यह विशेष कालखंड आने वाले वर्षों की तरफ इशारा करता है, जिसके बाद से दुनिया में बहुत तेजी से बदलाव देखने को मिल सकते हैं.
महाप्रलय और पृथ्वी पर जन-नुकसान की आशंका
भविष्य मालिका में यह भी चेताया गया है कि जब इस महापरिवर्तन का दौर अपने चरम पर होगा, तब प्रकृति का भयंकर कोप देखने को मिलेगा. उस दौरान 'उनचास मरुत' यानी 49 प्रकार की बेहद विनाशकारी और प्रचंड आंधी-तूफान चलेंगी. इन भयंकर प्राकृतिक आपदाओं और युद्धों के आघात से पृथ्वी का वह हिस्सा भी डगमगा जाएगा जिसे अटल माना जाता है. दावों के अनुसार, इस महाविनाश और उथल-पुथल की वजह से पृथ्वी की कुल आबादी का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो सकता है और केवल एक चौथाई हिस्सा ही सुरक्षित बच पाएगा, जो आगे चलकर नए और पवित्र युग यानी सतयुग की नींव रखेगा.
भगवान कल्कि का अवतार और धर्म की पुनर्स्थापना
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब धरती पर पाप, अन्याय और अधर्म अपनी सीमा लांघ जाएगा, तब भगवान विष्णु अपने 'कल्कि अवतार' के रूप में प्रकट होंगे. वे अस्त्र-शस्त्र धारण कर कलयुग के समस्त दुष्टों और अधर्मियों का संहार करेंगे. उनके प्रकट होने के साथ ही नकारात्मकता का अंधकार हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा और पृथ्वी पर पुनः सत्य, शांति, और भाईचारे पर आधारित 'सतयुग' का स्वर्णिम काल शुरू होगा.