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योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास से राघव चड्ढा तक... AAP से कैसे दूर होते चले गए केजरीवाल के 'वफादार'

राघव चड्ढा सहित कई राज्यसभा सांसदों ने AAP छोड़कर बीजेपी जॉइन करने का ऐलान किया है. दो-तिहाई सांसदों के बीजेपी में विलय के दावे से AAP में बड़ी टूट और अंदरूनी संकट गहरा गया है.

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राघव चड्ढा से पहले केजरीवाल के कई वफादार AAP छोड़ चुके हैं. (File Photo: ITG)
राघव चड्ढा से पहले केजरीवाल के कई वफादार AAP छोड़ चुके हैं. (File Photo: ITG)

'घायल हूं इसलिए घातक हूं...', राघव चड्ढा ने कुछ दिनों पहले ही ये बात कही थी और उन्होंने अब इसे साबित भी कर दिया है. शुक्रवार शाम राघव ने अचानक के एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई. उनके साथ मंच पर AAP के ही राज्यसभा सांसद संदीप पाठक और अशोक मित्तल मौजूद थे. इस दौरान तीनों ने आम आदमी पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया. इसके अलावा राघव चड्ढा ने कहा कि आम आदमी पार्टी के दो-तिहाई सांसदों के साथ वह बीजेपी में विलय करने जा रहे हैं. उन्होंने इन सभी के नाम भी गिनाए. चड्ढा ने कहा बताया कि हम तीनों के अलावा हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, संदीप पाठक, विक्रमजीत साहनी और अशोक मित्तल भी पार्टी छोड़ रहे हैं.

नए सियासी घटनाक्रम ने संसद में पार्टी की ताकत को झकझोर दिया है. राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने बीजेपी मुख्यालय पहुंचकर पार्टी का दामन थाम लिया है. राघव के मुताबिक, बाकी तीन सांसदों के नामों के नाम भी AAP छोड़ने वाले नेताओं की उस लिस्ट में शामिल है, जो राज्यसभा चेयरमेन को दी गई है. चड्ढा के मुताबिक इन नामों में हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता और विक्रमजीत साहनी हैं. राज्यसभा में इनका साथ स्वाति मालीवाल भी देंगी, जिन्होंने पिछले दिनों अरविंद केजरीवाल से नाराजगी के बाद पार्टी से इस्तीफा दे दिया था.

कभी अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद और आक्रामक चेहरों में गिने जाने वाले ये नेता अब उसी पार्टी से दूरी बना रहे हैं, जिसे उन्होंने खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई थी. राघव चड्ढा ने पार्टी पर अपने मूल सिद्धांतों से भटकने का आरोप लगाया, जबकि इस सामूहिक कदम ने AAP के भीतर लंबे वक्त से चल रही असहमति और दरारों को खुलकर सामने ला दिया है. यह पहली बार नहीं है जब AAP के अंदर वफादार माने जाने वाले चेहरे अलग रास्ता चुनते दिखे हैं, लेकिन इस बार मामला कहीं ज्यादा बड़ा और असरदार नजर आ रहा है.

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ऐसे हुई केजरीवाल के टॉप 'वफादारों' की विदाई...

आम आदमी पार्टी आज एक ऐसे जगह पर खड़ी है, जहां 'वफादारी' विचारधारा से बड़ी हो गई है. जो पार्टी सिद्धांतों की नींव पर खड़ी हुई थी, वो अब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और 'अपनों' के ही विद्रोह के बीच झूल रही है. राघव चड्ढा का 'अलगाव' उस पैटर्न का हिस्सा है, जिसने योगेंद्र यादव से लेकर स्वाति मालीवाल तक को किनारे लगा दिया.

राजनीतिक धोखे अक्सर शोर मचाकर नहीं आते. सबसे ज्यादा चुभने वाले विश्वासघात वे नहीं होते जिनकी आहट पहले से सुनाई दे जाए. जब कोई वैचारिक विरोधी दुश्मन बन जाए या कोई प्रतिद्वंद्वी चाल चले, तो एक तसल्ली रहती है कि यह तो सियासत का पुराना नियम है. लेकिन सबसे गहरा दुख तब होता है, जब कोई 'वफादार' चुपचाप दूर होने लगता है. वह पीठ में छुरा नहीं घोंपता. वो बस साथ देना छोड़ देता है. वो धीरे-धीरे अपनी राह को जुदा कर जाता है और एक दिन दूसरी तरफ खड़ा नजर आता है. यही राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल की कहानी है, यही अरविंद केजरीवाल की नियति है और यही आम आदमी पार्टी का अब तक का सबसे मानवीय, लेकिन कड़वा अध्याय भी है. आम आदमी पार्टी में राघव चड्ढा का उदय किसी फिल्मी पटकथा जैसा था. 

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साल 2012 में एक युवा चार्टर्ड अकाउंटेंट के तौर पर लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने से शुरू हुआ सफर उन्हें पार्टी के सबसे ताकतवर अंदरूनी घेरे तक ले गया. चड्ढा सिर्फ एक चेहरा नहीं थे, वे केजरीवाल का भरोसा थे. उनकी सगाई अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा के साथ कपूरथला हाउस में हुई. वो जगह जो पंजाब के मुख्यमंत्री का आधिकारिक आवास है.

खुद अरविंद केजरीवाल ने वहां मौजूद होकर इस रिश्ते को अपनी स्वीकृति दी थी. यह किसी बॉस का अपने कर्मचारी के प्रति व्यवहार नहीं था, यह एक बड़े भाई का संदेश था कि ये मेरा 'अपना' है. लेकिन आज वही अपनापन पराए चेहरों में तब्दील हो चुका है.

जब रंग बदलने लगे राघव चड्ढा...

राघव चड्ढा को लेकर दरार तब ज्यादा दिखी, जब केजरीवाल जेल में थे और पार्टी को अपने सबसे प्रखर वक्ताओं की जरूरत थी. उस वक्त राघव चड्ढा आंख की बीमारी का हवाला देकर लंदन चले गए. पार्टी के गलियारों में यह चर्चा आम हो गई कि जब सबसे कठिन समय आया, तो उन्होंने आंदोलन के बजाय खुद को चुना. वापसी के बाद भी उनकी चुप्पी नहीं टूटी. यहां तक कि शराब नीति मामले में केजरीवाल को मिली राहत पर भी उनकी ओर से वो उत्साह नहीं दिखा, जिसकी उम्मीद की जा रही थी.

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केजरीवाल की राजनीति की सबसे बुनियादी मांग 'समर्पण' है. यहां आप अपनी निजी पहचान को नेता के नैरेटिव में इस तरह विलीन कर देते हैं कि आपके अस्तित्व का एकमात्र पर्याय 'केजरीवाल' बन जाता है. केजरीवाल ने राघव चड्ढा को मंच दिया, पहचान दी, लेकिन उन्होंने उसी पहचान का इस्तेमाल कर खुद को उस कद तक पहुंचा दिया, जहां वो अब केजरीवाल की छत्रछाया में समा नहीं पा रहे थे.

यह भी पढ़ें: Raghav Chadha joins BJP: AAP छोड़ BJP में शामिल हुए राघव चड्ढा, नितिन नवीन ने मिठाई खिलाकर किया स्वागत

किस्से और भी...

राघव चड्ढा और उनके साथ अन्य नेताओं के बीजेपी में जाने से पहले योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, नवजोत सिंह सिद्धू और स्वाति मालीवाल, ये लंबी लिस्ट है. केजरीवाल की कार्यशैली स्पष्ट है. यहां कोई 'वफादार विपक्ष' नहीं हो सकता. या तो आप पूरी तरह समर्पित हैं या फिर आप गद्दार हैं. इस पूरी कहानी को समझने के लिए मार्च 2015 के उस 'अध्याय' को याद करना होगा, जब 'AAP' ने दिल्ली में जीत के ठीक एक महीने बाद अपने संस्थापकों को ही बाहर कर दिया था. 

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को राष्ट्रीय परिषद की बैठक से जिस तरह निकाला गया, उसे उन्होंने लोकतंत्र की हत्या कहा था. मेधा पाटकर जैसी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उसी दिन पार्टी का साथ छोड़ दिया. केजरीवाल ने तब कहा था, "साथियों ने धोखा दिया." इसी एक वाक्य ने भविष्य की राजनीति तय कर दी थी. आंतरिक विरोध को यहां आलोचना नहीं, दुश्मन की साजिश माना जाता है.

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कुमार विश्वास की कहानी भी इसी पैटर्न की गवाह है. वो शख्स, जो भीड़ जुटाता था. जो अपने लहजे से क्रांति को कविता बना देता था, उसे राज्यसभा का टिकट न देकर हाशिए पर धकेल दिया गया. आम आदमी पार्टी का फॉर्मूला बेहद कठोर है. यहां काबिलियत को आमंत्रित किया जाता है, लेकिन वफादारी की शर्त रखी जाती है. जैसे ही कोई महत्वाकांक्षा सिर उठाती है, उसे कुचल दिया जाता है.

राघव चड्ढा और उनका साथ देने वाले सभी नेता इस सिलसिले का सबसे नया नाम हैं, आखिरी नहीं. जब तक पार्टी का ढांचा 'सिपाहियों' की तलाश में रहेगा, काबिल और महत्वाकांक्षी लोग इसी तरह एक-एक करके दूर होते रहेंगे. आखिरी में शायद मैदान में सिर्फ एक ही शख्स बचेगा, लेकिन तब तक वो 'आंदोलन' जिसकी कसमें खाई गई थीं, दम तोड़ चुका होगा.

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