शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न पर दावे के मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. इस मामले में गुरुवार को भी सुनवाई जारी रहेगी. फाइनल सुनवाई के पहले दिन चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली तीन जजों की पीठ ने उद्धव ठाकरे गुट से कई सवाल पूछे.
सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल दलील दी कि 2012 में संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद उद्धव ठाकरे ने सर्वसम्मति से पार्टी की कमान संभाली थी. एकनाथ शिंदे उनके सहायक के रूप में काम कर रहे थे. दलबदल करने वाले बागी विधायकों ने सुनियोजित तरीके से पार्टी संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया है.
चुनाव आयोग पर सवाल
कोर्ट के पूछने पर सिब्बल ने 27 फरवरी की घटना और पार्टी के इतिहास का ब्योरा दिया. उन्होंने बताया कि 1999 के बाद पार्टी में 'पक्ष प्रमुख' का पद बनाया गया था. 2013 और 2018 में हुए संगठनात्मक बदलावों के तहत अनुच्छेद 11A के जरिए की गई नियुक्तियों की जानकारी चुनाव आयोग को दी गई थी. शिंदे खुद राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा थे. इसके बावजूद चुनाव आयोग का ये कहना कि उसके पास 2018 का संविधान रिकॉर्ड में नहीं है, पूरी तरह गलत और अधिकार क्षेत्र से बाहर है.
विधायक दल का गलत प्रस्ताव
सिब्बल ने बताया कि जून 2022 में विधान परिषद चुनाव में क्रास वोटिंग के बाद कार्रवाई से बचने के लिए 39 बागी विधायक पहले सूरत और फिर गुवाहाटी चले गए. वहां बैठकर उन्होंने सुनील प्रभु की जगह भरत गोगावले को चीफ व्हिप नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित किया.
सिब्बल ने कहा कि 5 जजों की संविधान पीठ पहले ही मान चुकी है कि विधायक दल का कोई गुट राजनीतिक दल के मुख्य सचेतक को बदलने का फैसला नहीं ले सकता. इसके बावजूद नए अध्यक्ष ने गोगावले को मुख्य सचेतक माना, जिसे शीर्ष अदालत ने गैरकानूनी करार दिया था.
राजनीतिक दल बनाम विधायक दल
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत और जस्टिस बागची ने पूछा कि चुनाव चिह्न पर अधिकार 'राजनीतिक दल' का होता है या 'विधायक दल' का. इस पर सिब्बल ने स्पष्ट किया कि चुनाव चिह्न पर मूल राजनीतिक दल का अधिकार होता है, जिसमें कार्यकर्ता, पदाधिकारी, उम्मीदवार और विधायक सभी शामिल होते हैं. केवल विधायकों का एक गुट खुद को मूल पार्टी नहीं बता सकता.
जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि मुद्दा इस पर निर्भर करता है कि पार्टी का संविधान क्या कहता है . सिब्बल ने तर्क दिया कि यदि 2018 का संविधान अमान्य था, तो उस दौरान हुए चुनाव भी अमान्य होने चाहिए थे.
10वीं अनुसूची का दुरुपयोग
सिब्बल ने कहा कि इस पूरे मामले में दसवीं अनुसूची का जमकर दुरुपयोग हुआ है. जब जस्टिस बागची ने कहा कि सदन के अध्यक्ष को राजनीतिक संबद्धताओं से ऊपर उठना चाहिए तो सिब्बल ने कहा कि आज ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता.
सिब्बल ने कहा कि विधायकों का एक छोटा समूह दूसरी पार्टी के साथ मिलकर सरकार गिरा देता है और अयोग्यता की सुनवाई भी नहीं होने देता. इससे लोकतंत्र एक मजाक बनकर रह गया है और पार्टी व्हिप को भारी नुकसान पहुंचा है.
आयोग के फैसले में गंभीर विसंगति
कपिल सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि 26 जून को बागी नेताओं की बैठक में 2018 के संविधान को बदलने का प्रस्ताव पारित किया गया था. इससे साबित होता है कि शिंदे गुट जानता था कि 2018 का संविधान मौजूद है. इसके बावजूद चुनाव आयोग ने संगठनात्मक बहुमत को नजरअंदाज कर केवल 'विधायक दल' के आधार पर फैसला सुनाया. सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग के पास पार्टी संविधान की वैधता जांचने का कोई अधिकार नहीं था. अदालत ने मामले की सुनवाई अगले दिन दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दी है.