
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में पांच महीने का कार्यकाल पूरा कर चुके सी. जोसेफ विजय दो बिल्कुल अलग राजनीतिक रिश्तों को संतुलित करने की कोशिशों में जुटे हैं. राज्य में जहां उनकी सरकार कांग्रेस के साथ गठबंधन के दम पर चल रही है, वहीं केंद्र की भाजपा-नीत सरकार के साथ उनके संबंध यह दर्शाते हैं कि वे वैचारिक मतभेदों को राज्य के विकास के आड़े नहीं आने देना चाहते.
सीएम विजय के लिए यह वीकेंड सियासत के दो अलग-अलग रंग लेकर आया. शनिवार को उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ मुलाकात की, तो रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत किया और उनके साथ चेन्नई मेट्रो की सवारी भी की. इन दोनों मुलाकातों ने संकेत दिया कि कांग्रेस के साथ गठबंधन के सहारे सरकार चला रहे विजय, भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के साथ भी संवाद बनाए रखना चाहते हैं. उनके लिए राजनीतिक विचारधारा से जुड़े मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन तमिलनाडु के विकास और राज्य के हितों को आगे बढ़ाना प्राथमिकता है.
मुख्यमंत्री बनने के करीब पांच महीने बाद विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपने राजनीतिक सहयोगियों के साथ रिश्ते मजबूत रखते हुए केंद्र सरकार से भी कामकाजी संबंध बनाए रखें. इन दो मुलाकातों ने उनके इसी राजनीतिक संतुलन की झलक दिखाई.
राहुल के साथ मुलाकात, लंच और कॉफी पर चर्चा
शनिवार को राहुल गांधी चेन्नई में थे. वह ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे. इसी दौरान उनकी मुख्यमंत्री विजय से करीब एक घंटे तक मुलाकात हुई. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच कई राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा हुई. राहुल गांधी और विजय ने मुख्यमंत्री के आवास पर लंच किया. इसके बाद दोनों पास के एक कैफे में कॉफी और तिरामिसू का स्वाद लेते नजर आए. यह मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) कांग्रेस और कुछ छोटे दलों के साथ औपचारिक गठबंधन कर चुकी है.

दोनों नेताओं के बीच नजदीकी की झलक मई में विजय के शपथ ग्रहण समारोह में भी दिखी थी. उस दौरान दोनों ने मंच साझा किया था और विजय ने राहुल गांधी को अपना ‘भाई’ कहा था. ऐसे में शनिवार की मुलाकात को केवल शिष्टाचार भेंट के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा. यह उस राजनीतिक साझेदारी का भी हिस्सा है, जिसके सहारे विजय अपनी सरकार को स्थिरता देना चाहते हैं.
यह भी पढ़ें: 'तमिलनाडु का 5110 करोड़ का फंड बिना शर्त जारी करे केंद्र', PM मोदी के सामने बोले थलपति विजय
पीएम मोदी के साथ मेट्रो की सवारी, लेकिन संदेश सियासी
रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चेन्नई पहुंचे तो मुख्यमंत्री विजय ने हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया. इसके बाद दोनों ने चेन्नई मेट्रो के दूसरे चरण के एक हिस्से का उद्घाटन किया और साथ में मेट्रो की सवारी भी की. मई में तमिलनाडु के चुनाव नतीजों के बाद राज्य में दोनों नेताओं की यह पहली मुलाकात थी.
हालांकि, इस कार्यक्रम में सबसे अहम क्षण वह रहा, जब विजय ने अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री के सामने राज्य की मांगों की सूची रखी और उन्हें सार्वजनिक रूप से पढ़कर सुनाया. इससे साफ हुआ कि मुख्यमंत्री केंद्र के साथ संवाद को केवल औपचारिक मुलाकातों तक सीमित नहीं रखना चाहते. वह इन अवसरों का इस्तेमाल तमिलनाडु से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए कर रहे हैं. विजय की रणनीति का मूल यही दिखाई देता है कि केंद्र की भाजपा सरकार से वैचारिक मतभेद होने के बावजूद राज्य के विकास से जुड़े मुद्दों पर बातचीत और सहयोग के रास्ते खुले रखे जाएं.
108 सीटों के बाद गठबंधन की राजनीति
मई में हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में टीवीके ने 234 में से 108 सीटें जीती थीं. हालांकि, पार्टी बहुमत के आंकड़े से 10 सीट पीछे रह गई. इसके बाद विजय ने कांग्रेस और कुछ छोटे दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई. इनमें ऐसे दल भी शामिल थे, जो पहले द्रमुक के साथ रहे थे. ऐसे राजनीतिक समीकरण में कांग्रेस के साथ रिश्ते बनाए रखना विजय के लिए स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है. दूसरी ओर, राज्य सरकार को केंद्र से वित्तीय संसाधनों, विकास परियोजनाओं और प्रशासनिक सहयोग की जरूरत पड़ती है. इसलिए केंद्र के साथ संवाद बनाए रखना भी उनकी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है.
मुख्यमंत्री बनने के अगले ही दिन विजय ने प्रधानमंत्री मोदी के बधाई संदेश के लिए उनका आभार जताया था और तमिलनाडु के विकास में केंद्र के सहयोग की उम्मीद व्यक्त की थी. 27 मई को मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहली दिल्ली यात्रा के दौरान विजय ने प्रधानमंत्री मोदी से करीब 30 मिनट तक मुलाकात की थी. इस दौरान वह एक बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ पहुंचे थे और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से भी मिले थे. बातचीत में राज्य की वित्तीय स्थिति से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे.
विचारधारा अलग, लेकिन हर मुद्दे पर टकराव नहीं
विजय ने जून में विधानसभा में अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा था कि टीवीके और केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा की विचारधाराएं एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं. इसके बावजूद, उन्होंने हर मुद्दे पर आंख मूंदकर टकराव का रास्ता अपनाने से इनकार किया था. उनका कहना था कि तमिलनाडु का विकास उनकी सरकार का प्रमुख उद्देश्य है. यह रुख उन विपक्ष शासित राज्यों की राजनीति से कुछ अलग नजर आता है, जहां केंद्र और राज्य सरकारों के बीच कई मुद्दों पर लगातार टकराव देखने को मिलता है. विजय सहकारी संघवाद की बात करते हुए राज्य के हितों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.
11 जून को नई दिल्ली में नीति आयोग की बैठक के दौरान भी उन्होंने कहा था कि विकसित भारत का निर्माण तभी संभव है, जब राज्य सशक्त हों, सहकारी संघवाद को बढ़ावा मिले और विकास समावेशी हो.
इस बैठक से एक दिन पहले उन्होंने राहुल गांधी और सोनिया गांधी से 10 जनपथ में मुलाकात की थी और कांग्रेस के समर्थन के लिए आभार जताया था. यानी कांग्रेस के साथ राजनीतिक साझेदारी और केंद्र के साथ प्रशासनिक संवाद- दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश पहले से दिखाई दे रही है.
अमित शाह से मुलाकात और लंबित मुद्दे
अगस्त में दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक के दौरान भी विजय ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर तमिलनाडु की मांगों पर चर्चा की थी. यह मुलाकात भी बताती है कि राज्य सरकार केंद्र के साथ बातचीत के रास्ते बंद नहीं करना चाहती. हालांकि, दोनों पक्षों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं. इनमें राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट), वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाने और तीन भाषा नीति जैसे विषय शामिल हैं. इन मुद्दों पर विजय की पार्टी का रुख भाजपा से अलग रहा है.
यह भी ध्यान रखना होगा कि केंद्रीय मंत्रियों से मुलाकात करना अपने आप में कोई नई राजनीतिक परंपरा नहीं है. राज्य सरकारें अपनी जरूरतों और मांगों को लेकर केंद्र से बातचीत करती रही हैं, चाहे दोनों जगह एक ही दल की सरकार हो या अलग-अलग दलों की. विजय की खासियत इस प्रक्रिया को राजनीतिक टकराव के बजाय राज्य के हितों से जोड़कर पेश करने में दिखाई देती है.
यह भी पढ़ें: थलपति विजय से तलाक के विवाद के बीच बेटे जेसन की 'सिग्मा' देखने पहुंचीं संगीता, CM ने क्यों बनाई दूरी?
विजय की राजनीति की असली परीक्षा अभी बाकी
राहुल गांधी के साथ कॉफी और प्रधानमंत्री मोदी के साथ मेट्रो की सवारी, पहली नजर में दो अलग-अलग राजनीतिक तस्वीरें हैं. लेकिन इनके पीछे विजय की एक साझा रणनीति दिखाई देती है- कांग्रेस के साथ गठबंधन को बनाए रखना और भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से कामकाजी संबंध भी कायम रखना.
फिर भी, किसी मुख्यमंत्री की राजनीतिक सफलता का आकलन केवल मुलाकातों और सार्वजनिक बयानों से नहीं किया जा सकता. असली परीक्षा तब होगी, जब राज्य की मांगों, वित्तीय सहायता, शिक्षा नीति और अन्य विवादित मुद्दों पर ठोस फैसले लेने का समय आएगा. विजय के सामने चुनौती सिर्फ दो राजनीतिक खेमों के बीच संतुलन बनाने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की भी है कि संवाद की उनकी नीति तमिलनाडु के लिए वास्तविक नतीजे दे सकती है. फिलहाल उनका संदेश साफ है- सियासी मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन राज्य के विकास के लिए बातचीत के दरवाजे बंद नहीं होने चाहिए.