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हेमंत सोरेन के सामने मौका, केंद्र की गलती न दोहराएं

झारखंड में JSSC-CGL परीक्षा की कथित गड़बड़ियों को लेकर सरकार और छात्रों के बीच गतिरोध खत्म नहीं हो रहा है. तीसरे दौर की वार्ता भी बेनतीजा रही है. सरकार ने अधिकांश मांगें मान ली हैं लेकिन छात्रों की सीबीआई जांच की मांग पर सहमति नहीं बनी है.

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झारखंड में परीक्षा विवाद. (photo: ITG)
झारखंड में परीक्षा विवाद. (photo: ITG)

झारखंड में परीक्षा की कथित गड़बड़ियों को लेकर सरकार और छात्रों के बीच गतिरोध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. तीसरे दौर की वार्ता भी बेनतीजा रही. सरकार का दावा है कि उसने छात्रों की करीब 98 फीसदी मांगें मान ली हैं, लेकिन JSSC-CGL परीक्षा की सीबीआई जांच की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती. दूसरी तरफ छात्र साफ कह रहे हैं कि जब तक इस मांग पर सहमति नहीं बनती, आंदोलन खत्म नहीं होगा. अब छात्र सड़क पर उतरने की तैयारी में हैं. सवाल यह है कि जब सरकार और छात्रों के बीच बातचीत से अधिकांश मुद्दों पर सहमति बन सकती है, तो एक मांग पर अड़कर पूरे विवाद को लंबा खींचने की जरूरत आखिर क्यों है?

छात्रों का कहना है कि परीक्षा प्रक्रिया को लेकर जिस तरह के सवाल उठे हैं, उनकी निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच के लिए केंद्रीय एजेंसी से जांच जरूरी है.छात्रों के मन में अगर संदेह है तो उसे दूर करने  में बुराई क्या है? सरकार को यह समझना होगा कि किसी जांच की सिफारिश करना अपराध स्वीकार करना नहीं होता. सीबीआई जांच की मांग मान लेने का अर्थ यह भी नहीं है कि सरकार को दोषी ठहरा दिया गया है. यदि सरकार का दावा है कि परीक्षा प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी थी, तो निष्पक्ष जांच के बाद यही बात और मजबूती से सामने आ आएगी.दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.  जाहिर है कि फिर जांच से डरने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए.

हेमंत सोरेन सरकार रांची में आंदोलनरत छात्रों के साथ वही गलती दोहराती हुई दिखाई दे रही है, जो अभी हाल ही में जंतर मंतर पर आंदोलित छात्रों के साथ केंद्र ने किया. आंदोलन जब लंबा खिंचता है, तो सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच मुद्दा धीरे-धीरे मांगों से निकलकर प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है. इसके बाद सरकार को लगता है कि यदि उसने एक मांग मान ली तो उसकी कमजोरी मानी जाएगी. यही सोच किसी भी आंदोलन को अनावश्यक रूप से लंबा कर देता है.

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छात्रों के मामले में यह रवैया और भी नुकसानदेह है. रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाएं युवाओं के भविष्य से जुड़ी होती हैं. यदि किसी परीक्षा में अनियमितता का संदेह पैदा हो जाए तो उसका असर केवल उस परीक्षा तक सीमित नहीं रहता. हजारों युवाओं का समय, पैसा और करियर दांव पर लग जाता है. ऐसे में सरकार का पहला काम छात्रों को यह भरोसा दिलाना होना चाहिए कि उनकी शिकायत को पूरी गंभीरता से लिया जा रहा है.

सरकार ने कई सकारात्मक कदम भी उठाए हैं. JPSC में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए ईडी जांच की सिफारिश, परीक्षा संबंधी मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट और 90 दिनों में चार्जशीट दाखिल करने की घोषणा, JSSC-CGL मामले में सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज की अध्यक्षता में समिति तथा परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए IIT-ISM धनबाद, IIM रांची और XLRI जमशेदपुर के विशेषज्ञों को शामिल करने का फैसला स्वागत योग्य है. लेकिन इन तमाम कदमों के बावजूद यदि छात्रों का सबसे बड़ा संदेह दूर नहीं हो रहा है, तो सरकार को अपने रुख पर पुनर्विचार करना चाहिए.

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह कहना कि समस्याओं का समाधान संवाद से होगा, लाठी-डंडे से नहीं, सही दिशा में दिया गया बयान है. लेकिन संवाद केवल बैठक करने का नाम नहीं है. संवाद का अर्थ यह भी है कि सरकार सामने वाले की सबसे बड़ी चिंता को समझे और उसके समाधान का रास्ता तलाशे. 
कल्पना कीजिए कि मुख्यमंत्री आंदोलनरत छात्रों के बीच पहुंचें, उनसे बातचीत करें और उन्हें भरोसा दिलाएं कि सरकार सीबीआई जांच की सिफारिश करने को तैयार है. इससे सरकार की प्रतिष्ठा कम नहीं होगी, बल्कि बढ़ेगी. यदि जांच में सरकार और परीक्षा व्यवस्था पाक-साफ निकलती है, तो यही सरकार के लिए सबसे बड़ा प्रमाण होगा. और यदि कोई गड़बड़ी सामने आती है, तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता साफ होगा.

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राजनीति में कई बार छोटी बातों को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर बड़ा संकट खड़ा कर दिया जाता है. सीएम  हेमंत सोरेन के सामने भी यही खतरा है. छात्र आंदोलन को लंबा खींचना न सरकार के हित में है और न छात्रों के. सरकार को चाहिए कि वह तकनीकी और कानूनी तर्कों के पीछे छिपने के बजाय राजनीतिक पहल करे.मुख्यमंत्री यदि स्वयं आंदोलन स्थल पर पहुंचकर छात्रों से संवाद करें, उनका अनशन या धरना खत्म करवाएं और जांच की सिफारिश करने का भरोसा दें, तो इसका राजनीतिक लाभ भी उन्हें ही मिलेगा. आज के युवा को आदेश नहीं, भरोसा चाहिए. उसे यह महसूस होना चाहिए कि सरकार उसके भविष्य को लेकर संवेदनशील है.

हेमंत सोरेन के लिए यह संकट एक अवसर भी है. वह चाहें तो इसे सरकार बनाम छात्र की लड़ाई बनने दें, या फिर इसे संवाद और समाधान की मिसाल बना दें. सीबीआई जांच की सिफारिश से यदि हजारों छात्रों के मन का संदेह दूर होता है, तो इसमें सरकार की हार नहीं, लोकतंत्र की जीत होगी. जो काम केंद्र की मोदी सरकार करने से चूक गई उसे करके हेमंत सोरेन छात्रों के बीच अपनी एक अलग छवि बना सकते हैं.

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