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अकाली दल-BJP फिर आएंगे साथ? 1952 से चली आ रही दोस्ती, दूरी और सियासी मजबूरियों की कहानी

पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा-अकाली दल गठबंधन की संभावनाओं को लेकर अटकलें फिर तेज हो गई हैं. दोनों दलों के बीच ऐतिहासिक और वैचारिक मतभेदों के बावजूद कांग्रेस विरोधी साझा एजेंडा उन्हें एक साथ लाता रहा है.

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पीएम मोदी और सुखबीर सिंह बादल. (File photo: ITG)
पीएम मोदी और सुखबीर सिंह बादल. (File photo: ITG)

नई दिल्ली में पीएम नरेंद्र मोदी से शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने मुलाकात की और उसके बाद बिलों को समर्थन देने से 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले BJP-SAD के बीच संभावित गठबंधन की अटकलें फिर से तेज हो गई हैं. कृषि कानूनों के मुद्दे पर 2020 में दोनों दलों का गठबंधन टूट गया था. छह साल में पहली बार दोनों शीर्ष नेताओं की ये मुलाकात हुई है.

अकाली दल और जनसंघ (बाद में बीजेपी) के बीच संबंध 1952 के पहले आम चुनावों से ही वैचारिक मतभेदों, सहयोग और बदलती राजनीतिक मजबूरियों के दौर से गुजरते हुए विकसित हुआ है.

कांग्रेस विरोध बना गठबंधन का कारण

अकाली दल और जनसंघ का राजनीतिक जुड़ाव 1952 के पहले आम चुनाव से देखा जा सकता है. दोनों दलों के बीच कोई वैचारिक समानता नहीं थी, बल्कि कांग्रेस का विरोध ही उनका सबसे बड़ा साझा मंच था. इसी कांग्रेस विरोध के कारण कई मौकों पर अकाली दल की नजदीकियां वामपंथी दलों से भी बढ़ीं. हालांकि, शुरुआती दौर में जब अकाली दल ने कांग्रेस के साथ मिलकर काम किया, तब जनसंघ ने ऐसे समझौतों का कड़ा विरोध किया था.

पंजाबी सूबा मोर्चा ने बढ़ाई दूरियां

भाषा के मुद्दे पर दोनों दलों के बीच सबसे बड़ा टकराव देखने को मिला. अकाली दल ने पंजाबी भाषी राज्य (पंजाबी सूबा) के लिए आक्रामक रूप से मोर्चा खोला, जबकि जनसंघ ने इसका जमकर विरोध किया. हिंदी-पंजाबी भाषा के इस विवाद ने दोनों पक्षों के बीच वैचारिक दूरी को और बढ़ा दिया. नेहरू-तारा सिंह समझौते पर भी जनसंघ नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने सवाल उठाए थे, जिससे अकाली दल की मांग पर गतिरोध और गहरा गया था.

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गुरु नानक यूनिवर्सिटी के मुद्दे ने भी बढ़ाए मतभेद

वैचारिक मतभेदों के बावजूद कांग्रेस के वर्चस्व को खत्म करने की राजनीतिक मजबूरी दोनों दलों को साथ ले आई. पंजाब में दोनों ने मिलकर गठबंधन सरकारें बनाईं. पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री जस्टिस गुरनाम सिंह के बयानों में जनसंघ की भूमिका और इस नाजुक गठबंधन के स्वरूप का ब्योरा मिलता है. हालांकि, ये साझेदारी हमेशा कमजोर रही. गुरु नानक यूनिवर्सिटी के अधिकार क्षेत्र का मुद्दा उठा तो जनसंघ ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था.

आर्टिकल 25 पर गतिरोध

1981 में अमृतसर में बीजेपी विधायक के नेतृत्व में सिगरेट और बीड़ी व्यापार के समर्थन में एक मार्च निकाला गया जो एक बड़े विवाद की वजह बना. इसके बाद संविधान के अनुच्छेद 25(b) की कॉपी जलाकर जब प्रकाश सिंह बादल ने विरोध दर्ज कराया, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर स्थिति से सही तरीके से न निपटने का हमला बोला. वहीं, इस दौर में सैन्य कार्रवाई के मुद्दे पर बीजेपी ने सख्त रुख अपनाते हुए अकालियों से किसी भी राजनीतिक समझौते का विरोध किया था.

रिश्तों का नया दौर

साल 1996 में अकाली दल और बीजेपी ने बिना किसी शर्त के ऐतिहासिक गठबंधन किया. ये साझेदारी पंजाब की राजनीति का सबसे मजबूत गठबंधन बनी और दोनों दलों ने कई दशकों तक मिलकर चुनाव लड़ा और सरकारें चलाईं. हालांकि, ये गठबंधन पूरी तरह वैचारिक सहमति के बजाय राजनीतिक हितों और कांग्रेस विरोध पर आधारित था. साल 2020 में कृषि कानूनों के चलते यह सालों पुराना रिश्ता टूट गया था.

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क्या होगा गठबंधन का आधार

अकाली दल के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है, इसलिए इस बार गठबंधन की मुख्य रूह राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था हो सकती है. शहरी और ग्रामीण संतुलन बनाने, सीटों के बंटवारे, पुनरुत्थान तथा पंजाब केंद्रित एजेंडे पर चर्चा होने की संभावना है. दोनों तरफ से नरमी का रुख देखकर अन्य राजनीतिक दलों ने भी अपनी रणनीतियां बदलनी शुरू कर दी हैं.

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