किसी समय FOMO यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट को केवल सोशल मीडिया की बीमारी माना जाता था.लोग डरते थे कि कहीं वे किसी ट्रेंड, पार्टी या अवसर से पीछे न रह जाएं. लेकिन अब यह मनोविज्ञान राजनीति और देशों के व्यवहार में भी दिखाई देने लगा है. पड़ोसी देशों में उठने वाले जनआंदोलन, सत्ता परिवर्तन और जेन Z मूवमेंट का असर सीमाओं के भीतर नहीं रुकता. शायद यही वजह है कि पाकिस्तान आज अपने पड़ोस में हो रही हर राजनीतिक हलचल को असामान्य सतर्कता से देख रहा है.
दक्षिण एशिया में पिछले कुछ सालों का इतिहास राजनीतिक ताकतों के लिए बड़ा भयावह रहा है. श्रीलंका में आर्थिक संकट ने जनता को राष्ट्रपति भवन तक पहुंचा दिया. नेपाल में राजशाही से गणतंत्र तक का सफर जनता के दबाव का परिणाम था. बांग्लादेश में छात्र आंदोलन ने वर्षों से मजबूत मानी जा रही सत्ता को चुनौती दी. भारत में भी हाल के महीनों में युवाओं और जेन-ज़ी से जुड़े आंदोलनों ने यह संदेश दिया कि डिजिटल दौर की नई पीढ़ी राजनीतिक रूप से पहले से कहीं अधिक मुखर और संगठित हो सकती है. हर देश की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन इन घटनाओं ने एक साझा संदेश दिया.यदि आर्थिक संकट, राजनीतिक असंतोष और युवाओं की नाराजगी एक साथ मिल जाए, तो कोई भी सत्ता पूरी तरह निश्चिंत नहीं रह सकती.
ऐसे समय में पाकिस्तान के भीतर जो घटनाक्रम सामने आ रहे हैं, वे उसकी चिंताओं को और बढ़ा रहे हैं. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK), बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में लंबे समय से असंतोष के अलग-अलग कारण रहे हैं. हाल के महीनों में विशेष रूप से PoK में विरोध प्रदर्शनों, हिंसा और सुरक्षा बलों की कार्रवाई की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा है. कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने इन घटनाओं पर चिंता व्यक्त की है.
पाकिस्तान की इस आशंका का सबसे स्पष्ट संकेत उसके शीर्ष नेतृत्व के बयानों में भी दिखाई देता है. हाल ही में पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने अपने देश की दुर्दशा का बयान करते हुए कहा था कि यदि ऐसे कॉकरोच एकजुट हो जाएं, तो वे पूरे तंत्र को उलट-पुलट सकते हैं. यह टिप्पणी केवल भारत पर की गई राजनीतिक प्रतिक्रिया भर नहीं थी, बल्कि उससे यह भी झलकता है कि पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान युवा आंदोलनों की ताकत को लेकर कितना सतर्क है. जब पड़ोसी देशों में युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों ने सरकारों को मुश्किल में डाला हो, तब पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं का इस तरह की आशंका व्यक्त करना असामान्य नहीं माना जा सकता.
यही कारण है कि पाकिस्तान सरकार ने विदेशी पत्रकारों की आवाजाही और रिपोर्टिंग पर नए प्रतिबंध लगाए हैं. अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए इस्लामाबाद, कराची और लाहौर से बाहर रिपोर्टिंग करना अधिक कठिन बना दिया गया है. आलोचकों का कहना है कि इससे संवेदनशील इलाकों की स्वतंत्र रिपोर्टिंग प्रभावित होगी, जबकि पाकिस्तान सरकार इसे सुरक्षा और प्रशासनिक आवश्यकता बताती है.
सवाल यह है कि किसी सरकार को सूचना के प्रवाह पर इतनी सख्ती करने की जरूरत क्यों महसूस होती है? इसका एक संभावित उत्तर यह हो सकता है कि जब किसी देश के भीतर कई मोर्चों पर असंतोष मौजूद हो, तब सरकार को यह आशंका रहती है कि बाहरी कवरेज उन आंदोलनों को और अधिक अंतरराष्ट्रीय समर्थन या घरेलू वैधता दे सकती है. यह आशंका नई नहीं है. इतिहास बताता है कि राजनीतिक अस्थिरता के दौर में कई सरकारों ने सूचना पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश की है.
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी इस चिंता को और गहरा करती है. ऊंची महंगाई, विदेशी कर्ज, सीमित विकास और बेरोजगारी जैसे मुद्दे वर्षों से उसके सामने हैं. आर्थिक कठिनाइयों का सबसे अधिक असर युवाओं पर पड़ता है. आज की युवा पीढ़ी केवल स्थानीय मीडिया पर निर्भर नहीं है. सोशल मीडिया के माध्यम से वह ढाका, कोलंबो, काठमांडू और दिल्ली की घटनाओं को उसी समय देखती है, जब वे घट रही होती हैं. विचारों की यह आवाजाही किसी सीमा पर नहीं रुकती.
यहीं FOMO का रूपक प्रासंगिक हो जाता है. यदि पड़ोसी देशों में छात्र या युवा आंदोलन सत्ता की राजनीति बदल सकते हैं, तो पाकिस्तान में ऐसा क्यों नहीं हो सकता है. फिलहाल यह जरूरी नहीं कि ऐसा हो ही जाए, क्योंकि हर देश का सामाजिक, राजनीतिक और संस्थागत ढांचा अलग होता है. लेकिन ऐसी संभावना की चिंता सत्ता के व्यवहार को प्रभावित करती रहती है.
इमरान खान की पार्टी के समर्थकों के आंदोलन, बलूचिस्तान में अलगाववादी हिंसा, खैबर पख्तूनख्वा में सुरक्षा चुनौतियां और PoK में समय-समय पर उभरते विरोध आदि पाकिस्तान के सामने अलग-अलग प्रकृति की चुनौतियां हैं. इन्हें एक ही आंदोलन या एक ही कारण से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा. फिर भी इन सबके बीच यदि आर्थिक संकट और युवा असंतोष गहरा होता है, तो सरकार की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है.
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिरता का आधार भय नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होता है. इसलिए पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि वह विदेशी पत्रकारों को कितना नियंत्रित कर सकता है, बल्कि यह है कि वह अपने नागरिकों का विश्वास कितना मजबूत कर सकता है. यदि आर्थिक अवसर बढ़ेंगे, संस्थाओं पर भरोसा मजबूत होगा और राजनीतिक संवाद खुलेगा, तो किसी भी फोमो की गुंजाइश स्वतः कम हो जाएगी.